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Election Analysis:ममता पर ये मुद्दे पड़े भारी; जिन सीटों पर कटे सबसे ज्यादा नाम, उनमें से 13 जीती टीएमसी – Mamata Banerjee Get Setback With Anger Of People Corruption Law And Order Issues Taken Toll In West Bengal

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पश्चिम बंगाल में मिली करारी हार को पचा पाना मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए बेहद मुश्किल हो रहा है। यही वजह है कि उन्होंने नतीजों के एक दिन बाद अपने चिरपरिचित अंदाज में इस्तीफा देने तक से इन्कार कर दिया। हठधर्मी रहीं ममता के लिए ऐसा करना स्वाभाविक भी है। आखिरकार, उन्हें पूरा भरोसा था कि एसआईआर के मुद्दे पर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को घेरना उन्हें चुनावी लाभ पहुंचाएगा, लेकिन नतीजों ने उन्हें हैरान कर दिया। उनकी तमाम कोशिशें सत्ता विरोधी लहर से उबारने में काम नहीं आईं।

चुनावों के दौरान ममता बनर्जी ने इस पर जमकर आवाज उठाई कि बंगाल में एसआईआर के नाम पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं। उन्होंने आयोग पर केंद्र सरकार के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया। सुप्रीम कोर्ट में जनता की याचिकाकर्ता के तौर पर दलीलें पेश करके यह साबित किया कि चाहे कोलकाता की गली हो या दिल्ली का न्यायालय, उन्होंने अंत तक लड़ने की अपनी प्रवृत्ति नहीं खोई थी। लेकिन नतीजे दर्शाते है कि एसआईआर तृणमूल के लिए सत्ता विरोधी लहर को बेअसर करने का हथियार साबित नहीं हुआ।

ममता शिक्षक भर्ती घोटाले से लेकर पार्टी सहयोगियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों तक कई मोर्चों पर घिरी थीं। कानून-व्यवस्था के साथ महिला सुरक्षा का मुद्दा बड़ा था और यही तृणमूल कांग्रेस की करारी हार के कारण भी बने। 2021 में भी ममता को मोदी-नीत भगवा पार्टी से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा था, लेकिन तब वह कल्याणकारी योजनाओं और बंगाली संस्कृति को बाहरी लोगों से बचाने की अपील के दम पर जीत हासिल करने में सफल रहीं।

इस बार उन्होंने युवा साथी योजना (21 से 40 वर्ष की आयु के बेरोजगार दसवीं पास छात्रों के लिए 1,500 रुपये की मासिक सहायता) शुरू की और महिलाओं के लिए लक्ष्मी भंडार योजना के लिए आवंटन 1,200 रुपये से बढ़ाकर 1,500 रुपये प्रति माह कर दिया। बंगाल के 81 लाख से अधिक (मतदाताओं के 10% से अधिक) लोगों ने युवा साथी योजना में पंजीकरण कराया, लेकिन मतदान केंद्रों पर पहुंचने पर उन्हें यह योजना शायद तृणमूल को वोट देने के माकूल नहीं लगी।

इंडिया गठबंधन में भी बदलेगी स्थिति

अप्रत्याशित राजनीतिक बदलाव के गवाह बने बंगाल ने उनके लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के सपने को तोड़ दिया। अगर तृणमूल इस बार जीत हासिल करती, तो ममता सबसे लंबे समय तक शासन करने वाली महिला मुख्यमंत्री का तमगा हासिल कर लेतीं। यही नहीं, विपक्षी गठबंधन इंडिया की मजबूत स्तंभ के तौर पर उनकी भूमिका को भी बल मिलता। सबसे हैरान करने वाली बात तो यह है कि खुद ममता को अपने गढ़ भवानीपुर में भी हार का सामना करना पड़ा।

40% वोट शेयर ही तृणमूल के लिए राहत

भाजपा ने बंगाल में 207 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस को पटखनी दी है, लेकिन तृणमूल सुप्रीमो के लिए यही बात थोड़ा राहत देने वाली है कि पार्टी 40 फीसदी से ज्यादा वोट शेयर हासिल करने में सफल रही है। बहरहाल, इस हार ने 71 वर्षीय जुझारू नेता को फिर उसी मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से उन्होंने राजनीति शुरू की थी। अब देखना होगा कि उम्र के इस पड़ाव पर वह सड़क की राजनीति को किस मुकाम तक ले जा सकती हैं।

तथ्य यह भी : जिन 20 सीटों पर कटे सबसे ज्यादा नाम, उनमें 13 सीटें तृणमूल ने जीतीं

बंगाल के नतीजों में एसआईआर की भूमिका क्या रही, इस पर शुरुआती विश्लेषण यही बताता है कि जिन 20 सीटों पर सबसे ज्यादा मतदाताओं के नाम कटे थे, उनमें 13 तृणमूल के खाते में आई हैं। वहीं, छह सीटों पर भाजपा और एक पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की। एक अन्य रुझान से पता चलता है कि जिन 187 सीटों पर 5,000 से अधिक नाम हटाए गए, उनमें से भाजपा 119 पर जीती। इन 187 निर्वाचन क्षेत्रों में से 47 में हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर या बढ़त से अधिक थी। टीएमसी ने इन 187 सीटों में से 65 सीटें जीतीं, जिनमें 18 पर हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत का अंतर से अधिक रही।


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