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Ground Report:सियासी चक्रव्यूह में आंकड़ों का इंद्रजाल, वोटर लिस्ट की सफाई ने आखिर किसकी विदाई की लिखी पटकथा? – Ground Report Maze Of Data West Bengal Election Sir Of Voter List Written Whose Departure Tmc Bjp

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पश्चिम बंगाल के चुनावी समर में इस बार लड़ाई जमीन के साथ चुनाव आयोग के पन्नों पर भी लड़ी जा रही है। पहले चरण में 90 प्रतिशत से ज्यादा मतदान के जादुई आंकड़े ने जो राजनीतिक तिलिस्म बुना था, अब महानगर कोलकाता की दहलीज पर आकर वह नए सियासी बवंडर का रूप ले रहा है। चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के विशेष संशोधन यानी एसआईआर की छलनी से वोटरों को छानने के बाद जो तस्वीर उभरी है, उसने सत्ता के गलियारों में बैठे धुरंधरों की नींद उड़ा दी है।

बंगाल में कई दशकों से मत प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से ज्यादा रहा है, पर कोलकाता उदासीन रहा है। राज्य में मतदान प्रतिशत 80 से ऊपर जाता रहा है, वहीं कोलकाता में 60-65% से ज्यादा मतदान कभी नहीं हुआ। दूसरे चरण में जिन सीटों पर चुनाव है, उनमें कोलकाता की भी 11 सीटें हैं। इन सीटों पर एसआईआर के बाद होने वाले चुनाव का अंकगणित सियासत की भौतिकी और समाज के रसयान को उलट-पलट कर रहा है।

इस नए अंकगणित की गहराई में उतरेंगे, तो पता चलेगा कि अगर एक भी नया मतदाता घर से न निकले और सिर्फ लोकसभा चुनाव 2024 के बराबर ही वोट पड़े, तो भी मतदान 93% की आसमानी ऊंचाइयों को छू लेगा। यह कोरा कागजी तिलिस्म है या कोई गहरा राजनीतिक संदेश? इन भंवर की परतों को उधेड़ने पर सच कुछ इस तरह से सामने आया।


चौरंगी में संख्या की सर्जिकल स्ट्राइक

इस नए अंकगणित को समझने के लिए चौरंगी विधानसभा क्षेत्र सबसे सटीक उदाहरण है। 2024 के लोकसभा चुनाव में कुल 2,09,713 पंजीकृत मतदाता थे। मतदान का प्रतिशत 55.40 रहा था। अब चुनाव आयोग की हालिया प्रशासनिक सफाई के बाद यहां 83,364 मतदाता (लगभग 40%) सूची से बाहर हो गए और मतदाताओं की संख्या घटकर मात्र 1,26,349 रह गई है। अब गणित का असली जादू देखिए। यदि 2026 में भी उतने ही वोट पड़े, जितने कि 2024 में पड़े थे तो कम हुए आधार के कारण मतदान का प्रतिशत स्वतः ही बढ़कर 91.96% हो जाएगा। यह उछाल किसी जन-उभार का परिणाम नहीं, बल्कि सूची से भूतिया और फर्जी मतदाताओं की विदाई का परिणाम है।

घबराहट और आक्रामकता : अदृश्य वोटों का मनोवैज्ञानिक युद्ध

आंकड़ों की इस मृगतृष्णा ने बंगाल की राजनीति में एक नया विमर्श खड़ा कर दिया है। यह सिर्फ प्रतिशत का उछाल नहीं है, बल्कि उन अदृश्य वोटों की कहानी है, जिन्हें यहां हार-जीत का मुख्य किरदार माना जाता है।

तृणमूल इसे महज एक पाटीगणित (अंकगणित) बताकर खारिज करने की कोशिश कर रहा है। उनका तर्क है कि मतदाता सूची से नाम कटने का गुस्सा लोगों में है और यह भाजपा के खिलाफ जाएगा। वहीं, पर्दे के पीछे की बेचैनी कुछ और ही कहानी बयां करती है। जमीनी समीकरणों में पैदा हुआ यह खालीपन उनके कैडर आधारित मतदान तंत्र को चुनौती दे रहा है।

भगवा खेमे के लिए ये आंकड़े मजबूती देने वाले हैं। पूरे कोलकाता में पिछले चुनाव में 11 में से एक भी सीट उनके पास नहीं थी। अब उनका मानना है कि बंगाल के चुनावों में हर सीट पर 2 से 5 प्रतिशत का जो छप्पा वोट (फर्जी मतदान) का अभिशाप था, उसे चुनाव आयोग ने धो डाला है। केंद्रीय बलों के साये में अगर यह फर्जीवाड़ा रुकता है और असली मतदाता थोड़े भी अतिरिक्त जोश के साथ बाहर निकलता है तो भाजपा अपनी जीत सुनिश्चित मान रही है।

11 सीटों का नया समीकरण बदलाव की पदचाप

यही कहानी कोलकाता की लगभग सभी 11 सीटों पर दोहराई जा रही है। एंटाली में 2024 में 2,36,126 मतदाता थे, जो घटकर 1,78,877 रह गए हैं। अगर एक भी नया वोटर न निकले तो भी मतदान का आंकड़ा 93.43 प्रतिशत के अकल्पनीय स्तर पर पहुंच जाएगा।

इसी तरह जोड़ासांको में, जहां अमूमन कम वोटिंग होती थी, वहां वोटर की संख्या 1,97,388 से घटकर 1,22,668 रह गई है। सीधा मतलब है कि बिना एक भी नया वोट बढ़े, यहां का मतदान प्रतिशत 86.22 प्रतिशत दर्ज होगा। यह आंकड़ा रणनीतिकारों के माथे पर पसीना लाने के लिए काफी है।

स्थानीय दुकानदार कहते हैं कि लोग तो वही हैं, लेकिन सूची छोटी हो गई है। यही वजह है कि अगर वोटिंग पहले जितनी भी रही तो प्रतिशत 90 के पार जाता हुआ दिखेगा।

सिर्फ आंकड़ों की छलांग या खामोश लहर

यह महज एक सांख्यिकीय उछाल है या फिर परिवर्तन की कोई गहरी खामोश लहर? यह तो ईवीएम के खुलने पर ही तय होग, लेकिन एक बात पूरी तरह साफ है कि महानगर की इन 11 वीआईपी सीटों पर अब जो भी जीतेगा, वह छप्पा वोटों से नहीं, बल्कि इस नए, पारदर्शी और निर्मम अंकगणित की कसौटी पर खरा उतर कर ही जीतेगा। असली सियासी खेल अब आंकड़ों के इसी जादुई इंद्रजाल के इर्द-गिर्द सिमट गया है।

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