उत्तर प्रदेश की सियासत में समाजवादी पार्टी ने बड़े वैचारिक और रणनीतिक बदलाव के संकेत दिए हैं। पार्टी ने अब विवादित मुद्दों से दूरी बनाते हुए हिंदू प्रतीकों के इस्तेमाल की सोची-समझी रणनीति पर अमल करना शुरू कर दिया है। इस नई दिशा का सबसे ताजा उदाहरण राम मंदिर चढ़ावा चोरी के मुद्दे को प्रमुखता से उठाना है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे सपा आमजन के बीच खुद को सनातनी और हिंदू सरोकारों के प्रति संवेदनशील पार्टी के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रही है। पार्टी अब उन प्रतीकों और आस्था के केंद्रों से जुड़े मुद्दों पर मुखर हो रही है, जिन पर अमूमन भाजपा का एकाधिकार माना जाता था। राम मंदिर से जुड़े मामले पर पार्टी का रुख साफ करता है कि वह बहुसंख्यक समाज की आस्था से जुड़े विषयों पर बैकफुट पर रहने के मूड में नहीं है।
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विवादों से किनारा करना सपा की चुनावी रणनीति का दूसरा अहम पहलू है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने अपने नेताओं को स्पष्ट संकेत दिया है कि ऐसी किसी भी संवेदनशील या धार्मिक बयानबाजी से बचा जाए जिससे समाज में धार्मिक ध्रुवीकरण की स्थिति पैदा हो या पार्टी पर तुष्टिकरण का ठप्पा लगे। अतीत के अनुभवों से सीख लेते हुए सपा अब अपनी छवि को अधिक समावेशी और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य बनाने में जुटी है।
जनाधार बढ़ाने का संजीदा प्रयास
सपा का यह बदला हुआ अंदाज आगामी चुनावों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले के साथ सनातनी प्रतीकों पर काम अपनाकर जनाधार बढ़ाने के उसके संजीदा प्रयासों का हिस्सा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सपा की यह नई राजनीतिक पिच उसे जमीन पर कितना फायदा पहुंचाती है।


