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Sbi Research:अमेरिकी फेडरल रिजर्व में ‘केविन वॉर्श’ युग की शुरुआत से क्या बदलेगा? एसबीआई रिसर्च की चेतावनी – Us Fed Under Kevin Warsh: Sbi Research Warns Of Global Market Volatility Amid ‘less Talking’ Strategy

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दुनिया भर के शेयर बाजारों और केंद्रीय बैंकों के काम करने का तरीका जल्द ही बदलने वाला है। अमेरिका के केंद्रीय बैंक ‘फेडरल रिजर्व’ के नए चेयरमैन केविन वॉर्श एक ऐसी नीति लेकर आ रहे हैं, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों में एक बड़ा भूचाल ला सकती है। भारतीय स्टेट बैंक रिसर्च की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, वॉर्श के नेतृत्व में फेडरल रिजर्व का कामकाज हाल के वर्षों की ज्यादा संवाद वाली शैली से बिल्कुल अलग होगा।

आइए आसान भाषा में समझते हैं कि अमेरिका के केंद्रीय बैंक में हो रहा यह बदलाव दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर क्या असर डालेगा।

वॉर्श के नेतृत्व में फेडरल रिजर्व की रणनीति में क्या बड़े बदलाव होंगे?

एसबीआई रिसर्च के मुताबिक, वॉर्श का नजरिया महज सख्त होने के बजाय ‘संस्थागत’ है। वे यह कोशिश कर रहे हैं कि फेड अपनी भावी नीतियों को लेकर कम से कम संकेत दे। इसका मतलब यह है कि अब बाजार को केंद्रीय बैंक के बयानों से ज्यादा सीधे आर्थिक आंकड़ों पर निर्भर रहना होगा। वॉर्श नीतिगत उपकरणों को कम करने, बैलेंस शीट को छोटा रखने और अपने बयानों पर संयम बरतने के पक्षधर हैं।

कम बातचीत वाली यह रणनीति मौजूदा हालात में जोखिम भरी क्यों है?

शांत और स्थिर माहौल में केंद्रीय बैंक का कम बोलना उसकी विश्वसनीयता बढ़ा सकता है, लेकिन आज की दुनिया बहुत जटिल दौर से गुजर रही है। मौजूदा समय में भू-राजनीतिक तनाव, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से हो रहे बड़े बदलाव, उच्च राजकोषीय घाटा और टैरिफ की भारी अनिश्चितताएं मौजूद हैं।

इस स्थिति को लेकर रिपोर्ट में साफ तौर पर आगाह किया गया है, “कम बोलने वाला फेड तभी काम करेगा जब दुनिया में भ्रम कम हो”। अगर फेड अपनी नीतियां बदलने के लिए स्पष्ट पैमाने तय नहीं करता है, और बाजारों को फेड की प्रतिक्रियाओं के बारे में पर्याप्त स्पष्टता नहीं मिलती है, तो यह रणनीति एक बड़ा जोखिम साबित हो सकती है।

ग्लोबल मार्केट और भारत जैसे देशों पर इसका क्या असर पड़ेगा?

फेडरल रिजर्व के संवाद और नीतियों में होने वाले इस बदलाव का सीधा असर ट्रेजरी यील्ड, अमेरिकी डॉलर की मजबूती, वैश्विक पूंजी प्रवाह और दुनिया भर में कर्ज लेने की लागत पर पड़ेगा।

वॉर्श की नीतियों से अमेरिकी डॉलर और मजबूत हो सकता है। मजबूत डॉलर अमेरिका के अंदर आयात की लागत घटाकर वहां की महंगाई को तो कम करेगा, लेकिन दूसरी तरफ यह अमेरिकी निर्यातकों को नुकसान पहुंचाएगा। इसका सबसे बड़ा और नकारात्मक असर उन अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा जिन पर डॉलर में भारी कर्ज है, क्योंकि उनके लिए कर्ज की किस्तें चुकाना बहुत महंगा हो जाएगा। इसके अलावा, अगर अमेरिकी बॉन्ड यील्ड ऊंचे स्तर पर बनी रहती है, तो बिना ब्याज दरें बढ़ाए ही वित्तीय स्थितियां सख्त हो सकती हैं, जिसका असर पूरी दुनिया के बाजारों पर फैलेगा।

क्या फेडरल रिजर्व जीत पाएगा बाजार का भरोसा?

एसबीआई रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में एक बेहद सटीक बात कही है, “एक विश्वसनीय फेड पूरी दुनिया के लिए सार्वजनिक संपत्ति है, जबकि एक भ्रमित फेड वैश्विक स्तर पर एक टैक्स (बोझ) के समान है”।

केविन वॉर्श के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी संस्थागत स्वतंत्रता और नीतिगत विश्वसनीयता के बीच सही संतुलन बनाने की होगी। अगर वे अपनी नीतिगत रूपरेखा को पारदर्शी रखते हुए मौद्रिक अनुशासन वापस लाने में सफल होते हैं, तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भरोसा मजबूत होगा। लेकिन, अगर उनके ‘कम बोलने’ की नीति से बाजार में अनिश्चितता फैली या इसे राजनीति से प्रेरित माना गया, तो यह दुनिया भर के वित्तीय बाजारों में भारी उथल-पुथल पैदा कर सकता है।

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