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80th Independence Day:चेचक-पोलियो के हाहाकार से लेकर एआई के इस्तेमाल तक, हेल्थ केयर में कितना आगे निकला भारत? – 80th Independence Day India Healthcare Journey And Evolution From 1947 To 2026

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देश आज आजादी का 80वां सालगिरह मना रहा है। बीते आठ दशकों में भारत ने समग्र विकास के लिए तमाम प्रयास किए, जिसकी स्पष्ट तस्वीर देखी जा सकती है। साल 2047 तक भारत विकसित देश बनने के लक्ष्य पर काम कर रहा है। लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज फिर इस लक्ष्य की तरफ बढ़ने के लिए निरंतर प्रयास की जरूरतों पर जोर दिया। बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं किसी भी देश के समग्र विकास का मजबूत नींव होती हैं। भारत ने इस दिशा में कई सफलताएं हासिल की हैं। 

कुछ दशकों पहले तक जहां मलेरिया-हैजा, चेचक, टीबी और तरह-तरह के संक्रमण जिंदगी के लिए बड़ा खतरा बने हुए थे, वहीं अब अत्याधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं और कागरग दवाओं ने न सिर्फ रोग के मामलों को कम कर दिया है बल्कि इसके कारण होने वाली मृत्युदर भी काफी कम हुई है।

अब गंभीर बीमारी के इलाज के लिए सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल हैं, संक्रामक बीमारियों से बचाव के लिए टीके, आधुनिक सर्जरी, कैंसर की स्क्रीनिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी डॉक्टरों के साथ काम कर कर रहा है।

आइए जानते हैं कि पिछले 79 वर्षों में स्वास्थ्य सेवाओं में क्या-क्या बदला और कितना सुधार हुआ है?




80th independence day India healthcare journey and evolution from 1947 to 2026

स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार
– फोटो : Adobe Stock


लाइफ एक्सपेक्टेंसी में सुधार और कई बीमारियों का खात्मा

आजादी के आसपास के वर्षों में भारत में औसत जीवन प्रत्याशा 31-32 साल थी। वर्ल्ड इकोनॉमिक्स के अनुसार भारत में जीवन प्रत्याशा 2025 में करीब 72 साल तक पहुंच गई है। यानी औसत भारतीय जीवन प्रत्याशा के मामले में आजादी के शुरुआती दौर की तुलना में लगभग चार दशक से ज्यादा आगे निकल चुका है।

इस सफर में कुछ बीमारियां ऐसी भी हैं जिनसे भारत ने ऐतिहासिक जीत हासिल की। 

  • चेचक, जिसने कभी भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था का बुरी तरह प्रभावित किया वह देश से 1977 तक खत्म हो गया। देश में प्राकृतिक रूप से चेचक का आखिरी मामला 24 मई, 1975 को दर्ज किया गया था। चेचक को खत्म करने के लिए चलाए गए सघन रोकथाम अभियान के बाद, अप्रैल 1977 में वैश्विक आयोग ने आधिकारिक तौर पर भारत को चेचक-मुक्त घोषित किया।
  • पोलियो का आखिरी मामला जनवरी 2011 में सामने आया और 2014 में भारत को पोलियो-मुक्त प्रमाणित किया गया।


80th independence day India healthcare journey and evolution from 1947 to 2026

शिशु मृत्युदर और बच्चों की सेहत में सुधार
– फोटो : Freepik.com


बच्चों स्वास्थ्य में बेहतर सुधार

भारत ने स्वास्थ्य सुधार के दिशा में उठाए कदमों की बदौलत शिशु मृत्यु दर को कम करने में भी बड़ी सफलता पाई है।  बच्चों के स्वास्थ्य में भी अब बड़ा बदलाव आया है। 

साल 1947 में भारत की शिशु मृत्यु दर लगभग 1,000 जीवित जन्म पर 146 थी जो साल 2026 में घटकल मात्र 27 रह गई है। बेहतर टीकाकरण और प्रसव सेवाएं के साथ नवजात स्वास्थ्य देखभाल, पोषण-स्वच्छता और संक्रामक रोगों पर नियंत्रण ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई है। 

