भारत में नकली और घटिया दवाओं की समस्या लंबे समय से चिंता का विषय रही है। कई बार मरीजों के लिए यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि जो दवा वे खरीद रहे हैं, वह असली है या नकली। इसी समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने दवाओं की ट्रैकिंग और सत्यापन व्यवस्था को और मजबूत करने के लिए क्यूआर कोड लगाने का फैसला किया है। इसके साथ ही आयात होने वाली दवाओं के शेल्फ लाइफ नियमों में भी बदलाव का प्रस्ताव रखा गया है।

आइए जानते हैं कि सरकार ने क्या फैसला लिया? अनुसूची एच2 क्या है? क्यूआर कोड कहां लगाया जाएगा? इससे फायदा क्या होगा? ये नियम कब से लागू होंगे? पहले क्या व्यवस्था थी? किन दवाओं पर ये क्यूआर कोड लगेंगे? आयातित दवाओं के नियमों में क्या बदलाव प्रस्तावित है और इसका क्या उद्देश्य है?
सरकार ने क्या फैसला लिया?
हाल ही में नकली इंजेक्शन के कारण राजस्थान के कोटा में प्रसूताओं की मौत हो गई। जांच के दौरान दवा के नमूने गुणवत्ता परीक्षण में फेल पाए गए और उनमें ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन में ऑक्सीटोसिन की मात्रा शून्य मिली। जांच में पाया गया कि फर्म ने जितनी दवाएं खरीदी थीं, उससे अधिक इंजेक्शन बाजार में बेचे गए।
ऐसे मामलों को देखते हुए स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय ने ड्रग्स रूल्स, 1945 में संशोधन कर अनुसूची एच2 के दायरे का विस्तार किया है। अब केवल चुनिंदा दवाओं तक सीमित रहने के बजाय इन श्रेणियों की सभी दवाएं अनुसूची एच2 के तहत आएंगी। इनमें शामिल हैं:
- सभी वैक्सीन
- सभी एंटीमाइक्रोबियल दवाएं
- सभी कैंसर रोधी दवाएं
- एनडीपीएस एक्ट, 1985 के तहत आने वाली सभी नारकोटिक और साइकोट्रॉपिक दवाएं
इन सभी दवाओं पर अब क्यूआर कोड या बार कोड लगाना अनिवार्य होगा।

