अक्सर जब हम या परिवार का कोई सदस्य बीमार पड़ता है तो मेडिकल स्टोर पर जाकर हम कई बार एक अजीब सी उलझन में फंस जाते हैं. डॉक्टर ने पर्चे पर जो दवा लिखी है, उसका एमआरपी 100 रुपए है और इस बारे में पूछताछ करने पर पता चलता है कि यही दवा दूसरी कंपनी की 20 रुपए में उपलब्ध है या फिर उस दवा पर 85% तक का भारी डिस्काउंट है.
उस स्थिति में मन में कुछ सवाल आते हैं- क्या इतनी सस्ती दवा असर करेगी?, कहीं डिस्काउंट के चक्कर में मुझे घटिया या नकली दवा तो नहीं दी जा रही है?
झारखंड की राजधानी रांची में आर्किड मेडिकल हॉस्पिटल और नागरमल मोदी सेवा सदन से जुड़े डॉ. रमन कुमार दवाओं की कीमत और मरीजों के सामने मौजूद इस भ्रम को लेकर पारदर्शिता की जरूरत पर जोर देते हैं.
MRP ज्यादा है तो दवा बेहतर है?

हमारे समाज में एक आम धारणा है कि 'जो चीज जितनी महंगी है, वह उतनी ही बेहतर होगी' लेकिन दवाओं के मामले में यह सही हो ऐसा जरूरी नहीं है! सबसे पहले एक बात समझना जरूरी है कि एमआरपी किसी दवा की गुणवत्ता या उसके असरदार होने का सर्टिफिकेट नहीं है.
इसे और आसान भाषा में कहूं तो किसी दवा का एमआरपी ज्यादा होने का मतलब यह नहीं है कि वह दूसरी समान दवा से बेहतर है. इसी तरह किसी दवा की कीमत कम होने का भी यह मतलब नहीं है कि उसकी क्वालिटी खराब है.
डॉ. रमन कुमार के मुताबिक, दवा अच्छी है या नहीं, यह इस बात से तय होता है कि उसे सरकारी मंजूरी मिली है या नहीं और वह किस क्वालिटी और टेस्टिंग के साथ बनाई गई है, इसलिए सिर्फ पैकेट पर लिखी कीमत देखकर किसी दवा को अच्छी या खराब मान लेना सही तरीका नहीं है.
अब सवाल उठता है एक ही दवा की कीमत में इतना अंतर क्यों?

मान लीजिए बाजार में एक ही ऐक्टिव इंग्रीडिएंट वाली 3 दवाएं हैं. पहली दवा का एमआरपी 100 रुपए है और वह 90 रुपए में मिल रही है, दूसरी का एमआरपी 100 रुपए है और वह 20 रुपए में मिल रही है और तीसरी का एमआरपी 100 रुपए है और कंपनी 85% डिस्काउंट बताकर उसे 15 रुपए में बेच रही है. ऐसे में दवा खरीददार के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर 15 रुपए और 90 रुपए वाली दवा में इतना अंतर क्यों है?
डॉ. रमन कुमार के अनुसार, यहीं कीमत में पारदर्शिता की जरूरत महसूस होती है.
मरीज को यह समझ में आना चाहिए कि दवा की वास्तविक बिक्री कीमत क्या है, उसका लागू अधिकतम मूल्य क्या है और वह वास्तव में कितने रुपए चुका रहा है.
85% डिस्काउंट देखकर प्रभावित न हों

