भारत ने संयुक्त राष्ट्र (UN) की सदस्यता के लिए फलस्तीन की दावेदारी का समर्थन करते हुए एक बार फिर स्पष्ट किया है कि वह इस्राइल-फलस्तीन विवाद के स्थायी समाधान के लिए ‘दो-राष्ट्र समाधान’ के पक्ष में मजबूती से खड़ा है। इस पूरे मामले पर नई दिल्ली का कहना है कि दोनों देश अंतरराष्ट्रीय कानून और मान्यता प्राप्त सीमाओं के अनुरूप शांति, सुरक्षा और पारस्परिक सम्मान के साथ एक-दूसरे के पड़ोसी के रूप में अस्तित्व में रहें। भारत ने यह रुख सोमवार को बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में आयोजित ‘फलस्तीन डोनर ग्रुप’ की मंत्री-स्तरीय बैठक में दोहराया, जहां विदेश मंत्रालय की सचिव श्रीप्रिया रंगनाथन ने भारत का पक्ष रखा।

भारत ने बैठक में क्या कहा?
विदेश मंत्रालय की सचिव श्रीप्रिया रंगनाथन ने बैठक के दौरान कहा कि भारत लंबे समय से फलस्तीन जनता की वैध आकांक्षाओं का समर्थन करता रहा है। उन्होंने दोहराया कि भारत ऐसा समाधान चाहता है, जिसमें इस्राइल और फलस्तीन अंतरराष्ट्रीय कानून तथा संयुक्त राष्ट्र के प्रासंगिक प्रस्तावों के अनुरूप, मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर शांति और सुरक्षा के साथ एक-दूसरे के पड़ोसी के रूप में रह सकें। भारत ने यह भी संकेत दिया कि क्षेत्र में स्थायी शांति केवल संवाद और कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से ही संभव है।
क्या है ‘दो-राष्ट्र समाधान’?
‘दो-राष्ट्र समाधान’ वह प्रस्ताव है, जिसके तहत इस्राइल और फलस्तीन दो स्वतंत्र एवं संप्रभु देशों के रूप में अस्तित्व में रहें। इस अवधारणा का उद्देश्य दशकों पुराने संघर्ष का शांतिपूर्ण और स्थायी समाधान निकालना है। संयुक्त राष्ट्र सहित दुनिया के अधिकांश देश इसी मॉडल को सबसे व्यवहारिक समाधान मानते हैं। हालांकि, सीमाओं, यरुशलम की स्थिति, सुरक्षा और शरणार्थियों की वापसी जैसे मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच अब भी गहरे मतभेद बने हुए हैं।
फलस्तीन की UN सदस्यता क्यों महत्वपूर्ण है?
फलस्तीन को संयुक्त राष्ट्र महासभा में ‘गैर-सदस्य पर्यवेक्षक राज्य’ का दर्जा प्राप्त है, लेकिन वह अभी संयुक्त राष्ट्र का पूर्ण सदस्य नहीं है। पूर्ण सदस्यता मिलने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सिफारिश और महासभा में आवश्यक समर्थन की जरूरत होती है। भारत लगातार फलस्तीन की पूर्ण सदस्यता का समर्थन करता रहा है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी अपने इस रुख को कई बार दोहरा चुका है।
भारत का रुख पहले भी रहा है स्पष्ट
भारत ने ऐतिहासिक रूप से फलस्तीन के साथ अपने संबंधों को महत्व दिया है। स्वतंत्र फलस्तीनी राज्य की स्थापना के समर्थन के साथ-साथ भारत ने हाल के वर्षों में इस्राइल के साथ भी रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में रणनीतिक संबंध मजबूत किए हैं। यही वजह है कि भारत दोनों पक्षों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखते हुए संवाद, कूटनीति और शांतिपूर्ण समाधान पर जोर देता है।
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मौजूदा हालात में क्यों बढ़ा इस बयान का महत्व?
पश्चिम एशिया में जारी तनाव, गाजा संघर्ष और क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच भारत का यह बयान महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय युद्धविराम, मानवीय सहायता और राजनीतिक समाधान पर ज़ोर दे रहा है, भारत ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि वह हिंसा के बजाय वार्ता और ‘दो-राष्ट्र समाधान’ को ही स्थायी शांति का आधार मानता है।

