भारत ने सिंधु जल समझौते को लेकर एक बहुत बड़ा और कड़ा फैसला लिया है। भारत ने कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता अदालत) के उस फैसले को पूरी तरह से खारिज कर दिया है, जो 15 मई को सुनाया गया था। भारत ने साफ कर दिया है कि सिंधु जल समझौते पर जो रोक उसने लगाई थी, वह आगे भी जारी रहेगी। यह फैसला देश की सुरक्षा और संप्रभुता को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया कि यह मध्यस्थता अदालत पूरी तरह से गैरकानूनी है। इस अवैध अदालत ने पानी जमा करने (पॉन्डेज) को लेकर एक फैसला सुनाया था, जिसे भारत ने सिरे से नकार दिया है। भारत का कहना है कि उसने कभी भी इस अदालत के गठन को मान्यता नहीं दी है। इसलिए, इस अदालत द्वारा की गई कोई भी कार्रवाई या सुनाया गया कोई भी फैसला भारत के लिए शून्य और अमान्य है। भारत ऐसे किसी भी आदेश को मानने के लिए बिल्कुल बाध्य नहीं है।
ये भी पढ़ें- ‘नीदरलैंड भारत का बड़ा निवेशक’: पीएम मोदी बोले- व्यापार में भी आगे; अब साथ मिलकर करेंगे नई शुरुआत
भारत ने इस अदालत के फैसले को अवैध क्यों बताया है?
भारत का शुरू से ही यह स्पष्ट रुख रहा है कि इस तथाकथित मध्यस्थता अदालत का बनाया जाना ही अपने आप में सिंधु जल समझौते का बहुत बड़ा उल्लंघन है। पिछले साल जून में भी भारत ने एक बयान जारी कर कहा था कि वह कानूनी रूप से इस अदालत के अस्तित्व को बिल्कुल नहीं मानता है। जब अदालत ही अवैध है, तो उसके सामने होने वाली किसी भी तरह की सुनवाई और उसका कोई भी फैसला पूरी तरह से गैरकानूनी माना जाएगा।
भारत ने सिंधु जल समझौते पर रोक क्यों लगाई थी?
भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए इस समझौते पर रोक लगाई है। पहलगाम में हुए भयानक आतंकी हमले के बाद भारत ने यह कड़ा कदम उठाया था। भारत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार से होने वाले आतंकवाद को पूरी तरह और हमेशा के लिए बंद नहीं कर देता, तब तक यह समझौता ऐसे ही निलंबित (रोक पर) रहेगा। भारत अब आतंकवाद के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं करेगा।
क्या कोई अदालत भारत के इस फैसले की जांच कर सकती है?
विदेश मंत्रालय ने साफ कहा है कि जब तक यह समझौता निलंबित है, तब तक भारत इस समझौते के तहत अपनी किसी भी जिम्मेदारी को निभाने के लिए मजबूर नहीं है। दुनिया की कोई भी अदालत, खासकर यह गैरकानूनी मध्यस्थता अदालत, भारत के इस फैसले की कानूनी जांच नहीं कर सकती है। भारत एक स्वतंत्र देश है और आतंकवाद के खिलाफ अपनी सुरक्षा के लिए फैसले लेने का उसे पूरा अधिकार है।