बड़ी छूट देखकर किसी भी ग्राहक को लगता है कि उसे बहुत सस्ता सौदा मिल रहा है, लेकिन दवाओं के मामले में सिर्फ डिस्काउंट का प्रतिशत देखकर फैसला करना सही नहीं है. उदाहरण के लिए अगर किसी दवा का एमआरपी 100 रुपए है और वह 20 रुपए में बिक रही है तो उसे 80% डिस्काउंट कहना गणित के हिसाब से तो सही हो सकता है लेकिन इससे मरीज को यह भी लग सकता है कि दवा की असली कीमत 100 रुपए ही है.
मतलब अगर 100 रुपए एमआरपी वाली दवा 15 रुपए या 20 रुपए में ही बेची जा रही है, तो उसका एमआरपी 100 रखा ही क्यों गया? यह भारी-भरकम एमआरपी का खेल सिर्फ मरीजों को "बड़ी बचत" का मनोवैज्ञानिक अहसास कराने के लिए होता है? असली मुद्दा यह होना चाहिए कि मरीजो को पता हो कि दवा की 'वास्तविक और सही कीमत' क्या है. इसलिए दवाओं में डिस्काउंट के दावों को लेकर स्पष्ट नियम और पारदर्शिता मरीजों के हित में महत्वपूर्ण हो सकती है.
मरीज को दवा खरीदने से पहले 4 बातें जरूर पता होनी चाहिए
दवा खरीदते समय मरीज को बहुत ज्यादा तकनीकी जानकारी समझने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। डॉ. रमन कुमार ने बताया कि व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि मरीज आसानी से 4 सवालों के जवाब जान सके:
मैं कौन सी दवा खरीद रहा हूं?
क्या यह दवा जरूरी गुणवत्ता मानकों को पूरा करती है?
इसका लागू अधिकतम मूल्य क्या है?
मैं वास्तव में कितने रुपए चुका रहा हूं?
अगर इन 4 सवालों के जवाब आसानी से मिल जाएं तो दवा खरीदने को लेकर भ्रम काफी हद तक कम हो सकता है.
पैकेट पर QR कोड से लोगो को मिले पूरी जानकारी
एक बेहतर व्यवस्था के तहत दवा के पैकेट पर ऐसा क्यूआर कोड दिया जा सकता है, जिसे स्कैन करने पर मरीज को उस दवा के बारे में जरूरी जानकारी मिल सके.
जेनेरिक दवा का मतलब खराब क्वालिटी नहीं
सरकार ने सस्ती जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा देने और आवश्यक दवाओं के मूल्यों को रेगुलेट करने के लिए काफी प्रयास किए हैं लेकिन जेनेरिक दवाओं को लेकर समाज में एक आम धारणा है कि सस्ती दवा शायद कम अच्छी होगी. लेकिन केवल कीमत के आधार पर ऐसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं है.
बहस इस बात पर होनी चाहिए कि दवा की क्वालिटी कैसी है, तय मानकों को पूरा करती है या नहीं, उसकी कीमत क्या है और मरीज को कितनी पारदर्शी जानकारी मिल रही है.
ग्रामीण इलाकों में ज्यादा जरूरत
डॉक्टर रमन कुमार ने कहा कि दवा की कीमत और क्वालिटी से जुड़ी पारदर्शिता की जरूरत ग्रामीण इलाकों में और भी ज्यादा हो सकती है. कई जगह मरीजों के पास दवा की कीमतों की तुलना करने के लिए सीमित विकल्प होते हैं. यह जानकारी हिंदी और स्थानीय भाषाओं में हो तो इसे समझना और आसान होगा.
डॉक्टर की भूमिका क्या हो?
उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था का मकसद डॉक्टर के इलाज संबंधी फैसले को सीमित करना नहीं होना चाहिए. हालांकि, दवा के प्रिस्क्रिप्शन में जहां उचित हो, जेनेरिक नाम और खुराक आदि की जानकारी देना मरीज के लिए मददगार हो सकता है.
हर साल दवाओं की कीमतों की हो समीक्षा
डॉक्टर रमन ने सुझाव दिया है कि अगर किसी दवा के सबसे कम बाजार मूल्य और सबसे ज्यादा एमआरपी के बीच बहुत अधिक अंतर है तो ऐसी दवाओं की समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए. इसमें देखा जा सकता है कि कीमत में इतना अंतर क्यों है.
सुप्रीम कोर्ट द्वारा दवाओं की आसमान छूती कीमतों पर जताई गई चिंता के बीच दवा की कीमत पारदर्शी होना सिर्फ नियमों का विषय नहीं है, बल्कि मरीज के भरोसे से जुड़ा सवाल भी है.
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