राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के प्रस्तावित नियमों को लेकर देश भर में जारी खींचतान के बीच महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये नियम केवल प्रस्ताव हैं, जिन्हें न तो कानून बनाया गया है और न ही यह आगे कानून बनेगा। संघ प्रमुख ने यहां जैन संत आचार्य पुलकसागर महाराज से लगभग 40 मिनट तक चली मुलाकात में सामाजिक समरसता, जातिवाद और देश के वर्तमान हालात पर गहन मंथन किया। सूत्रों का दावा है कि बातचीत के दौरान ही भागवत ने यह बात कही।


जैन संत से मुलाकात और अहम विषयों पर चर्चा
दरअसल, आचार्य पुलकसागर महाराज ने वार्ता के दौरान विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के प्रस्तावित नियमों का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। इस पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि अभी केवल मसौदा सामने आया है और यह पास नहीं हुआ है। उन्होंने आश्वस्त किया कि यह कानून नहीं बनेगा। आचार्य पुलकसागर ने बैठक के दौरान दोनों ने समाज में व्याप्त जातिगत विषमता को समाप्त करने तथा सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने पर विशेष बल दिया।
प्रस्तावित नियमों पर देश भर में जारी खींचतान
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव समाप्त करने के मकसद से नए नियम प्रस्तावित किए हैं। इन नियमों का ध्येय कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जाति, धर्म, लिंग, जन्मस्थान अथवा अन्य किसी आधार पर होने वाले पक्षपात को रोकना है। साथ ही, विद्यार्थियों की शिकायतों के समाधान हेतु व्यवस्था को मजबूत बनाना है। हालांकि, इन नियमों के प्रारूप पर देश भर में विवाद उत्पन्न हो गया। विभिन्न संगठनों ने आरोप लगाया कि इन प्रावधानों में सामान्य वर्ग के छात्रों की सुरक्षा को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। यह चिंता भी जताई कि इन नियमों का दुरुपयोग करके गलत या झूठी शिकायतें दर्ज कराई जा सकती हैं।
सर्वोच्च न्यायालय की रोक और सरकार का रुख
नियमों में शामिल जातिगत भेदभाव की परिभाषा और शिकायतों के निस्तारण की प्रक्रिया पर सवाल उठने के बाद यह मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा। सर्वोच्च न्यायालय ने प्रस्तावित नियमों के कुछ हिस्सों को प्रथम दृष्टया अस्पष्ट पाया। शीर्ष अदालत ने फिलहाल इनके लागू होने पर रोक लगा दी है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रोक लगाए जाने के बाद केंद्र सरकार ने भी अपने रुख में बदलाव करते हुए पूरे मसौदे पर फिर से विचार करने की बात कही है।