अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 25 मई 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट लिखकर पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया. उन्होंने सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किये, मिस्र, जॉर्डन, UAE और बहरीन मुस्लिम देशों के नेताओं से बड़ी अपील की. ट्रंप ने साफ कहा कि अब वक्त आ गया है कि आप सब इजरायल के साथ रिश्ते मजबूत करें और अब्राहम अकॉर्ड पर दस्तखत करें. ट्रंप ने इसे ‘Mandatory Request’ यानी अनिवार्य अनुरोध बताया. उन्होंने यहां तक कह दिया कि जो देश ऐसा नहीं करेंगे, उन्हें ईरान डील का हिस्सा नहीं बनना चाहिए. इससे उनकी बुरी नीयत साबित होती है.’
इससे ठीक पहले शनिवार को ट्रंप ने इन आठों देशों के नेताओं के साथ एक कॉन्फ्रेंस कॉल की थी. अमेरिकी न्यूज आउटलेट Axios की रिपोर्ट के मुताबिक, जब ट्रंप ने कॉल के दौरान इजरायल को मान्यता देने की बात उठाई, तो लाइन पर कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया. कई नेता इस मांग को सुनकर अचंभे में पड़ गए. लेकिन सवाल ये है कि आखिर ये अब्राहम अकॉर्ड है क्या?
अब्राहम अकॉर्ड है क्या?
अब्राहम अकॉर्ड (Abraham Accords) कोई एक दस्तावेज नहीं है, बल्कि ये कई समझौतों की एक सीरीज है. इसके जरिए अरब और मुस्लिम देश इजरायल के साथ अपने रिश्ते सामान्य करते हैं और पूरे राजनयिक रिश्ते मजबूत करते हैं. ये समझौते अमेरिका की मध्यस्थता में हुए और इन्हें ट्रंप के पहले कार्यकाल (2017-2021) की सबसे बड़ी विदेश नीति उपलब्धि माना जाता है.
नाम की बात करें तो ‘अब्राहम’ यानी हजरत इब्राहिम, जो यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों धर्मों में एक बड़ी शख्सियत माने जाते हैं. ये समझौते तीनों धर्मों के बीच शांति और भाईचारे की भावना पर आधारित हैं. इसकी सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसने मिडिल ईस्ट की दशकों पुरानी एक अलिखित शर्त को तोड़ दी. अरब देशों का पारंपरिक रुख ये था कि जब तक फिलिस्तीनियों का एक स्वतंत्र देश नहीं बन जाता, तब तक वो इजरायल को मान्यता नहीं देंगे. अब्राहम अकॉर्ड ने ठीक इसी अड़चन को तोड़ा.
अब्राहम अकॉर्ड कब और कैसे शुरू हुआ?
15 सितंबर 2020. वॉशिंगटन डीसी का व्हाइट हाउस लॉन. एक तरफ इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दूसरी तरफ UAE के विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन जायद और बहरीन के विदेश मंत्री अब्दुल्लतीफ अल-जयानी. तीनों ने एक ऐसे दस्तावेज पर दस्तखत किए, जिसने मिडिल ईस्ट का राजनीतिक नक्शा बदल दिया.
इस समझौते को अंजाम तक पहुंचाने में ट्रंप के दामाद और वरिष्ठ सलाहकार जेरेड कुशनर ने अहम भूमिका निभाई. UAE और बहरीन, 1994 के बाद इजरायल को औपचारिक रूप से मान्यता देने वाले पहले अरब देश बने. इसके बाद मोरक्को (दिसंबर 2020), सूडान (जनवरी 2021) और सबसे हाल में कजाकिस्तान (नवंबर 2025) भी इस समझौते में शामिल हुए.
फिलहाल पांच देश अब्राहम अकॉर्ड का हिस्सा हैं. इसके अलावा, मिस्र (1979) और जॉर्डन (1994) पहले ही इजरायल के साथ शांति समझौता कर चुके हैं.
अब्राहम रिकॉर्ड से इजरायल पर क्या असर हुआ?
पांच साल पहले तक, इजरायली नागरिक खाड़ी देशों की यात्रा नहीं कर सकते थे. UAE से इजरायल तक सीधी फोन कॉल भी ब्लॉक थी. लेकिन अब्राहम अकॉर्ड के बाद सब कुछ बदल गया.
- व्यापार: सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा व्यापार का है. 2020 में इजरायल और UAE के बीच व्यापार महज 5 करोड़ डॉलर से कुछ ज्यादा था, लेकिन 2024 में ये बढ़कर 3.3 अरब डॉलर (करीब 27,500 करोड़ रुपये) से भी ज्यादा हो गया. 2021 से 2024 के बीच इजरायल और अब्राहम अकॉर्ड वाले देशों के बीच व्यापार में 127% की बढ़ोतरी हुई. 2023 में इन देशों का इजरायल के साथ कुल व्यापार 4 अरब डॉलर के पार चला गया, जो 2022 से 16% ज्यादा था.
