कूटनीति की दुनिया में 8 सितंबर 2026 को कुछ ऐसा हुआ जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की हो. एक तरफ ब्रिटेन के विदेश सचिव एड मिलिबैंड ने संसद में ऐलान किया कि ब्रिटेन, फ्रांस और कनाडा वेस्ट बैंक की इजरायली बस्तियों से होने वाले आयात पर पाबंदी लगाएंगे. ठीक दो घंटे बाद, इजरायल के विदेश मंचत्री गिदोन सार ने पलटवार करते हुए कहा कि पूर्वी यरुशलेम में ब्रिटिश एंबेसी बंद किया जा रहा है. ब्रिटिश अधिकारियों को गाजा समन्वय मिशन से निकाला जा रहा है और 12 ब्रिटिश सांसदों को इजरायल में घुसने से रोका जा रहा है. यह सिर्फ एक राजनयिक झड़प नहीं है. यह इजरायल के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है, जो दिखाता है कि उसके दोस्त एक-एक करके दूरी बना रहे हैं. लेकिन इस वक्त इजरायल अकेला क्यों पड़ रहा है…
विदेश मामलों के जानकार और JNU के रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. ए के पाशा इजरायल के अकेलेपन की 6 बड़ी वजहें बताते हैं…
वजह-1: ‘लाल रेखा’ जो पार हो गई
इस पूरे विवाद की जड़ है वेस्ट बैंक में इजरायली बस्तियों का फैलाव. अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत ये बस्तियां अवैध मानी जाती हैं. लेकिन बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार ने इनके विस्तार को प्राथमिकता बना रखा है.
आखिरी तिनका वह था जब इजरायल ने E1 इलाके में 1,200 नए घरों के निर्माण के लिए टेंडर जारी किए. E1 वह जगह है जो वेस्ट बैंक को दो हिस्सों में बांट देती है. इससे फिलिस्तीनी राज्य का बनना लगभग नामुमकिन हो जाता है. ब्रिटेन, यूरोपीय संघ और अन्य देशों ने लंबे समय से इजरायल को इसके खिलाफ चेतावनी दी थी.
मिलिबैंड ने संसद में साफ कहा, ‘यह एक लाल रेखा थी जिसे इजरायल ने पार कर दिया.’
वजह-2: ‘जातीय सफाई’ का आरोप और शब्दों का बदलता खेल
यह सिर्फ व्यापार प्रतिबंध नहीं है. मिलिबैंड ने ‘जातीय सफाई’ शब्द का इस्तेमाल किया, जो कूटनीति में बहुत भारी शब्द है.
मिलिबैंड ने कहा, ‘ब्रिटिश सरकार मानती है कि वेस्ट बैंक के कुछ इलाकों में फिलिस्तीनियों की जातीय सफाई हो रही है, जो बसने वाले आतंकवादी कर रहे हैं और इजरायली सरकार अक्सर इस पर आंखें मूंद लेती है.’
इजरायल के लिए यह बर्दाश्त से बाहर था. सार ने इसे ‘अपमानजनक झूठ’ करार दिया. लेकिन सच यह है कि अब यूरोपीय नेता अपनी भाषा बदल रहे हैं. वे अब सिर्फ ‘चिंता’ जताने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कार्रवाई कर रहे हैं.

वजह-3: 12 देशों ने खोला इजरायल के खिलाफ मोर्चा
यह सिर्फ ब्रिटेन, फ्रांस और कनाडा का फैसला नहीं है. 12 देशों के विदेश मंत्रियों ने एक संयुक्त बयान जारी किया. इनमें डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, आयरलैंड, नॉर्वे, पोलैंड, पुर्तगाल, स्पेन, स्वीडन और तीन G7 देश भी शामिल हैं.
इस बयान में उन्होंने दो-राज्य समाधान का समर्थन करते हुए कहा, ‘हमारी पूरी कोशिश है कि दो-राज्य समाधान की रक्षा की जानी चाहिए. हम एक न्यायपूर्ण और स्थायी शांति के लिए कार्रवाई करेंगे.’
फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बारो ने X पर लिखा, ‘हम ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्योंकि वेस्ट बैंक विस्फोट के कगार पर है. बस्तियों का पागलपन भरा विस्तार और चरमपंथी बसने वालों लोगों की फिलिस्तीनियों के खिलाफ हिंसा में इजाफा हो रहा है.’
La France va mettre fin au commerce avec les colonies israéliennes situées dans les Territoires palestiniens occupés, avec onze autres pays qui ont pris des engagements du même ordre.
Pourquoi ?
Parce que la Cisjordanie est au bord de l’explosion : expansion effrénée de la… pic.twitter.com/mJStC3HgOk
— Jean-Noël Barrot (@jnbarrot) September 8, 2026
यह पहली बार है जब इतने सारे पश्चिमी देशों ने इजरायल के खिलाफ इतने संगठित तरीके से मोर्चा खोला है.
