
ईरान और अमेरिका के बीच टकराव का एक नया अध्याय शुरू हो गया है. मिसाइलों और बमों की जगह अब लड़ाई आर्थिक मोर्चे पर लड़ी जा रही है. अमेरिका ने ईरान पर नए आर्थिक प्रतिबंध लागू कर दिए हैं और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुलकर कह रहे हैं कि ईरान की अर्थव्यवस्था टूट रही है. लेकिन सवाल यह है कि क्या आर्थिक दबाव के आगे ईरान झुक जाएगा? या फिर ईरान जवाब में ऐसा कदम उठाएगा जिससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है?
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में एक ऐसा नाम है जो सार्वजनिक रूप से बहुत कम दिखाई देता है, लेकिन जिसके बारे में माना जा रहा है कि आज ईरान के सत्ता तंत्र और सुरक्षा प्रतिष्ठान पर उसका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है-मोजतबा खामेनेई.
ट्रंप का नया दांव: आर्थिक युद्ध
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ नए आर्थिक प्रतिबंध लागू करते हुए साफ संकेत दिया है कि उनका उद्देश्य ईरान पर अधिकतम दबाव बनाना है. अमेरिका की रणनीति चार स्तरों पर काम करती दिख रही है—
ईरान के तेल निर्यात को सीमित करना.
ईरानी तेल खरीदने वाले देशों और कंपनियों पर दबाव बढ़ाना.
वित्तीय नेटवर्क और बैंकिंग चैनलों को निशाना बनाना.
चीन समेत बड़े खरीदारों को द्वितीयक प्रतिबंधों की चेतावनी देना.
ट्रंप प्रशासन का मानना है कि यदि ईरान की आय का प्रमुख स्रोत यानी तेल निर्यात प्रभावित होता है तो तेहरान को अंततः बातचीत की मेज पर आना पड़ेगा।
ईरान में किसके हाथ में है असली ताकत?
हाल के महीनों में ईरान के भीतर कई महत्वपूर्ण सैन्य और सुरक्षा नियुक्तियां हुई हैं. विश्लेषकों का मानना है कि इन नियुक्तियों में मोजतबा खामेनेई की सोच और प्रभाव दिखाई देता है. ईरान की सुरक्षा व्यवस्था में हुए बदलावों का उद्देश्य तीन प्रमुख लक्ष्यों पर केंद्रित माना जा रहा है-
कमांड सिस्टम को मजबूत करना.
सैन्य निर्णय प्रक्रिया का केंद्रीकरण.
सुरक्षा प्रतिष्ठान पर नियंत्रण मजबूत करना.
इसी क्रम में कई वरिष्ठ और अनुभवी अधिकारियों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं. ये वे चेहरे हैं जिनका संबंध इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) और ईरान की सुरक्षा संरचना से लंबे समय से रहा है.
क्यों अहम है नई सुरक्षा टीम?
ईरान के सामने इस समय दोहरी चुनौती है. पहली चुनौती बाहरी है- अमेरिका, इजरायल और क्षेत्रीय दबाव. दूसरी चुनौती आंतरिक है-आर्थिक संकट, महंगाई और संभावित जन असंतोष. इसी वजह से सुरक्षा प्रतिष्ठान में ऐसे लोगों को आगे लाया जा रहा है जिनके पास सुरक्षा और खुफिया अभियानों का लंबा अनुभव है. विशेष रूप से बासिज जैसे अर्धसैनिक संगठनों की भूमिका पर भी ध्यान दिया जा रहा है, क्योंकि अतीत में इन्हें आंतरिक विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है.
राजनीतिक नेतृत्व बनाम सुरक्षा प्रतिष्ठान
ईरान की राजनीति में लंबे समय से दो धाराएं दिखाई देती रही हैं. एक धारा वह है जो पश्चिम के साथ बातचीत और समझौते की पक्षधर मानी जाती है. दूसरी धारा सुरक्षा प्रतिष्ठान और IRGC से जुड़ी है, जो अमेरिका के प्रति अधिक कठोर रुख रखती है. हाल के संकेत बताते हैं कि सुरक्षा प्रतिष्ठान का प्रभाव पहले की तुलना में अधिक मजबूत होता जा रहा है. यही कारण है कि अमेरिका के साथ समझौते को लेकर तेहरान के तेवर पहले से अधिक सख्त दिखाई दे रहे हैं.
हॉर्मुज: दुनिया की सबसे अहम समुद्री नस
ईरान की सबसे बड़ी ताकत उसकी भौगोलिक स्थिति है. हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है. वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. ईरानी नेतृत्व लगातार संकेत देता रहा है कि यदि उस पर आर्थिक युद्ध थोपा गया तो वह हॉर्मुज में दबाव बढ़ा सकता है. तेहरान का तर्क है कि यदि उसके तेल निर्यात को रोका गया तो वह क्षेत्रीय ऊर्जा व्यापार को प्रभावित करने के विकल्पों पर विचार कर सकता है. यही वजह है कि हॉर्मुज आज अमेरिका-ईरान तनाव का सबसे संवेदनशील बिंदु बन चुका है.
ईरान की अर्थव्यवस्था पर कितना दबाव?
ईरान की अर्थव्यवस्था पहले से ही गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है. मुद्रा पर दबाव लगातार बढ़ा है. महंगाई दर ऊंचे स्तर पर बनी हुई है. खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेज वृद्धि देखी गई है. बेरोजगारी और गरीबी को लेकर चिंता बढ़ी है. विदेशी निवेश और व्यापार पर प्रतिबंधों का असर पड़ा है. इन परिस्थितियों में नए अमेरिकी प्रतिबंध ईरानी अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं.
क्या ईरान झुकेगा?
यही सबसे बड़ा सवाल है. ट्रंप प्रशासन मानता है कि आर्थिक दबाव ईरान को समझौते के लिए मजबूर कर सकता है. लेकिन ईरान का दावा है कि प्रतिबंधों की नीति पहले भी अपनाई जा चुकी है और उससे वांछित परिणाम नहीं निकले. तेहरान लगातार कहता रहा है कि सम्मानजनक बातचीत ही किसी समाधान का रास्ता हो सकती है.
क्या फिर शुरू होगी बातचीत?
कूटनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि कई मध्यस्थ देश अमेरिका और ईरान के बीच संवाद बहाल कराने की कोशिश कर रहे हैं. पाकिस्तान, सऊदी अरब, तुर्किये और अन्य क्षेत्रीय देशों के संपर्कों को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है. हालांकि फिलहाल दोनों पक्ष सार्वजनिक रूप से अपने-अपने रुख पर अड़े हुए दिखाई देते हैं. अमेरिका और ईरान के बीच टकराव अब सिर्फ सैन्य या राजनीतिक नहीं रह गया है. यह आर्थिक, सामरिक और भू-राजनीतिक संघर्ष का रूप ले चुका है.
एक तरफ ट्रंप आर्थिक दबाव के जरिए ईरान को झुकाना चाहते हैं. दूसरी तरफ तेहरान यह संदेश दे रहा है कि वह दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है और उसके पास भी जवाबी विकल्प मौजूद हैं. इस पूरे संघर्ष का सबसे बड़ा केंद्र हॉर्मुज जलडमरूमध्य, तेल व्यापार और ईरान की आंतरिक सत्ता संरचना बन चुकी है. आने वाले हफ्तों में यह साफ हो जाएगा कि आर्थिक प्रतिबंध बातचीत का रास्ता खोलते हैं या फिर पश्चिम एशिया को एक बार फिर बड़े टकराव की ओर धकेल देते हैं.
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