फेसबुक स्क्रॉल करते हुए अचानक एक प्यारा सा वीडियो आता है कि एक नन्हा बंदर डायपर पहने किसी इंसान की गोद में दूध की बोतल पी रहा है. देखने में क्यूट, मन को छू लेने वाला. लेकिन इस वीडियो के पीछे छुपी है भायनक सच्चाई. अमेरिका में इन दिनों एक ऐसा काला कारोबार फल-फूल रहा है जिसमें बंदरों और लीमर जैसे प्राइमेट्स की सोशल मीडिया पर खुलेआम खरीद-बिक्री हो रही है. ये मासूम जानवर जान देकर इसकी कीमत चुका रहे हैं. यह कहानी सिर्फ जानवरों की तस्करी की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की है, जो एक क्लिक में पूरी प्रजाति को खत्म करने पर तुली है…
छह हफ्तों में 1,600 बंदर और ये सिर्फ शुरुआत
‘प्राइमेट्स फॉर परचेज: द सर्ज इन सेल्स ऑन सोशल मीडिया इन द यूएस’ रिपोर्ट ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं. इसे अमेरिका की तीन बड़ी संस्थाओं- एसोसिएशन ऑफ जूज एंड एक्वेरियम्स (AZA), इंटरनेशनल फंड फॉर एनिमल वेलफेयर (IFAW) और वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड (WWF) ने मिलकर तैयार की है.
इस रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में महज छह हफ्तों तक अमेरिका में सोशल मीडिया पर नजर रखी गई. इस दौरान 122 सोशल मीडिया यूजर्स ने 1,131 पोस्ट डालीं, जिनमें 1,614 जिंदा प्राइमेट्स को बिक्री के लिए रखा गया था. ये आंकड़ा सिर्फ उन जानवरों का है जो पकड़े गए, असल संख्या इससे कहीं ज्यादा होने का अनुमान है.
कीमतों की बात करें तो ये 250 डॉलर (करीब 24,000 रुपये) से लेकर 6,500 डॉलर (करीब 6.26 लाख रुपये) तक जाती है. कीमत इस बात पर निर्भर करती है कि जानवर कितना छोटा है, कितनी दुर्लभ और कितनी आसानी से उपलब्ध है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक, कम से कम 12 तरह के प्राइमेट्स की बिक्री हो रही है, जिनमें मकाक, कैपुचिन, मार्मोसेट, स्पाइडर मंकी, टैमरिन, स्क्विरल मंकी, वर्वेट, लीमर, बुश बेबी, चिंपैंजी, हाउलर मंकी और आउल मंकी शामिल हैं.
सबसे ज्यादा बिकने वाला है मकाक (839 लिस्टिंग). इसके बाद मार्मोसेट (293) और कैपुचिन (275) का नंबर आता है. ये जानवर कोई मामूली प्रजाति नहीं हैं. इनमें चिंपैंजी जैसे जानवर भी शामिल हैं, जो इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) की रेड लिस्ट में हैं. कॉटन-हेडेड टैमरिन जैसी प्रजाति तो ‘गंभीर रूप से संकटग्रस्त’ कैटेगरी में आती है.

सोशल मीडिया पर खुलेआम कैसे चल रहा है ये कारोबार?
इसका जवाब छुपा है शब्दों के खेल में. ये लोग कभी ‘बिक्री’ (सेल) शब्द का इस्तेमाल नहीं करते. इसकी जगह लिखते हैं- ‘मंकी रिहोमिंग’, ‘रेस्क्यू’ या ‘एडॉप्शन’. भाषा का ये जादू प्लेटफॉर्म्स के कंटेंट फिल्टर को चकमा दे देता है. सोशल मीडिया कंपनियों ने जिंदा जानवरों की बिक्री पर रोक लगा रखी है, लेकिन ‘गोद लेने’ या ‘नया घर दिलाने’ जैसे शब्दों पर किसी की नजर नहीं पड़ती.
WWF के वाइस प्रेसिडेंट क्रॉफर्ड एलन कहते हैं, ‘ऑनलाइन एक प्राइमेट खरीदना सिर्फ एक जानवर का मामला नहीं है. ये मां की हत्या को बढ़ावा देता है, आने वाली पीढ़ियों के खत्म होने का कारण बनता है और इस खतरनाक मिथक को बल देता है कि बंदर पालतू जानवर हो सकते हैं.’
IFAW की यूएस कंट्री डायरेक्टर डेनियल केसलर का कहना है, ‘अमेरिका में एक प्राइमेट खरीदने के लिए बस एक फोन और एक सोशल मीडिया अकाउंट चाहिए. बस एक क्लिक में नेक इरादे वाले एनिमल लवर्स एक ऐसी क्रिमिनल पाइपलाइन में फंस जाते हैं जहां जानवरों को आखिरी कीमत चुकानी पड़ती है.’
बंदरों के लिए एक घर की तलाश, जिंदगी भर का ट्रॉमा
अब जरा सोचिए कि ये मासूम जानवर खरीदार तक पहुंचते-पहुंचते किस नर्क से गुजरते हैं. रिपोर्ट बताती है कि ज्यादातर खरीदार छोटे बच्चे चाहते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि बेबी मंकी आसानी से इंसानों से घुल-मिल जाएंगे. लेकिन एक बेबी मंकी को पाने के लिए पहले उसकी मां को मारना पड़ता है.
