भारत में हवाई सफर करने वाले यात्रियों के लिए चिंता बढ़ाने वाली खबर है. देश में एयरलाइंस ने उड़ानों और सीटों की संख्या में कटौती शुरू कर दी है. सितंबर 2026 में एयरलाइंस ने कुल 2 करोड़ 27 लाख सीटें शेड्यूल की हैं जबकि पिछले साल सितंबर में यह संख्या 2 करोड़ 38 लाख थी. एक साल में करीब 4.5 फीसदी सीटें कम हुई हैं. खास बात यह है कि सीटों में यह गिरावट लगातार तीसरे महीने जारी है.
एविएशन डेटा कंपनी OAG के मुताबिक इस बार सबसे ज्यादा कटौती घरेलू उड़ानों में हुई है. घरेलू सीटें 5.6 फीसदी घटकर 1.5 करोड़ रह गई हैं. वहीं इंटरनेशनल सीटें 2.1 फीसदी घटकर 77 लाख रह गईं.
सीटें कम हुईं तो किराए पर क्यों पड़ेगा असर?
सीटों की संख्या कम होने का सीधा मतलब यह है कि कई रूट पर यात्रियों के पास उड़ानों के विकल्प कम हो सकते हैं. जब किसी रूट पर सीटें कम होती हैं लेकिन यात्रियों की मांग बनी रहती है तो किराए पर ऊपर की तरफ दबाव बढ़ सकता है. अभी इसके संकेत भी दिख रहे हैं. DGCA के आंकड़ों के मुताबिक 72 बड़े घरेलू रूट पर औसत किराया मार्च 2025 से जून 2026 के बीच करीब 20.5 फीसदी बढ़ चुका है.
जुलाई में घरेलू उड़ानों की 83.1 फीसदी सीटें भरीं. पिछले साल जुलाई में यह आंकड़ा 82.9 फीसदी था. इसका मतलब है कि सीटें कम हुईं लेकिन विमान में सीट भरने की दर लगभग उतनी ही बनी रही. ऐसे में आगे अगर एयरलाइंस ने सीटें और कम कीं और यात्रियों की मांग बनी रही तो किराए पर और दबाव पड़ सकता है.
घरेलू उड़ानों में सबसे ज्यादा कटौती
सितंबर में घरेलू सीटों में 5.6 फीसदी की गिरावट हुई है. इंटरनेशनल सीटों में कमी 2.1 फीसदी रही. इसका असर अलग-अलग एयरलाइंस पर भी दिखाई दे रहा है. देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो की सितंबर में सीटें 4.5 फीसदी घटकर 1 करोड़ 12 लाख रह गईं. एक ही महीने में करीब 5 लाख 25 हजार सीटें कम की गईं.
एयर इंडिया की सीटें 8.8 फीसदी घटकर 32.2 लाख रह गईं. एयर इंडिया एक्सप्रेस की सीटें 2.6 फीसदी घटकर 25.4 लाख रहीं. हालांकि अगस्त में इसकी सीटों में 8.4 फीसदी की गिरावट हुई थी इसलिए सितंबर में स्थिति कुछ बेहतर हुई है.
आखिर एयरलाइंस उड़ानें क्यों काट रही हैं?
पश्चिम एशिया में लड़ाई के बाद मार्च 2026 में ईरान का हवाई क्षेत्र बंद हुआ था. जून में ईरान ने पूर्वी हिस्सा कुछ उड़ानों के लिए खोल दिया लेकिन पश्चिमी हिस्सा अब भी बंद है. EASA ने अपनी एयरलाइंस को ईरान के ऊपर किसी भी ऊंचाई पर उड़ान नहीं भरने की सलाह दी है. इराक, लेबनान, बहरीन, कुवैत, कतर और यूएई को लेकर भी सलाह जारी है.
इसके अलावा पाकिस्तान का हवाई क्षेत्र भारतीय विमानों के लिए पहले से बंद है. इसका मतलब है कि कई उड़ानों को लंबा रास्ता लेना पड़ रहा है. इससे समय और ईंधन दोनों का खर्च बढ़ता है.
ATF हुआ महंगा
विमान का ईंधन यानी ATF भी महंगा हुआ है. 1 सितंबर को ATF की कीमत 5.46 फीसदी बढ़ाकर 121 रुपये 28 पैसे प्रति लीटर कर दी गई. यह लगातार दूसरी बढ़ोतरी थी. जून में ATF करीब 115 रुपये था. जुलाई में यह घटकर 110 रुपये हुआ फिर अगस्त में करीब 115 रुपये और सितंबर में 121.28 रुपये प्रति लीटर हो गया. एयरलाइन के कुल खर्च में ईंधन का हिस्सा 40 फीसदी तक हो सकता है. इसलिए ईंधन महंगा होने पर एयरलाइंस उन रूट पर उड़ानें कम कर सकती हैं जहां कम कमाई होती है.