वजह-4: नेतन्याहू सरकार की ‘जिद’
इजरायल ने न सिर्फ पलटवार किया, बल्कि बहुत तीखा पलटवार किया. सार ने ब्रिटेन पर ‘संप्रभु राज्य के आंतरिक मामलों में दखल’ देने का आरोप लगाते हुए कहा कि यह इजरायल के चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश है. इजरायल का यह रवैया ही उसे और अलग-थलग कर रहा है:
- ब्रिटिश वाणिज्य दूतावास बंद किया, जो फिलिस्तीनी प्राधिकरण से जुड़ा था.
- 12 ब्रिटिश सांसदों पर एंट्री बैन कर दी. इनमें जेरेमी कॉर्बिन, जराह सुल्ताना, डायने एबॉट और नाज शाह जैसे नाम शामिल हैं.
- गाजा समन्वय मिशन से ब्रिटेन को बाहर कर दिया.
- रामल्लाह में ब्रिटिश ट्रेनिंग प्रोग्राम बंद कर दिया.
इजरायली वित्त मंत्री बेजलेल स्मोट्रिच ने तो ब्रिटिश राजदूत को निष्कासित करने की मांग कर डाली. जब कोई देश अपने सबसे पुराने सहयोगियों के साथ इस तरह का व्यवहार करता है, तो वह अकेला कैसे नहीं पड़ेगा?

वजह-5: अमेरिका का ‘साथ’बदलने की आहट
इजरायल की सबसे बड़ी ताकत हमेशा अमेरिका रही है. इस बार भी अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी ने इस कदम की निंदा की, लेकिन क्या अमेरिका हमेशा इजरायल का साथ देगा?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि यूरोप का यह रुख अमेरिका को भी सोचने पर मजबूर कर सकता है. जब UK, फ्रांस और कनाडा जैसे आपके सबसे करीबी सहयोगी खिलाफ हो जाएं, तो वॉशिंगटन के लिए भी अंधा भरोसा करना मुश्किल हो जाता है.
वजह-6: ‘होलोकॉस्ट गिल्ट’ का खत्म होना
एक और बड़ा बदलाव रहा कि यूरोप का ‘होलोकॉस्ट गिल्ट’ अब इजरायल को राजनीतिक सुरक्षा कवच नहीं दे रहा. पहले यूरोपीय देश इजरायल की आलोचना करने से कतराते थे, क्योंकि उन्हें अपने ऐतिहासिक अपराध का एहसास था. अब वह दौर खत्म हो रहा है. यूरोपीय जनता का रुख बदल रहा है और सरकारें उस दबाव में आ रही हैं.
स्पेन ने तो EU-Israel एसोसिएशन समझौते को निलंबित करने की मांग कर दी है. इटली ने रक्षा समझौतों को रोक दिया है. 100 लाख से ज्यादा यूरोपीय नागरिकों ने EU-Israel समझौते को निलंबित करने की मांग वाली याचिका पर हस्ताक्षर किए हैं.
तो क्या वाकई इजरायल दुनिया भर में अकेला पड़ जाएगा?
फॉरेन एक्सपर्ट्स और JNU के प्रोफेसर डॉ. राजन कुमार 3 बड़े सिनेरियो बताते हैं:
- सिनेरियो-1: इजरायल अपनी जिद पर अड़ा रहेगा और यूरोपीय देश और कड़े कदम उठाएंगे. अगला कदम हो सकता है कि EU-Israel फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को निलंबित कर दे. इसका असर इजरायल की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.
- सिनेरियो-2: इजरायल में अक्टूबर 2026 में चुनाव हैं. अगर नेतन्याहू की सरकार बदलती है, तो नई सरकार यूरोप के साथ संबंध सुधारने की कोशिश कर सकती है, लेकिन तब तक नुकसान हो चुका होगा.
- सिनेरियो-3: अगर अमेरिका बीच में आता है और दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाता है, तो तनाव कम हो सकता है. हालांकि, अमेरिका खुद इजरायल की बस्ती नीति से सहमत नहीं है.
तो क्या इजरायल ‘पैरिया स्टेट’ बन रहा है?
क्रिश्चियन साइंस मॉनिटर ने इसे ‘पैरिया स्टेट की ओर बढ़ता कदम’ कहा है. रॉयटर्स ने लिखा, ‘यह इजरायल के बढ़ते कूटनीतिक अलगाव को रेखांकित करता है.’ सच तो यह है कि इजरायल अब उस दौर में नहीं है जब उसके सहयोगी हर बात मान लेते थे. बस्तियों का विस्तार, फिलिस्तीनियों के खिलाफ हिंसा और अंतरराष्ट्रीय कानून को न मानना अब यूरोप के लिए ‘चिंता’ नहीं, ‘कार्रवाई’ की वजहें बन गई हैं.


