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इंस्टाग्राम चलाने के बाद अपनी ही जिंदगी बोरिंग क्यों लगने लगती है? जानिए इसके पीछे की साइकोलॉजी

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Instagram and Social Comparison: आज के समय में हम में से ज्यादातर लोग इंस्टाग्राम का इस्तेमाल करने लग गए हैं. अक्सर जब हम बोर हो जाते हैं, तो सबसे पहले अपने स्मार्टफोन में इंस्टाग्राम को ही ओपन कर लेते हैं. लेकिन क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि इंस्टाग्राम खोलने से पहले तो आपका मूड बहुत ही अच्छा था, लेकिन फिर जब आपने कुछ देर तक दूसरों की फोटो और रील्स देखीं, तो अचानक से आपको अपनी ही जिंदगी थोड़ी बोरिंग या फिर फीकी सी लगने लग गई? किसी को विदेश घूमते देखना, नई कार खरीदते देखना, अपने सुंदर से घर का टूर देते देखना या फिर एक बढ़िया जॉब प्रोफाइल देखकर अक्सर हम सभी अनजाने में खुद की तुलना उस इंसान से करने लग जाते हैं. इसके बाद मन में एक ही ख्याल आता है, "यार, बाकी सब तो कितनी मजे की जिंदगी जी रहे हैं और कितने सफल हैं, बस एक मैं ही पीछे छूट गया हूं."

आज के समय में ऐसा महसूस होना बहुत ही नॉर्मल बात है. इसके पीछे हमारे दिमाग की एक खास आदत काम करती है, जिसे साइकोलॉजी में सोशल कंपैरिजन या सामाजिक तुलना कहते हैं. आसान भाषा में कहें तो जब हम दूसरों को देखकर अपनी जिंदगी का अंदाजा लगाने लगते हैं, तो इसे ही सोशल कंपैरिजन कहते हैं. सोशल मीडिया ने इस तुलना को हजार गुना बढ़ा दिया है, क्योंकि यहां हर कोई रोज अपनी जिंदगी के सबसे बेहतरीन पल ही पोस्ट करता है.

why social comparison happens
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हमारा दिमाग खुद को दूसरों से कंपेयर क्यों करता है?

दूसरों से खुद की तुलना करना इंसान का काफी पुराना स्वभाव है. जब हम अपने आसपास के लोगों को देखते हैं तो मन में यह समझने की कोशिश करने लग जाते हैं कि उनके सामने हम कहां पर स्टैंड करते हैं. सोशल मीडिया आने से पहले यह तुलना सिर्फ हमारे दोस्तों, रिश्तेदारों या पड़ोसियों तक सीमित थी. लेकिन अब इंस्टाग्राम खोलते ही सैकड़ों लोगों की जिंदगी हमारे सामने होती है. कोई विदेश में अपनी छुट्टियां बिता रहा है, कोई नया फोन खरीद रहा है, कोई बॉडी बना रहा है, तो कोई करियर में धूम मचा रहा है. ऐसे में दिमाग बिना सोचे समझे अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को उनकी चमक धमक वाली पोस्ट से कंपेयर करने लगता है.

सोशल कंपैरिजन का असली खेल क्या है?

साइकोलॉजी की भाषा में जब आप खुद से ज़्यादा सफल, सुंदर और अमीर दिखने वाले लोगों से अपनी तुलना करते हैं, तो इसे अपवर्ड सोशल कंपैरिजन कहा जाता है. उदाहरण के लिए, अगर कोई इंसान अपनी जॉब, कमाई, फिटनेस या स्टाइल में आपसे बेहतर दिख रहा है और आप खुद को उससे कम आंकने लगते हैं, तो यही अपवर्ड कंपैरिजन है.

साइंस और रिसर्च इस बारे में क्या कहती है?

साल 2019 की एक रिसर्च में Desiree Schmuck और उनकी टीम ने 461 लोगों पर स्टडी की और पाया कि फेसबुक और इंस्टाग्राम का इस्तेमाल अक्सर लोगों में अपवर्ड सोशल कंपैरिजन की भावना को जन्म देता है. समय के साथ साथ इस तरह की कंपैरिजन से लोगों का आत्मसम्मान और मेंटल हैप्पीनेस कम होने लगती है. इसका मतलब यह नहीं कि इंस्टाग्राम का इस्तेमाल करने वाला हर इंसान दुखी हो जाएगा, बल्कि यह है कि इसके ज्यादा इस्तेमाल और कम खुशी के बीच एक गहरा कनेक्शन है.

साल 2020 के एक बड़े रिव्यू में Philippe Verduyn और उनकी टीम ने पाया कि जब हम सोशल मीडिया पर सिर्फ दूसरों की पोस्ट को स्क्रॉल करते रहते हैं, तो कंपैरिजन की फीलिंग ज्यादा जागने लगती है. ज्यादातर लोग अपवर्ड कंपैरिजन ही करते हैं, जिसका उनकी मेंटल हेल्थ पर काफी बुरा असर पड़ता है.

