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Explained: UP-पंजाब चुनाव बनेंगे पेट्रोल-डीजल सस्ता होने की चाबी! सरकार ने क्यों कहा- ‘2-3 महीने सब्र करें’?

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समाजवादी पार्टी (SP) अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि यूपी-पंजाब चुनाव नवंबर 2026 में हो सकते हैं और सरकार चाहे ते सितंबर में भी करवा सकती है. इस बीच केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी 2 जुलाई को कहा कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में 2-3 महीनों में बड़ा उलटफेर हो सकता है. पुराने ट्रेंड्स देखें तो नतीजा निकलता है कि चुनाव से पहले सरकार फिर तेल के दाम गिरा सकती है. साथ ही मौका दशहरा-दीवाली का भी होगा. लेकिन जब कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से गिरकर 65 डॉलर पर आ गया है, तो भी पेट्रोल-डीजल सस्ता क्यों नहीं हुआ. आखिर क्यों तुरंत सस्ता तेल आपकी गाड़ी की टंकी में नहीं आ रहा और कब खत्म होगा वो ईरान से लिया महंगा स्टॉक, जानेंगे एक्सप्लेनर में…

सरकार ने 2-3 महीने का इंतजार क्यों बताया?

यह मामला सिर्फ तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों का नहीं, बल्कि तेल कंपनियों की इन्वेंटरी साइकिल यानी तेल के स्टॉक का है. सरकार ने जब कहा, ‘2-3 महीनों में स्थिति साफ होगी’, तो उसका सीधा मतलब यह है कि फिलहाल जो तेल रिफाइन हो रहा है, वो वही पुराना और बहुत महंगा खरीदा गया तेल है. जब तक यह पुराना स्टॉक खत्म नहीं हो जाता, कंपनियां सस्ते तेल की खरीद का फायदा आप तक नहीं पहुंचा पाएंगी.

वो ‘महंगा कच्चा तेल’ कौन सा है और कितना बचा है?

अक्टूबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच का दौर तेल बाजार के लिए बेहद उथल-पुथल भरा था. ईरान-इजरायल युद्ध की वजह से कच्चा तेल (ब्रेंट क्रूड) कई बार 100 से 110 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया था. चूंकि भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से ज्यादा तेल आयात करता है, इसलिए IOC, BPCL और HPCL जैसी सरकारी तेल कंपनियों ने बिना रुके आपूर्ति बनाए रखने के लिए इन्हीं ऊंची कीमतों पर तेल का भारी स्टॉक कर लिया था.

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, तेल कंपनियों के पास आमतौर पर 45 से 60 दिन का कमर्शियल इन्वेंटरी स्टॉक होता है. अब जुलाई 2026 में हम उस स्थिति में हैं जहां अप्रैल-मई में खरीदा गया आखिरी महंगा तेल रिफाइन हो रहा है. इस स्टॉक का बड़ा हिस्सा अगस्त के अंत तक खप जाएगा और सितंबर-अक्टूबर तक रिफाइनरियों में सिर्फ सस्ता खरीदा गया कच्चा तेल प्रोसेस होना शुरू हो सकता है. पेट्रोलियम मंत्री का 2-3 महीने का जो समय है, वह ठीक इसी स्टॉक रोटेशन पीरियड को दर्शाता है.

74,781 करोड़ के घाटे का गणित: आखिर यह हुआ कैसे?

हरदीप सिंह पुरी ने बताया कि पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2026) में सरकारी तेल कंपनियों को 74,781 हजार करोड़ रुपए का भारी घाटा हुआ है. यह घाटा कोई मामूली बात नहीं है:

  • खरीद कीमत: कंपनियों ने जो कच्चा तेल पहले खरीदा, उसकी औसत कीमत करीब 100 डॉलर प्रति बैरल थी.
  • वर्तमान बाजार कीमत: जब वो तेल रिफाइन होकर बाजार में बिक रहा है, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत गिरकर 65-70 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई है.
  • अंडर-रिकवरी: इसका मतलब है कि कंपनियां 100 डॉलर का तेल खरीदकर, उससे बना पेट्रोल-डीजल 65 डॉलर की मौजूदा कीमत के हिसाब से बेच रही हैं. हर बैरल पर भारी नुकसान हो रहा है. कुल मिलाकर यह अंडर-रिकवरी तिमाही के अंत में 74 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा बैठी.

