
Mithila Aripan Art: मिथिला अपनी पान, मखान और मधुबनी पेंटिंग के लिए तो प्रसिद्ध है ही, यहां की अरिपन कला भी खास पहचान रखती है. अरिपन एक पारंपरिक लोककला है, जिसे आमतौर पर पर्व-त्योहार, पूजा और दूसरे शुभ अवसरों पर बनाया जाता है. इसे जमीन या आंगन में चावल के घोल से अलग-अलग आकृतियां बनाकर तैयार किया जाता है. समय के साथ अब इसे कागज पर भी बनाया जाने लगा है.
अरिपन के बिना कोई भी आयोजन पूरा नहीं होता: चतुरानन झा
एक इंटरव्यू में मैथिल कलाकार चतुरानन झा बताते है कि अरिपन एक तरह की शुभ फर्श कला है, जिसे हर शुभ अवसर पर बनाया जाता है. इसके बिना कोई भी आयोजन पूरा नहीं माना जाता. हमारे समुदाय में यह परंपरा बहुत लंबे समय से चली आ रही है.
पूजा और शुभ अवसरों से जुड़ी है परंपरा
मिथिला में अरिपन का इस्तेमाल अलग-अलग धार्मिक और पारंपरिक अवसरों पर किया जाता है. किस मौके पर अरिपन बनाया जा रहा है, उसके अनुसार उसकी आकृति और उसमें बनाए जाने वाले प्रतीक भी बदल सकते हैं. इसलिए इसे केवल एक खास डिजाइन तक सीमित नहीं माना जा सकता. परंपरागत रूप से अरिपन घर के आंगन या जमीन पर बनाया जाता रहा है. जमीन को साफ करके कई जगह गोबर और मिट्टी से लीपा जाता है. इसके बाद चावल को पीसकर तैयार किए गए घोल से रेखाएं और आकृतियां बनाई जाती हैं. अरिपन बनाने की यह परंपरा आज भी कई जगहों पर देखने को मिलती है.
अब कागज पर भी बनाई जाती है
यह कला समय के साथ अरिपन जमीन से निकलकर कागज तक पहुंच गया है. कलाकार अब इसकी आकृतियों को कागज पर भी तैयार करते हैं, जिससे इस लोककला को सुरक्षित रखना और लोगों तक पहुंचाना आसान हुआ है. हालांकि कागज पर बनाए जाने वाले अरिपन में पारंपरिक आकृतियों और रंगों को अलग तरीके से तैयार किया जा सकता है.
अष्टदल अरिपन की है खास पहचान
अरिपन के अलग-अलग रूपों में अष्टदल भी शामिल है. इसमें आठ पंखुड़ियों वाले कमल जैसी आकृति बनाई जाती है. इसे हर अरिपन की पहचान मानना सही नहीं है, क्योंकि अलग-अलग पूजा और संस्कार के लिए अलग डिजाइन बनाए जाते हैं. कुछ पारंपरिक अरिपन में ज्यामितीय आकृतियों के साथ धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल भी किया जाता है.
अरिपन में दिखते हैं कई धार्मिक प्रतीक
अरिपन में बनाए जाने वाले प्रतीक भी अवसर के अनुसार बदलते हैं. इनमें कमल, शंख, स्वस्तिक, सूर्य-चंद्रमा, देवी-देवताओं से जुड़े चिह्न, पेड़-पौधे और दूसरी आकृतियां शामिल हो सकती हैं. इनका संबंध उस पूजा, व्रत या संस्कार से होता है जिसके लिए अरिपन बनाया जाता है.
चावल के घोल और सिंदूर का होता है इस्तेमाल
अरिपन में सफेद रंग के लिए चावल को पीसकर तैयार किया गया घोल इस्तेमाल किया जाता है. कई पारंपरिक अरिपन में लाल रंग के लिए सिंदूर का भी इस्तेमाल होता है. इस तरह सफेद और लाल रंग से जमीन या कागज पर अलग-अलग आकृतियां बनाई जाती हैं.
पीढ़ियों से आगे बढ़ रही है अरिपन की कला
अरिपन केवल घर की सजावट का हिस्सा नहीं है, बल्कि मिथिला की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी लोककला है. इसे बनाने की जानकारी लंबे समय से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रही है. आज भी पर्व-त्योहार और शुभ अवसरों पर मिथिला के कई परिवारों में अरिपन बनाने की परंपरा जारी है.
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