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Explained: ईरान जंग पर ट्रंप और नेतन्याहू फिर आमने-सामने! 78 सालों में 14 अमेरिकी राष्ट्रपति बदले, इजरायल से रिश्ते क्यों नहीं?

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28 फरवरी 2026 की तारीख ने पूरी दुनिया की सियासत का नक्शा ही बदल कर रख दिया. इस दिन अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर सबसे बड़ा सैन्य हमला बोला. लेकिन महज दो महीने के अंदर ही, जंग के मोर्चे पर एक नई और बड़ी लड़ाई छिड़ गई. अब लड़ाई ईरान के खिलाफ नहीं, बल्कि अमेरिका और इजरायल के आपसी रिश्तों की अग्निपरीक्षा बन चुकी है. एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जंग खत्म करने के लिए डील चाहते हैं, तो दूसरी तरफ इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू हमले जारी रखने पर अड़े हैं. 20 मई 2026 को दोनों नेताओं के बीच फोन पर जो बातचीत हुई, वो इतनी तीखी थी कि उसे ‘मुश्किल’ और ‘नाटकीय’ करार दिया गया. इसके बावजूद अमेरिका और इजरायल दुश्मन नहीं बनेंगे, आखिर क्यों?

फोन कॉल की वो रात, जब ‘बीबी के बालों में आग लगी हुई थी’

20 मई की शाम को राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री नेतन्याहू के बीच एक घंटे तक फोन पर तीखी बहस हुई. ट्रंप ने नेतन्याहू को बताया कि अमेरिका, कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता में ईरान के साथ एक ‘लेटर ऑफ इंटेंट’ (इरादा पत्र) तैयार किया जा रहा है, जिस पर दस्तखत होते ही जंग औपचारिक रूप से खत्म हो जाएगी. फिर 30 दिनों तक होर्मुज स्ट्रेट और ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम जैसे मसलों पर बातचीत होगी. लेकिन ट्रंप की ये बात सुनकर नेतन्याहू आगबबूला हो गए.

NYT की रिपोर्ट के मुताबिक, एक अमेरिकी सूत्र ने बताया कि ‘उस कॉल के बाद बीबी (ट्रंप नेतन्याहू को प्यार से बीबी कहते हैं) के बालों में आग लगी हुई थी.’ नेतन्याहू का कहना था कि डील की बजाय सेना को और हमले करने चाहिए, ताकि ईरान पूरी तरह कमजोर हो जाए. उन्होंने साफ लफ्जों में ट्रंप से कहा कि हमलों को रोकना ‘एक बड़ी गलती’ है.

 

ईरान पर हमला रोकने वाली ट्रंप की बात से सहमत नहीं नेतन्याहू
ईरान पर हमला रोकने वाली ट्रंप की बात से सहमत नहीं नेतन्याहू

एक-दूजे से क्यों टकरा रहे हैं ट्रंप और नेतन्याहू?

विदेश मामलों के जानकार और JNU प्रोफेसर डॉ. राजन कुमार कहते हैं, ‘ये टकराव सिर्फ दो नेताओं का नहीं, बल्कि दो अलग-अलग रणनीतियों का है. ट्रंप के लिए ये जंग अब एक सियासी और आर्थिक सिरदर्द बन चुकी है. ईरान ने जवाबी कार्रवाई में होर्मुज स्ट्रेट को लगभग पूरी तरह ब्लॉक कर दिया है, जिससे दुनिया की 20 फीसदी तेल सप्लाई ठप है. नतीजा ये हुआ कि अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें आसमान छू रही हैं और ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग गिरती जा रही है. अप्रैल 2026 में ट्रंप की आर्थिक नीतियों पर अमेरिकियों का भरोसा तेजी से घटा है.’

दूसरी ओर, नेतन्याहू का रुख बिल्कुल सख्त है. उनकी तीन शर्तें हैं:

  1. ईरान का सारा संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) देश से बाहर जाए.
  2. ईरान अपना बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम खत्म करे.
  3. ईरान पूरे मिडिल ईस्ट में अपने समर्थन वाले सशस्त्र समूहों (जैसे लेबनान में हिजबुल्लाह और यमन में हूती) को मदद देना बंद करे.

नेतन्याहू का मानना है कि बिना इन शर्तों के डील करना ईरान को बचने का मौका देने जैसा होगा.

इसके बावजूद इजरायल को मदद देने से अमेरिका पीछे क्यों नहीं हटता?

ये कोई पहली बार नहीं है जब कोई अमेरिकी राष्ट्रपति इजरायल के किसी कदम से नाराज हुआ हो. लेकिन दिलचस्प बात ये है कि वक्त-बेवक्त होने वाली इस खटास के बावजूद इजरायल को मिलने वाली अमेरिकी मदद कभी नहीं रुकती. वजह क्या है? इसकी वजह सिर्फ नेतन्याहू नहीं, बल्कि अमेरिकी राजनीति और रणनीति का वो अटूट गठजोड़ है, जो पिछले 78 सालों से लगातार मजबूत होता जा रहा है.

1. रणनीतिक संपत्ति: एक ‘न डूबने वाला एयरक्राफ्ट कैरियर’

अमेरिका के लिए इजरायल कोई आम सहयोगी नहीं, बल्कि एक बेहद अहम ‘रणनीतिक संपत्ति’ है. 1967 की छह-दिवसीय जंग के बाद से ही अमेरिकी नीति-निर्माताओं ने इजरायल को मिडिल ईस्ट में अपनी रणनीति का एक मजबूत हथियार मान लिया था. ये वो दौर था जब सोवियत संघ अरब देशों को समर्थन देकर इस इलाके में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा था. ऐसे में इजरायल, अमेरिका के लिए एक ऐसी ताकत बनकर उभरा जो इस प्रभाव को रोक सकता था. तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री अलेक्जेंडर हैग ने तो यहां तक कह दिया था कि ‘इजरायल दुनिया का सबसे बड़ा अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर है, जिसे डुबोया नहीं जा सकता.’ 

