अभिषेक कुमार सिन्हा ‘बंटी’ ने बांकीपुर विधानसभा उप चुनाव के लिए कल नामांकन पत्र दाखिल किया तो ‘अमर उजाला’ ने सबसे पहले एक खबर सामने लायी थी। शपथ पत्र पर बाकी मीडिया ने खबर लिखी कि उनके पास कितना धन है और परिवार में कौन-क्या है, लेकिन हमने सवाल उठाया था अभिषेक की शिक्षा का। शपथ पत्र में जो लिखा था, उससे शक होना अजूबा नहीं था। अभिषेक ने नामांकन के 24 घंटे बाद ही, शुक्रवार को नाम वापसी कर धमाका कर दिया। वास्तव में यह भारतीय जनता पार्टी की बड़ी चूक थी, जिसे अभिषेक ने ‘पारिवारिक कारण’ बताया।

आज जो चर्चा, कल ही वह बताया था हमने
अभिषेक कुमार ने शुक्रवार को भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी के पास जाकर एक पत्र सौंपा कि वह पारिवारिक कारणों से यह चुनाव नहीं लड़ पा रहे हैं। पारिवारिक कारण भी ऐसा कि पूरा परिवार शुक्रवार दोपहर तक घर के बाहर जश्न मना रहा था, रोमांचित था। तो, वजह क्या थी? वजह वाजिब थी, लेकिन औपचारिक तौर पर यह कोई नहीं कह रहा। सिर्फ चर्चा है कि अभिषेक की शिक्षा को लेकर भाजपा असहज हो गई थी। उसे पता चल गया था कि विपक्षी दल, खासकर प्रशांत किशोर की पार्टी अभिषेक की शैक्षणिक योग्यता की जांच में लग गई है। नामांकन के समय दाखिल शपथ पत्र के आधार पर ‘अमर उजाला’ ने सवाल उठाया था कि पटना शहर के निवासी अभिषेक को बिहार बोर्ड छोड़कर संस्कृत शिक्षा बोर्ड के एक अज्ञात जैसे ग्रामीण संस्कृत विद्यालय से मध्यमा की पढ़ाई आखिर क्यों करनी पड़ी? बताया जा रहा है कि भाजपा अभिषेक की शिक्षा पर ही असहज हुई और उसे पता चला कि बगैर सारी जानकारी जुटाए ही उसने यह नाम घोषित कर गलती कर दी थी।
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जतरा भी खराब हो गया था अभिषेक का
अभिषेक कुमार के नामांकन के समय ही जतरा खराब हो गया था। हुआ यूं कि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी उनका नाम भूल गए। नाम भूले तो भूले, बांकीपुर उप चुनाव के प्रत्याशियों की दौड़ में रहे आशीष सिन्हा का नाम ले लिया। मतलब, कह दिया कि वह आशीष सिन्हा के नामांकन में आए हैं। आशीष सिन्हा भाजपा के कुम्हरार विधायक रहे अरुण कुमार सिन्हा के बेटे तो हैं ही, पटना विवि छात्र संघ के चर्चित अध्यक्ष और अधिवक्ता भी हैं। नाम के एलान से पहले आशीष का युवा के रूप में सबसे ज्यादा नाम चल रहा था। वरिष्ठ में रणवीर नंदन का नाम भी खूब चल रहा था, जो बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड के अध्यक्ष हैं और दो दशक पहले पटना की उम्मीदवारी रखते हुए बाद में विधान पार्षद भी बनाए गए थे। चलाने वाले तो संसदीय कद रखने वाले राष्ट्रीय मंत्री रितुराज सिन्हा का भी नाम चला रहे थे, जबकि वह इसके लिए बहुत रुचि नहीं रख रहे थे। कई और नाम भी अपने-अपने हिसाब से चल रहे थे, जिसमें आशीष सिन्हा का नाम सरावगी के मुंह से निकला तो खबर बन गई।
पवन सिंह की तरह नहीं अभिषेक, यह अच्छा संदेश
पवन सिंह ने लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल से टिकट मिलने पर छोड़ा तो उसके बाद पूरे चुनाव वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के लिए परेशानी का सबब ही बन गए। उन्होंने शाहाबाद में एनडीए का बड़ा नुकसान कराया। पवन सिंह अब भाजपा कोटे से ही विधान पार्षद बनकर घाव साफ कर चुके हैं। अभिषेक ने पवन सिंह वाली गलती नहीं की। अभिषेक ने जिन कारणों से नामांकन वापस लेने की जानकारी दी, वह अपनी जगह लेकिन साथ-साथ यह भी कहा कि वह पार्टी के सिपाही बने रहेंगे। अभिषेक भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन के बहुत करीबी हैं। यही कारण है कि नितिन ने बांकीपुर की सीट के लिए पहली पसंद के रूप में उनका नाम रखा था। बुरा बस यह रहा कि पटना में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की महाबैठक के तत्काल बाद अभिषेक के नाम वापसी की खबर ने उस बैठक को सुर्खियों से दूर कर दिया। नितिन भी इस बैठक के लिए आज पटना में ही थे, जब यह सब हुआ।

