World Teachers' Day: हमने हमेशा ही अपने शिक्षकों को मुस्कुराते हुए, पूरी डिसिप्लिन के साथ ब्लैक बोर्ड पर समझाते हुए और लिखते हुए देखा है. लेकिन आपने कभी यह सोचा है कि जब स्कूल में छुट्टी की घंटी बजती है और क्लासरूम का दरवाजा बंद हो जाता है और टीचर्स अपने घर लौटते हैं, तो उनके दिमाग में क्या चल रहा होता है? आज वर्ल्ड टीचर डे पर हमें शिक्षकों के जीवन के उस हिस्से पर बात करनी होगी, जो आमतौर पर छिपा रहता है.
शिक्षकों में भी तनाव ज्यादा
अमेरिकी रिसर्च संस्थान रैंड (RAND) की रिपोर्ट पर नजर डालें तो पता चलता है कि साल 2026 में शिक्षकों के तनाव में थोड़ी कमी तो आई है, लेकिन इसी तरह के काम करने वाले लोगों के मुकाबले शिक्षकों में ज्यादा तनाव, ज्यादा आर्थिक तंगी और खराब सेहत की शिकायतें अभी भी ज्यादा देखी गईं. रिपोर्ट के अनुसार, यह ट्रेंड 2021 से चला आ रहा है.
55 फीसदी शिक्षकों ने माना नौकरी से जुड़ा तनाव

रिपोर्ट के अनुसार, केजी से कक्षा 12वीं के पब्लिक स्कूलों के 55 फीसदी शिक्षकों ने माना कि उन्हें नौकरी से जुड़ा तनाव महसूस होता है. यह आंकड़ा 2025 के 62 फीसदी से कम है, लेकिन इसी तरह के काम करने वाले दूसरे लोगों के 34 फीसदी के आंकड़े से अब भी बहुत ज्यादा है. साथ ही शिक्षकों में काम का अत्यधिक बोझ, नौकरी से जुड़ा तनाव और डिप्रेशन के लक्षण भी देखे गए हैं.
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि 18 फीसदी शिक्षक 2025–26 शैक्षणिक सत्र के अंत तक अपनी जॉब छोड़ सकते हैं. वहीं, 23 फीसदी का कहना है कि वे जब तक कर सकते हैं, तब तक इस पेशे में रहने की योजना बना रहे हैं. साथ ही 59 फीसदी महिला शिक्षकों ने अक्सर अपने नौकरी से जुड़े तनाव की शिकायत की. वहीं, पुरुष शिक्षकों में यह आंकड़ा 44 फीसदी रहा.
सैलरी और दूसरी नौकरी भी बनी चुनौती
रिपोर्ट के मुताबिक, केवल 39 फीसदी शिक्षकों को पिछले साल की तुलना में सैलरी में बढ़ोतरी मिली. साथ ही 30 फीसदी शिक्षकों का कहना है कि वे स्कूल सिस्टम के बाहर दूसरी नौकरी भी करते हैं. इस अतिरिक्त काम में वे हर हफ्ते औसतन 13 घंटे का समय बिताते हैं.
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 52 फीसदी शिक्षकों ने माना कि छात्रों का व्यवहार संभालना उनके लिए सबसे ज्यादा तनावपूर्ण रहा है. यह सर्वे अमेरिका में जनवरी से फरवरी 2026 के बीच केजी से 12वीं तक के पब्लिक स्कूलों में काम करने वाले वयस्कों के बीच किया गया था.
दुनिया में शिक्षकों की कमी भी बड़ी चुनौती

अगर हम यूनेस्को की ग्लोबल रिपोर्ट ऑन टीचर्स की बात करें तो पूरे विश्व में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के लिए शिक्षकों की काफी कमी है. रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक 4.4 करोड़ अतिरिक्त शिक्षकों की जरूरत होगी. हालांकि, यह सिर्फ शिक्षकों की संख्या बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि उन्हें अच्छा वेतन देने, काम के लिए बेहतर माहौल उपलब्ध कराने, ट्रेनिंग देने और काम का दबाव कम करने की भी जरूरत है.
भारत में 11 लाख से ज्यादा शिक्षक पद खाली
भारत में भी शिक्षकों की कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार, देश के स्कूलों में 11 लाख से अधिक यानी करीब 11.16 लाख शिक्षकों की कमी है. कुल स्वीकृत खाली पदों में से 69 फीसदी रिक्तियां ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में हैं.
केंद्रीय विद्यालयों में करीब साढ़े 8 हजार और नवोदय विद्यालयों में 24.8 फीसदी पद खाली हैं. जिन राज्यों में शिक्षकों की सबसे ज्यादा कमी है, उनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान और कर्नाटक शामिल हैं.
शिक्षकों की संख्या बढ़ी, फिर भी कमी बरकरार
हालांकि, साल दर साल शिक्षकों की संख्या में इजाफा भी हुआ है. शिक्षा मंत्रालय की ओर से संसद में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर शिक्षकों के स्वीकृत पदों में रिक्तियों की दर 2021-22 में 19.69 फीसदी थी, जो सुधार के साथ साल 2022-23 में 15.17 फीसदी हो गई.
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