CBS न्यूज की एक इन्वेस्टिगेशन में US फिश एंड वाइल्डलाइफ सर्विस के स्पेशल एजेंट जिम स्टाइनबॉ का कहना है कि कि मैक्सिको के जंगलों में शिकारी मादा स्पाइडर मंकी को पेड़ से गोली मार देते हैं. उसकी पीठ से चिपके बच्चे को छीन लेते हैं. स्टाइनबॉ कहते हैं, ‘बच्चों को पाने के लिए मां को मारना ही होगा और हो सकता है कि मां और बच्चे को बचाने के लिए पूरा परिवार सामने आ जाए. एक-दो बच्चों के लिए दर्जनों बंदरों को मारना पड़ सकता है.’
इसके बाद शुरू होता है तस्करी का दर्दनाक सफर. बच्चों को बेहोश करके, बांधकर छोटे-छोटे बैग में ठूंस दिया जाता है. न खाना, न पानी. बहुत सारे बंदर इस सफर में ही दम तोड़ देते हैं. जो बच जाते हैं, उन्हें जिंदगी भर का ट्रॉमा झेलना पड़ता है. रिपोर्ट के शब्दों में, ‘बहुत सारे प्राइमेट्स जिंदगी भर का ट्रॉमा झेलते हैं या खरीदार तक पहुंचने से पहले ही मर जाते हैं.’
कुछ मामलों में तो इससे भी ज्यादा हैवानियत होती है. IFAW की रिपोर्ट बताती है कि कई बार इन जानवरों के दांत दर्दनाक तरीके से निकाल दिए जाते हैं, ताकि ये इंसानों को काट न सकें.
मैक्सिको बॉर्डर: तस्करी का सबसे बड़ा और मौत का रास्ता
अमेरिका में प्राइमेट्स की तस्करी का सबसे बड़ा रास्ता मैक्सिको बॉर्डर है. हर साल 2,000 से ज्यादा प्राइमेट्स को अमेरिकी सीमा के पार लाने की कोशिश की जाती है. स्पाइडर मंकी सबसे ज्यादा तस्करी होने वाली प्रजातियों में से एक है. पिछले 18 महीनों में अकेले टेक्सास-मैक्सिको बॉर्डर पर करीब 90 बेबी स्पाइडर मंकी जब्त किए गए और ये तो सिर्फ टिप ऑफ द आइसबर्ग है.
कुछ मामलों में तो ड्रग कार्टेल भी इस तस्करी में शामिल हैं. अप्रैल 2026 में टेक्सास के ब्राउन्सविले में एक शख्स पकड़ा गया जिसके बैग में पांच मैक्सिकन स्पाइडर मंकी और एक किंकाजू बंद थे.
क्या ये सब गैरकानूनी है या नहीं?
सुनने में अजीब लगेगा, लेकिन अमेरिका में प्राइमेट्स को पालतू जानवर के तौर पर रखने पर कोई संघीय प्रतिबंध नहीं है. हां, स्पाइडर मंकी जैसी संकटग्रस्त प्रजातियों को एनडेंजर्ड स्पीशीज एक्ट के तहत रखना गैरकानूनी है, लेकिन बाकी प्रजातियों के लिए कानून का ढांचा बेहद कमजोर है.
राज्यों के अपने-अपने कानून हैं. आधे से कुछ ज्यादा राज्यों में प्राइमेट रखने पर पूरी तरह रोक है, लेकिन बाकी राज्यों में या तो कुछ हद तक पाबंदी है या फिर कोई पाबंदी ही नहीं. मिसौरी जैसे राज्य में हर साल 35 से 50 प्राइमेट्स बिकते हैं और अनुमान है कि राज्य में 400 से 1,000 पालतू प्राइमेट्स मौजूद हैं.
WWF की रिपोर्ट के मुताबिक, ‘असंगत या कमजोर कानून प्राइमेट तस्करी को कम जोखिम और ज्यादा मुनाफे वाला क्राइम बिजनेस बना देते हैं.’
इस पूरे संकट के बीच एक उम्मीद की किरण भी है कैप्टिव प्राइमेट सेफ्टी एक्ट. ये एक प्रस्तावित संघीय कानून है जो अमेरिका में प्राइमेट्स के निजी स्वामित्व और उनकी खरीद-फरोख्त पर पूरी तरह रोक लगाएगा. लेकिन ये बिल सालों से कांग्रेस में अटका पड़ा है.

प्राइमेट्स की तस्करी इंसानों लिए भी खतरा
प्राइमेट्स से इंसानों में फैलने वाली बीमारियों (जूनोटिक डिजीज) का खतरा भी बहुत ज्यादा है. इसके अलावा जब ये जानवर बड़े होते हैं तो इनकी शारीरिक ताकत और जटिल व्यवहार के कारण ये मालिकों के लिए भी खतरनाक साबित हो सकते हैं.
पूर्व US फिश एंड वाइल्डलाइफ एजेंट एड न्यूकमर कहते हैं, ‘जंगली प्राइमेट्स अब उसी खतरे का शिकार हो रहे हैं जो नादानी भरी चाहत और सोची-समझी लालच का नतीजा है. ये रिपोर्ट अमेरिका में प्राइमेट तस्करी की बढ़ती समस्या को उजागर करती है. अब कार्रवाई का वक्त है.’