सरकार का तर्क है कि जिन कंपनियों ने कोरोना काल और पिछले संकटों में घाटा सहकर जनता को सस्ता तेल दिया, उन्हें अब उबरने का मौका तो देना ही होगा.

कब खत्म होगा महंगा तेल और कब शुरू होगा सस्ता तेल?

यह पूरे एक्सप्लेनर की सबसे अहम टाइमलाइन है. इंटरनेशनल मार्केट में कच्चा तेल मई 2026 के बाद से लगातार सस्ता हुआ है. इसकी दो बड़ी वजहें रहीं:

1. ईरान-इजरायल के बीच युद्धविराम की खबरों से सप्लाई का डर खत्म हुआ.
2. चीन की अर्थव्यवस्था में सुस्ती की वजह से क्रूड ऑयल की वैश्विक मांग कम हो गई.

सस्ते तेल की शुरुआत की टाइमलाइन:

  • मई 2026 के आखिर में सरकारी कंपनियों ने 68-72 डॉलर प्रति बैरल की दर से तेल की बुकिंग शुरू की.
  • यह तेल भारत के बंदरगाहों तक पहुंचने और रिफाइनरियों तक आने में 20-30 दिन लगते हैं. मतलब यह जुलाई की शुरुआत से रिफाइनरियों में पहुंचना शुरू हुआ.
  • पुराना महंगा स्टॉक पहले से मौजूद है, इसलिए सस्ता तेल अभी प्रोसेस नहीं हो रहा, बल्कि स्टॉक में पीछे लग रहा है.
  • अगस्त के आखिर से सितंबर की शुरुआत तक रिफाइनरियां मुख्य रूप से सस्ते क्रूड को प्रोसेस करना शुरू कर देंगी.
  • अक्टूबर यानी दशहरा तक तो पूरा सिस्टम सस्ते तेल पर शिफ्ट हो चुका होगा.

2-3 महीनों में कीमतों में कैसा होगा उलटफेर?

एक्सपर्ट्स का अनुमान और हरदीप सिंह पुरी के बयान के मायने समझें, तो अक्टूबर 2026 तक तेल कंपनियां पूरी तरह से घाटे से बाहर निकल चुकी होंगी. जैसे ही कंपनियों की बैलेंस शीट ठीक होगी, सरकार और कंपनियों के पास कीमतें घटाने की पूरी गुंजाइश होगी.

इंडस्ट्रियल एक्सपर्ट्स के अनुमान के मुताबिक, अगर कच्चे तेल की कीमतें 65-75 डॉलर के बीच स्थिर रहती हैं तो पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में 8 से 12 रुपये प्रति लीटर तक की कमी मुमकिन है. यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि सरकार एक्साइज ड्यूटी में मामूली बढ़ोतरी कर घाटे की भरपाई करती है या सीधे जनता को फायदा देती है. फिलहाल संकेत तो राहत देने के ही हैं.

पेट्रोल पंप मालिकों और आम आदमी पर क्या असर होगा?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, तेल कीमतों में गिरावट से पेट्रोल पंप मालिकों को भी फायदा होगा क्योंकि उनका वर्किंग कैपिटल का दबाव कम होगा और बिक्री बढ़ेगी. लेकिन असली फायदा आम लोगों को तब मिलेगा जब दशहरा और दीवाली जैसे त्योहारों के सीजन में महंगाई पर यह बड़ी राहत सामने आएगी.

कुल सार यह निकलता है कि पेट्रोल-डीजल के दामों में तुरंत कटौती न होने के पीछे कोई साजिश नहीं, बल्कि इन्वेंटरी मैनेजमेंट का एक ठोस गणित है. सरकारी तेल कंपनियां फिलहाल 100 डॉलर प्रति बैरल वाला पुराना तेल रिफाइन कर रही हैं और 70 डॉलर के हिसाब से बेच रही हैं, जिससे 74,781 करोड़ रुपए का घाटा हो चुका है.

अगस्त-सितंबर तक यह महंगा स्टॉक खत्म हो जाएगा और अक्टूबर यानी दशहरा तक रिफाइनरियों में सस्ता कच्चा तेल प्रोसेस होना शुरू होगा. तब पेट्रोल-डीजल की कीमतों में 8 से 12 रुपए तक की बड़ी गिरावट की पूरी संभावना है. सरकार का 2-3 महीने का इंतजार वाला बयान इसी गणित पर टिका है.

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