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (एनएफएचएस 6) की रिपोर्ट के मुताबिक  व्यापक स्तर पर किए जा रहे प्रयासों के परिणामस्वरूप अब लाखों बच्चों को पहले की तुलना में बेहतर पोषण मिल रहा है।

 

  • कुपोषण, डायरिया और शिशु मृत्यु दर में भी बेहतर सुधार देखा जा रहा है।
  • पांच साल से कम उम्र के बच्चों में गंभीर दस्त या डायरिया के मामलों में गिरावट दर्ज की गई है, जिसमें बेहतर टीकाकरण कवरेज और सुरक्षित पेयजल तक पहुंच का बड़ा योगदान रहा है।
  • डायरिया की व्यापकता एनएफएचएस-5 में 0.7% से घटकर एनएफएचएस-6 में 0.5 प्रतिशत हो गई।


80th independence day India healthcare journey and evolution from 1947 to 2026

मोटापा और क्रॉनिक बीमारियों का खतरा
– फोटो : Freepik.com


अब क्या चुनौतियां हैं?

आजादी के दशक में संक्रामक बीमारियों से लड़ने सबसे बड़ा चैलेंज था। मलेरिया, टीबी, चेचक, हैजा जैसी बीमारियों से लाखों मौतें हो जाती थीं। आज भारत को एक अलग तरह की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। हृदय रोग, डायबिटीज, कैंसर और अन्य क्रॉनिक बीमारियां अब स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा दबाव डाल रही हैं।

 

  • इस तरह के गैर-संचारी रोगों का बढ़ता बोझ स्वास्थ्य सिस्टम के लिए अलग चुनौती है। लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों में लगातार दवा, जांच और फॉलो-अप की जरूरत होती है।
  • संक्रामक रोगों के खिलाफ सफलताओं के बावजूद टीबी, मलेरिया, डेंगू और अन्य संक्रमणों के मामले अब भी चिंता का विषय बने हुए हैं।

डब्ल्यूएचओ ग्लोबल टीबी रिपोर्ट 2025 के अनुसार 2024 में भारत में लगभग 27.1 लाख लोग टीबी से संक्रमित पाए गए और 3 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई। यह आंकड़ा दर्शाता है कि भारत में टीबी अभी भी गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है।  साल 2025 तक देश को टीबी मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा गया था पर अब भी न सिर्फ बड़ी संख्या में संक्रमित सामने आ रहे हैं बल्कि भारत टीबी के बड़े बोझ वाला देश बना हुआ है।


80th independence day India healthcare journey and evolution from 1947 to 2026

हेल्थकेयर में एआई का इस्तेमाल
– फोटो : Adobe Stock


एआई के आने से स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की उम्मीद

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर लोगों में बड़ी उम्मीद देखी जा रही है। इसकी मदद से जल्द से जल्द बीमारी की पहचान और डायग्नोसिस में मदद मिल रही है। भारत जैसे विशाल देश में स्वास्थ्य सेवाओं की समान पहुंच बड़ी चुनौती रही है। 

आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के जरिए देश में डिजिटल स्वास्थ्य व्यवस्था बनाने पर काम किया जा रहा है। टेलीमेडिसिन के विस्तार के साथ यह मॉडल और महत्वपूर्ण हो सकता है। जून 2026 में सरकार ने 47 करोड़ से अधिक टेलीमेडिसिन कंसल्टेशन का आंकड़ा बताया था। एआई की मदद से बीमारियों का जल्द पता लगाना आसान हो रहा है। 

अमर उजाला में प्रकाशित रिपोर्ट में हमने बताया कि किस तरह से MEDWACS टेस्ट में जांघ की लंबाई लेकर एआई की मदद से आप जान सकते हैं कि डायबिटीज का खतरा तो नहीं है? इतनी ही नहीं एआई की मदद से स्मार्टफोन से मिनटों में पता चल सकता है कि आपको जानलेवा कैंसर का जोखिम तो नहीं है?

वैज्ञानिकों ने  एआई की मदद से ‘यूनिवर्सल वैक्सीन‘ भी बनाई है जो फ्लू हो या कोरोना सब पर असरदार हो सकती है।

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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।


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