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इंस्टाग्राम पर सबकी लाइफ इतनी परफेक्ट क्यों दिखती है?

जब हम इंस्टाग्राम की बात करते हैं, तो यहां पर हमें कभी भी किसी भी इंसान की पूरी असली जिंदगी दिखाई नहीं देती है. यहां पर हमें सिर्फ वही फोटो और वीडियो देखने को मिलते हैं, जिन्हें सामने वाला इंसान हमें दिखाना चाहता है. फैमिली के साथ एक अच्छी वेकेशन, नई गाड़ी, जिम का रिजल्ट या कोई बड़ी जीत, यही सब चीजें हमारे सामने आती हैं. लेकिन उस एक परफेक्ट फोटो के पीछे उस इंसान ने कितना स्ट्रेस झेला है, कितनी परेशानियां उठाई हैं, वह हमें कभी नहीं दिखाई देती हैं. असली दिक्कत भी यहीं से शुरू होती है, जब हम अपनी पूरी जिंदगी जिसमें दुख, सुख, बोरियत सब शामिल है की तुलना सामने वाले की चुनिंदा कुछ अच्छी तस्वीरों से करने लगते हैं. हमें अपनी परेशानियां तो पता होती हैं, लेकिन स्क्रीन पर दिख रहे बंदे की परेशानियां छिपी रहती हैं.

भारतीय युवाओं पर हुई एक खास रिसर्च

भारत में इसके माहौल को समझने के लिए 2022 की एक रिसर्च (IJIM Data Insights) में 726 भारतीय युवाओं से सवाल पूछे गए. इस स्टडी में पाया गया कि इंस्टाग्राम पर दूसरों से कंपैरिजन करने की आदत का डायरेक्ट कनेक्शन इस बात से भी था कि युवा अपने रूप रंग और अपनी मेंटल हेल्थ को लेकर कैसा महसूस करते हैं. हालांकि, रिसर्च करने वालों ने यह भी क्लियर किया कि यह एक कोरिलेशनल स्टडी थी. इसका मतलब यह है कि इंस्टाग्राम सीधे तौर पर मेंटल हेल्थ खराब करने की गारंटी नहीं देता, लेकिन इसका लगातार इस्तेमाल और कम्पेयर करने की आदत आपकी मेंटल हेल्थ को अफेक्ट जरूर कर सकती है.

क्या दूसरों से तुलना करना हमेशा बुरा होता है?

अगर आपके दिमाग में भी यह सवाल अभी तक उठ चुका है, तो इसका सीधा और बिल्कुल ही सिंपल सा जवाब है जी नहीं, दूसरों से खुद की तुलना करना हर बार गलत नहीं होता है. कभी-कभी दूसरों को देखकर खुद को बेहतर बनाने का मन करता है और यह काफी पॉजिटिव भी साबित हो सकता है. जैसे किसी की फिटनेस देखकर हर दिन 20 मिनट वर्कआउट करना, किसी को पढ़ते देखकर खुद किताबें पढ़ना शुरू कर देना, या किसी की मेहनत देखकर अपनी पढ़ाई और काम पर ध्यान देना, इस तरह का कंपैरिजन आपको लाइफ में आगे बढ़ने के लिए मोटिवेट करता है. प्रॉब्लम तब शुरू होती है जब तुलना के बाद मन में हीन भावना आने लगे और "मैं किसी काम का नहीं हूं", "मैं सुंदर नहीं दिखता या दिखती" या "मेरी लाइफ बेकार है" जैसे ख्याल बार-बार मन में आकर आपको परेशान करने लगें. जब ऐसा होने लगे, तो समझ जाइए कि सोशल मीडिया आपकी सोच और मूड को निगेटिव रूप से अफेक्ट कर रहा है.

अगर अपनी लाइफ फीकी लगे, तो क्या करें?

अगर इंस्टाग्राम का इस्तेमाल करने के बाद आपको अपनी ही जिंदगी फीकी लगने लग जाए, तो सबसे पहले इस सच को एक्सेप्ट कर लें कि सोशल मिडिया की यह दुनिया एडिटेड और फिल्टर की हुई है. इसलिए कभी भी किसी की एक चमकती हुई फोटो को देखकर आपको उसकी पूरी जिंदगी का अंदाजा नहीं लगाना चाहिए. जिन इंस्टाग्राम अकाउंट्स को देखकर बार-बार अपने अंदर कमी महसूस हो या मूड खराब हो, उन्हें बिना झिझक म्यूट या अनफॉलो कर दें. इसके अलावा स्क्रीन पर सिर्फ स्क्रॉल करते रहने के बजाय दोस्तों से रियल लाइफ में बात करें, अपनी पसंद के खेल या फिर अपनी किसी हॉबी को समय दें. अगर आपको जरूरत लगे तो कुछ देर के लिए फोन से दूरी बना लेना भी एक बेहतरीन चॉइस है. सबसे जरूरी बात यह याद रखें कि कभी भी अपनी पूरी 24 घंटे की असली जिंदगी का हिसाब किसी दूसरे के 15 सेकंड के रील से नहीं लगाना चाहिए.

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