पश्चिम बंगाल की सियासत इतिहास दोहराने के लिए नहीं, बल्कि एक नया अध्याय लिखने को बेचैन है। बुधवार सवेरे जब 142 सीटों के लिए ईवीएम के बटन दबेंगे, तो वह केवल वोट भर नहीं होगा। यह ढाई दशक के वामपंथ और डेढ़ दशक के तृणमूल शासन के बीच उपजी एक नई सामाजिक चेतना का फैसला होगा। यह चुनाव महज राज्य की सत्ता के संघर्ष से ज्यादा लोकतंत्र के उस टर्निंग पॉइंट की आहट है, जिसकी धमक पूरे देश में गूंजेगी। मतलब मोदी है तो मुमकिन है या फिर ममता का कोई मुकाबला नहीं।
कोलकाता चुप रहने वाला शहर रहा है। यहां वोट मन में पड़ता है और जुबान पर नहीं आता। पर, इस बार कुछ बदला है। ड्राइंग रूम की बहस सड़कों पर आ गई है। टैक्सी ड्राइवर से लेकर न्यू टाउन के फ्लैट्स तक लोग कम से कम इस बार बोल रहे हैं। संकोच के साथ या खुलकर कह रहे हैं कि इस बार मुकाबला बराबरी का है। यह हिचक का टूटना ही इस चुनाव की असली पटकथा है।
कोलकाता 11 सांख्यिकी या संदेश?
सिटी ऑफ जॉय की 11 सीटें इस बार सत्ता की प्लेइंग इलेवन हैं। चुनाव आयोग की मतदाता सूची की सफाई यानी एसआईआर ने यहा एक डिजिटल सर्जिकल स्ट्राइक की है। चौरंगी और जोड़ासांको जैसे इलाकों से भूतिया वोटरों की विदाई हो चुकी है। अब जीत छप्पा वोट से नहीं, बल्कि असली नागरिक के विवेक से तय होगी। भाजपा के प्रबंधन और तृणमूल की जमीनी पकड़ के बीच यह असली पावरप्ले है।
भद्रलोक की कसमसाहट : टूटा दशकों का मौन
बंगाल का भद्रलोक हमेशा से अतिवाद से बचता रहा है। जिस समाज ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम और राष्ट्रगान जन-गण-मन जैसी अभिव्यक्ति दी, उसके भीतर आज अजीब कसमसाहट है। भाजपा की हिंदुत्ववादी राजनीति को कांग्रेस और वामपंथी सोच वाला वर्ग अब तक सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहा था। हालांकि, अब तृणमूल से भी उनका मन उचाट दिख रहा है। बंगाली पहचान और गौरव को हमेशा तवज्जो देने वाले इस समाज के सामने सुरक्षा, भ्रष्टाचार और अस्मिता की नई चुनौतियां हैं। कोलकाता का यह संभ्रांत वर्ग चुप नहीं है। चौक-चौराहों की बहसों में मुखर है।
थ्री एम का टकराव…त्रिशूल बनाम ब्रह्मास्त्र
ममता ने कभी मां, माटी, मानुष के त्रिशूल से वामपंथ का किला ढहाया था, आज फिर थ्री एम इस चुनाव की केंद्रीय विषयवस्तु है। एम के नए तीन तीर हैं…ममता, महिला व मुसलमान। लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं ने ग्रामीण महिलाओं की ऐसा मौन वोटर तैयार किया है, जो वफादारी का वचन देता है। हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड व बिहार में महिला फैक्टर ही सत्ता की कुंजी बना था। हालांकि, यह सुरक्षा का अहसास अभया के न्याय की गूंज व आरजी कर से उपजे आक्रोश के आगे टिक पाएगा? महिलाओं का यह मौन तृणमूल के लिए उम्मीद भी है और डर भी। दूसरी ओर, भाजपा ने मोदी के करिश्मे, शाह की चाणक्य नीति और राष्ट्रीय लहर का वह अंकगणितीय चक्रव्यूह रचा है, जिसने तृणमूल के अभेद्य माने जाने वाले कैडर-राज की चूलें हिला दी हैं।
युवाओं का मन : पहचान और पलायन का द्वंद्व
हुगली के चंदन नगर और सिंगूर की गलियों में घूमने पर खामोश बयार महसूस होती है। युवा अब केवल नारों से संतुष्ट नहीं है। 23 साल की तान्या का वह सवाल कि अपने ही घर में रिफ्यूजी बनकर कौन रहना चाहता है…बंगाल की वर्तमान व्यवस्था पर सबसे तीखा प्रहार है। पानीहाटी से कोलकाता के शिक्षण संस्थानों तक युवा अब पलायन और बेरोजगारी के खिलाफ खड़ा है…कहीं यह बदलाव का संकेत तो नहीं।
बंगाल किस ओर जाएगा…हुगली की बेचैनी, कोलकाता की खुलती आवाज, मुर्शिदाबाद की दोहरी सोच, नंदीग्राम की शांति और दक्षिण 24 परगना की मशीनरी। सब मिलकर एक ही कहानी कह रहे हैं। यह चुनाव भरोसे, भय, सम्मान और बदलाव के बीच का निर्णय है।
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