- पर्यटन और हवाई संपर्क: आज दुबई और तेल अवीव के बीच रोजाना कई फ्लाइट्स हैं. बेन-गुरियन एयरपोर्ट का 10% ट्रैफिक अब UAE रूट पर है.
- ट्रंप का दावा: ट्रंप ने अपने पोस्ट में लिखा कि ‘अब्राहम अकॉर्ड, इसमें शामिल देशों (UAE, बहरीन, मोरक्को, सूडान और कजाकिस्तान) के लिए एक आर्थिक, वित्तीय और सामाजिक बूम साबित हुआ है. इतना कि जंग और टकराव के इस दौर में भी मौजूदा सदस्यों ने कभी इसे छोड़ने या रोकने की बात तक नहीं की.’
फिलिस्तीन मसले का हल नहीं निकालता अब्राहम अकॉर्ड
अब्राहम अकॉर्ड की सबसे बड़ी कमजोरी ये है कि ये इजरायल-फिलिस्तीन मुद्दे को पूरी तरह नजरअंदाज करता है. फिलिस्तीनी नेताओं ने इसे ‘पीठ में छुरा’ बताया और अरब देशों पर आरोप लगाया कि उन्होंने फिलिस्तीनियों को धोखा दिया है. मिडिल ईस्ट में आम लोगों के बीच ये समझौते खास लोकप्रिय नहीं हैं. इसकी मुख्य वजह यही है कि ये फिलिस्तीनी मसले का हल नहीं निकालते.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि ‘सबसे बड़ी समस्या ये है कि अब्राहम अकॉर्ड फिलिस्तीनियों को नक्शे से मिटाने की कोशिश करता है.’ अक्टूबर 2023 के हमास हमले और उसके बाद गाजा में इजरायली कार्रवाई ने इन समझौतों की मजबूती की कड़ी परीक्षा ली. लेकिन इसके बावजूद, कोई भी देश अब तक समझौते से पीछे नहीं हटा है.
ट्रंप अभी क्या चाहते हैं?
ट्रंप ने साफ कहा, ‘इसकी शुरुआत सऊदी अरब और कतर के तुरंत हस्ताक्षर से होनी चाहिए और बाकी सभी को उनके नक्शे कदम पर चलना चाहिए.’ उन्होंने चेतावनी दी कि जो देश ऐसा नहीं करेंगे, उन्हें ईरान डील का हिस्सा नहीं होना चाहिए. उन्होंने ये भी संकेत दिया कि अगर ईरान के साथ शांति समझौता होता है, तो ईरान को भी इसमें शामिल किया जा सकता है, ये सम्मान की बात होगी.
ट्रंप की इस मांग को लेकर तुरंत विरोध भी शुरू हो गया. पाकिस्तान ने सबसे पहले इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया. पाकिस्तान के एक सुरक्षा सूत्र ने कहा कि ट्रंप ईरान युद्ध विराम की कूटनीति का इस्तेमाल अब्राहम अकॉर्ड के बड़े विस्तार के लिए कर रहे हैं, लेकिन ‘ये दोनों मुद्दे आपस में जुड़े नहीं हैं और न ही इन्हें जोड़ा जा सकता है. पाकिस्तान पर ऐसी किसी मांग को मानने की पाबंद नहीं है.’
सऊदी अरब के लिए तो ये मामला और भी संवेदनशील है. वो इस्लाम का जन्मस्थान और दो सबसे पवित्र स्थलों, मक्का और मदीना का संरक्षक है. उसका पुराना रुख यही है कि जब तक फिलिस्तीन राज्य के लिए कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं बनता, वो इजरायल को मान्यता नहीं देगा.
तो इस मामले में आगे क्या होगा?
अब्राहम अकॉर्ड की कहानी अभी खत्म नहीं हुई. ट्रंप इसे अपनी विरासत का सबसे बड़ा हिस्सा बनाना चाहते हैं. उन्होंने लिखा, ‘मिडिल ईस्ट एकजुट, शक्तिशाली और आर्थिक रूप से मजबूत होगा, शायद दुनिया के किसी भी दूसरे इलाके की तरह नहीं.’
लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष, गाजा युद्ध और आम मुस्लिम जनता का गुस्सा इस राह की सबसे बड़ी बाधाएं हैं. पाकिस्तान पहले ही ना कह चुका है और बाकी देशों ने अभी तक चुप्पी साध रखी है. क्राइसिस ग्रुप के ईरान प्रोजेक्ट डायरेक्टर अली वाएज कहते हैं, ‘ट्रंप ईरान डील को अब्राहम अकॉर्ड के सीक्वल के रूप में बेचने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वो एक कल्पना को दूसरी कल्पना से बदल रहे हैं. ईरान को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करने से लेकर ये दिखावा करने तक कि एक कमजोर डील मिडिल ईस्ट की नई व्यवस्था की नींव रख सकती है.’

