भारत का व्यापार जगत इस समय तेजी से आगे बढ़ रहा है। मई के महीने में देश के व्यापार में बड़ी बढ़त देखी गई है। सरकार ने इसके नए आंकड़े जारी कर दिए हैं। आंकड़ों के मुताबिक मई में भारत का सामान का निर्यात 18 फीसदी बढ़ गया है। अब यह बढ़कर 45.2 अरब डॉलर यानी 4,30,197.81 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। दुनिया भर में भारतीय सामान की मांग बढ़ रही है। वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने इस पर खुशी जताई है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि यह पूरा साल निर्यात के लिए बहुत अच्छा रहेगा।

पेट्रोलियम ने मचाया धमाल
इस बार पेट्रोलियम सेक्टर ने बहुत शानदार काम किया है। मई 2026 में पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात बहुत ज्यादा बढ़ा है। इसमें 54.89 फीसदी की भारी तेजी आई है। इसके साथ ही यह निर्यात 8.42 अरब डॉलर (80,138.62 करोड़ रुपये) का हो गया है। इसने देश के कुल निर्यात को बढ़ाने में बड़ी मदद की है। हालांकि पश्चिम एशिया के बाजार से थोड़ी निराशा मिली है। मई में पश्चिम एशिया को भारत का निर्यात 5.30 अरब डॉलर रहा। पिछले साल मई 2025 में यह आंकड़ा 5.38 अरब डॉलर था। इस बार वहां मामूली गिरावट आई है।
यह भी पढ़ें: Sitharaman: भारत में कैसे आएगा विदेशी निवेश? वित्त मंत्री सीतारमण ने बताई सरकार की रणनीति
आयात और व्यापार घाटे का हाल
निर्यात के साथ-साथ देश का आयात भी बढ़ा है। मई में भारत का आयात 20.62 फीसदी बढ़ गया है। भारत ने कुल 73.41 अरब डॉलर ( करीब 6,98,690.74 करोड़ रुपये) का सामान बाहर से मंगाया है। आयात ज्यादा होने से देश का व्यापार घाटा भी बढ़ गया है। मई में यह घाटा 28.21 अरब डॉलर (2,68,492.93 करोड़ रुपये) रहा है। इस आयात को बढ़ाने में सोने की बड़ी भूमिका रही है। लोग जमकर सोना खरीद रहे हैं। अप्रैल और मई के महीने में सोने का आयात 60 फीसदी बढ़ गया है। इन दो महीनों में कुल 9.04 अरब डॉलर (86,039.56 करोड़ रुपये) का सोना भारत आया है।
दो महीनों का पूरा लेखा-जोखा
अब बात करते हैं अप्रैल और मई के कुल व्यापार की। चालू वित्त वर्ष के पहले दो महीनों में प्रदर्शन अच्छा रहा है। इस दौरान भारत का कुल निर्यात 88.91 अरब डॉलर रहा। यह पिछले साल के मुकाबले 16.09 फीसदी ज्यादा है। यह बढ़ोतरी बताती है कि देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है। बाजार में लगातार कामकाज बढ़ रहा है।
भारत के सामने तीन बड़ी चुनौतियां
सबसे पहली चुनौती ग्लोबल लॉजिस्टिक्स और आपूर्ति शृंखला की है। दुनिया के कई समुद्री रास्तों में जारी तनाव के कारण माल ढुलाई का किराया लगातार बढ़ रहा है। इससे भारतीय निर्यातकों की लागत बढ़ सकती है और वैश्विक बाजार में हमारे उत्पाद महंगे हो सकते हैं। दूसरी चुनौती करेंसी की अस्थिरता है। दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों में किए जा रहे बदलावों के कारण डॉलर के मुकाबले अन्य वैश्विक मुद्राएं कमजोर हो रही हैं। अगर प्रमुख आयातक देशों की करेंसी कमजोर होती है, तो उनके लिए भारतीय सामान खरीदना महंगा हो जाएगा, जिससे हमारी मांग पर असर पड़ सकता है।
तीसरी और सबसे बड़ी चुनौती सख्त वैश्विक मानक और कार्बन टैक्स (जैसे यूरोपीय संघ का सीबीएएम हैं। दुनिया के विकसित देश अब पर्यावरण को लेकर कड़े नियम बना रहे हैं। ऐसे में भारतीय स्टील, इंजीनियरिंग गुड्स और टेक्सटाइल उद्योगों को खुद को तुरंत इन नियमों के अनुसार ढालना होगा, वरना हमारे बड़े निर्यात बाजार हाथ से निकल सकते हैं।