1973 का योम किप्पुर युद्ध निर्णायक साबित हुआ. जब इजरायल पर मिस्र और सीरिया ने एक साथ हमला बोला, तो अमेरिका ने भारी मात्रा में आपातकालीन सैन्य आपूर्ति शुरू कर दी. इस घटना ने ये साफ कर दिया कि इजरायल का अस्तित्व बचाना अमेरिका का पहला काम है. इसके बाद 1970 के दशक के आखिर से, अमेरिकी मदद कर्ज से बढ़कर अनुदान में बदल गई और फिर ये सिलसिला कभी नहीं रुका.

2. IPAC से लेकर अरबों डॉलर की सैन्य मदद तक

हर साल करीब 3.8 बिलियन डॉलर की सैन्य सहायता अमेरिका से इजरायल को जाती है. ये सिर्फ पैसे नहीं हैं. ये एक ऐसा फंड है जिसमें से 80 फीसदी रकम इजरायल को अमेरिकी कंपनियों से ही हथियार खरीदने पर खर्च करनी होती है. इसका मतलब साफ है- अमेरिकी सैन्य उद्योग के लिए इजरायल एक पक्का और सबसे बड़ा ग्राहक है.

इजरायल को दी जाने वाली ये ‘सहायता’ असल में अमेरिकी रक्षा उद्योग के लिए एक सब्सिडी है और इजरायल नए-नवेले अमेरिकी हथियारों की टेस्टिंग का मैदान भी. ओबामा प्रशासन ने इजरायल को 38 बिलियन डॉलर की सैन्य सहायता का जो पैकेज दिया था, वो इसी सोच का नतीजा था. फिर चाहे राष्ट्रपति कोई भी रहा हो- ट्रंप हो, बाइडेन हो या ओबामा, ये आंकड़ा कभी नहीं घटा.

 

ओबामा प्रशासन ने इजरायल को 38 बिलियन डॉलर की सैन्य सहायता का जो पैकेज दिया था
ओबामा प्रशासन ने इजरायल को 38 बिलियन डॉलर की सैन्य सहायता का जो पैकेज दिया था

इसके पीछे एक और बड़ी ताकत काम करती है- अमेरिकन इजरायल पब्लिक अफेयर्स कमेटी यानी  AIPAC. ये एक ऐसा शक्तिशाली लॉबिंग ग्रुप है जो डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन, दोनों ही पार्टियों के नेताओं पर अपनी गहरी पकड़ रखता है. लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि AIPAC कोई नई रणनीति नहीं बनाता, बल्कि ये तो अमेरिकी हितों और इजरायल की अहमियत के पहले से मौजूद विचार को और मजबूती देता है.

3. सिर्फ पैसा नहीं, टेक्नोलॉजी का भी खेल

डॉ. राजन कुमार कहते हैं कि ये रिश्ता सिर्फ लेन-देन का नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी और इनोवेशन का भी है. आयरन डोम मिसाइल डिफेंस सिस्टम को ही ले लीजिए. इसे बनाने में अमेरिका ने 1.6 बिलियन डॉलर से ज्यादा का योगदान दिया है. लेकिन इसका असली फायदा किसे हुआ? अमेरिकी कंपनियों ने ही इसके कलपुर्जे और सॉफ्टवेयर बनाए. इसे सीधे शब्दों में कहें तो ये एक ‘प्रॉफिट-डिपेंडेंट कंफ्लिक्ट स्ट्रक्चर’ है, यानी जितनी ज्यादा जंग, उतनी ज्यादा बिक्री. यही कारण है कि CIA के पूर्व प्रमुख और पूर्व रक्षा मंत्री जैसे बड़े अधिकारी भी रिटायरमेंट के बाद डिफेंस कंपनियों के बोर्ड में शामिल हो जाते हैं, ताकि ये रिश्ता और गहरा हो.

नेतन्याहू खुद अब इस निर्भरता को कम करना चाहते हैं. उन्होंने हाल ही में कहा कि वो 10 सालों में अमेरिकी सैन्य सहायता को शून्य पर ले आना चाहते हैं और इजरायल को आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं. इसके पीछे एक बड़ी वजह ये भी है कि अमेरिकी जनता के बीच इजरायल की छवि कमजोर हो रही है. प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे के मुताबिक, लगभग 60 फीसदी अमेरिकी अब इजरायल को नकारात्मक नजर से देखते हैं.

तो क्या अमेरिका और इजरायल का रिश्ता टूट जाएगा?

विदेश मामलों के जानकारी और JNU के रिटायर्ड प्रोफेसर ए. के. पाशा कहते हैं, ‘ये सिर्फ दो नेताओं की अनबन नहीं है, बल्कि अमेरिकी राजनीति का वो चेहरा है जो पिछले 78 सालों से लगातार एक जैसा है. टकराव चाहे जितना भी बड़ा क्यों न हो, इस रिश्ते की बुनियाद में रणनीति, पैसा और टेक्नोलॉजी की जो तिहरी रस्सी बंधी है, वो इतनी आसानी से टूटने वाली नहीं.’

फिलहाल, पूरी दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या ट्रंप और नेतन्याहू के बीच ये सियासी रस्साकशी एक ऐतिहासिक डील तक पहुंचती है, या फिर ईरान के खिलाफ एक और खतरनाक सैन्य हमले का एलान होता है.

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