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ट्रंप के टैरिफ का किस पर पड़ा सबसे ज्यादा असर? IMF की चौंकाने वाली रिसर्च आई सामने

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इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) की पूर्व डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर और अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने US टैरिफ के असर को लेकर कहा कि इसके नतीजे अमेरिकी ग्राहकों के लिए एक परेशान करने वाली सच्चाई की ओर इशारा करते हैं. गीता गोपीनाथ ने एक्स पर पोस्ट कर कहा कि IMF के एक वर्किंग पेपर से पता चलता है कि 2025 में अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ का विदेशी एक्सपोर्टर्स पर बहुत कम असर पड़ा है. इसके बजाय अमेरिकी खरीदार ज़्यादातर सस्ते सप्लायर्स की ओर मुड़ गए, जिनके प्रोडक्ट्स अक्सर कम क्वालिटी के होते थे.

अर्थशास्त्री जेबिन आन, लोरेंजो रोटुनो और मिशेल रूटा के लिखे IMF वर्किंग पेपर में फरवरी और दिसंबर 2025 के बीच आयात और टैरिफ से जुड़े US सेंसस के विस्तृत डेटा का विश्लेषण किया गया. रिसर्चर्स ने इस बात की जांच की कि टैरिफ बढ़ने से हजारों सामानों की कीमतों, सोर्सिंग के फैसलों और प्रोडक्ट की क्वालिटी पर क्या असर पड़ा.

स्टडी से पता चला कि विदेशी एक्सपोर्टर्स ने US टैरिफ के जवाब में कीमतें कम नहीं कीं. प्रोडक्ट के लेवल पर बारीक जानकारी देखें तो टैरिफ बढ़ने के बाद भी एक्सपोर्ट की कीमतें लगभग वैसी ही बनी रहीं. इसका मतलब था कि टैरिफ की वजह से जो अतिरिक्त लागत आई, उसका बोझ अमेरिका में इंपोर्टर्स और खरीदारों पर डाला गया. स्टडी में पाया गया कि जिस समय की जांच की गई, उस दौरान औसत टैरिफ दरें लगभग 8 प्रतिशत बढ़ गईं, जिससे इंपोर्ट में लगभग 3.6% की गिरावट आई.

IMF की स्टडी क्या कहती है? 
टैरिफ बढ़ने के बाद ज्यादा कीमत वाले सप्लायर्स के US मार्केट छोड़ने की संभावना ज्यादा थी, जबकि कम कीमत वाले सप्लायर्स ने एंट्री की. स्टडी के अनुसार, कीमतों में जो गिरावट दिखी, उसमें से लगभग 65% की वजह सप्लायर्स के बदलने का यही पैटर्न था. रिसर्चर्स का तर्क है कि कम कीमतों का मतलब हमेशा बेहतर वैल्यू नहीं होता. 

2023 और 2024 के डेटा की जांच में उन्होंने पाया कि अमेरिकी खरीदारों को आकर्षित करने वाले कई नए सप्लायर्स का अपील स्कोर कम था. जब इन क्वालिटी-संबंधी अंतरों को ध्यान में रखा गया, तो कीमतों में दिखने वाला ज्यादातर फायदा गायब हो गया. स्टडी का अनुमान है कि 2025 के टैरिफ के बाद कीमतों में देखी गई गिरावट का लगभग आधा हिस्सा असल में कम-क्वालिटी वाले सप्लायर्स की ओर झुकाव को लेकर था.

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