जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने शनिवार को टिप्पणी की कि भावनात्मक बातें राष्ट्रीय सुरक्षा से ऊपर नहीं। इसके साथ ही उसने यूएपीए के तहत विचाराधीन कैदी के मामले में स्पेशल एनआईए कोर्ट का फैसला बरकरार रखा। उसकी बहन की शादी में शामिल होने के लिए सात दिन की अंतरिम जमानत अर्जी खारिज कर दी।

कोर्ट ने इसके साथ ही अस्थायी रिहाई के लिए भी जेल में कैदी के आचरण और बर्ताव को अहम करार दिया। यह कहते हुए कि अपीलीय अदालत आम तौर पर ट्रायल कोर्ट के फैसले या उसके विवेक के इस्तेमाल में अपनी राय नहीं जोड़ती, जब तक कि संबंधित आदेश में कोई गैर-कानूनी बात, बड़ी अनियमितता या मनमानी न हो, स्पेशल एनआईए कोर्ट के अंतरिम जमानत खारिज करने के फैसले को सही ठहराया।
जस्टिस सिंधु शर्मा और जस्टिस राजेश सेखरी की डिवीजन बेंच वहीद उल जहूर की अपील पर सुनवाई कर रही थी। जहूर की बहन का शादी समारोह 14 और 15 अगस्त को होना है। जहूर पर गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की धारा 18, आर्म्स एक्ट की धारा 7/25 और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 2 और 4 के तहत मुकदमा चल रहा है।
ये धाराएं आतंकी साजिश, प्रतिबंधित गोला-बारूद की खरीद फरोख्त और जीवन एवं संपत्ति को खतरे में डालने की मंशा से विस्फोट से जुड़ी हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा एवं कानून व्यवस्था को देखते हुए ये गंभीर अपराध हैं।
जेल के भीतर गड़बड़ी, गलत बर्ताव का जिक्र…
डिविजन बेंच ने माना कि बहन की शादी का भावनात्मक और सामाजिक महत्व है, लेकिन व्यक्तिगत हालात, आरोपों की प्रकृति, कानूनी ढांचे और सबूतों के बीच संतुलन भी जरूरी है। बेंच ने गौर किया कि जेल अधिकारियों की रिपोर्ट में बीते साल आठ सितंबर और इस साल 27 फरवरी व 10 मार्च की जानकारी में अनुशासनहीनता, गलत व्यवहार, निर्देशों का पालन न करने, जेल के अंदर गड़बड़ी और जेल अधिकारियों के साथ गलत बर्ताव जैसी बातों का जिक्र था।