विमानों की कमी भी बड़ी वजह
एयरलाइंस के पास विमानों की कमी भी है. एयर इंडिया के चीफ कमर्शियल ऑफिसर निपुण अग्रवाल ने जुलाई में कहा था कि कंपनी ने जून से अगस्त के बीच अपनी कैपेसिटी करीब 15 फीसदी तक घटाई. इसकी वजह विमानों की कमी, नए विमानों की डिलीवरी में देरी और पुराने विमानों में सीट बदलने का काम बताया गया.
किन शहरों के यात्रियों पर ज्यादा असर?
देश के 10 बड़े एयरपोर्ट में सिर्फ दिल्ली और पुणे में सीटें बढ़ीं.
- सबसे ज्यादा गिरावट कोलकाता में 19 फीसदी रही.
- इसके बाद हैदराबाद में 14.7 फीसदी, अहमदाबाद में 13.5 फीसदी.
- चेन्नई में 13.4 फीसदी और गुवाहाटी में 12.1 फीसदी सीटें कम हुईं.
- कोच्चि में 10.2 फीसदी, बेंगलुरु में 8.3 फीसदी और मुंबई में 6.5 फीसदी की गिरावट रही.
- राज्यों में केरल पर सबसे ज्यादा असर पड़ा. यहां सीटें 26.2 फीसदी घट गईं.
- गोवा में 17.6 फीसदी, पश्चिम बंगाल में 16.8 फीसदी और तमिलनाडु में 12 फीसदी की गिरावट रही.
केरल के यात्रियों पर ज्यादा असर
केरल में घरेलू उड़ानें कम नहीं हुई हैं. मुंबई-कोच्चि और बेंगलुरु-कोच्चि जैसे रूट पर उड़ानें बढ़ी हैं, लेकिन खाड़ी देशों से जुड़ी उड़ानों में कटौती हुई है यानी हवाई रास्तों पर पाबंदी और महंगे ईंधन का असर खास तौर पर उन उड़ानों पर पड़ा है जो खाड़ी क्षेत्र से जुड़ी हैं.
कुछ बड़े रूट पर बढ़ीं सीटें
ऐसा नहीं है कि हर रूट पर उड़ानें कम हुई हैं.
- मुंबई-दिल्ली रूट पर सीटें 13.9 फीसदी बढ़कर 6 लाख 77 हजार हो गईं.
- बेंगलुरु-पुणे रूट पर सीटों में 26.8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.
- दिल्ली-पुणे और कोलकाता-दिल्ली रूट पर भी सीटें बढ़ी हैं.
- लेकिन मुंबई-हैदराबाद रूट पर सीटें 9.5 फीसदी और मुंबई-चेन्नई रूट पर 8.5 फीसदी घट गईं.
- हैदराबाद-तिरुपति रूट पर 1318 उड़ानें कम की गईं.
- यानी एयरलाइंस बड़े शहरों के बीच के रूट को ज्यादा प्राथमिकता दे रही हैं और छोटे रूट पर कटौती ज्यादा दिखाई दे रही है.
एयरलाइंस खुद भी दबाव में
एयर इंडिया में 25.1 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाली सिंगापुर एयरलाइंस की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक मार्च 2026 को खत्म हुए साल में एयर इंडिया ग्रुप को 26,700 करोड़ रुपये से ज्यादा का घाटा हुआ. इस दौरान ग्रुप की कमाई 79,150 करोड़ रुपये से ज्यादा रही.
सिंगापुर एयरलाइंस का अपना मुनाफा भी 57 फीसदी घटा. कंपनी ने इसकी एक वजह एयर इंडिया के घाटे को बताया. ICRA ने मार्च 2026 में भारतीय एविएशन सेक्टर का आउटलुक स्टेबल से घटाकर निगेटिव कर दिया था.
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अब सबसे बड़ा सवाल- क्या किराया और बढ़ेगा?
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि हर रूट पर किराया बढ़ेगा लेकिन सीटों में लगातार हो रही कटौती और यात्रियों की मांग को देखते हुए किराए पर दबाव बढ़ने की संभावना जरूर है. खासकर उन रूट पर जहां विकल्प पहले ही कम हो गए हैं.
अक्टूबर का आंकड़ा इसलिए अहम होगा क्योंकि त्योहारों का सीजन शुरू होगा और अक्टूबर के आखिर से विंटर शेड्यूल शुरू होगा. अगर उस समय भी सीटों की संख्या नहीं बढ़ी तो यात्रियों के लिए फ्लाइट के विकल्प कम रह सकते हैं. एयर इंडिया ने 1 सितंबर से अपनी 145 साप्ताहिक इंटरनेशनल उड़ानें फिर शुरू करने का ऐलान किया था. इसके बावजूद सितंबर में उसकी सीटें 8.8 फीसदी घटी हैं.
आगे तस्वीर अक्टूबर और नवंबर के आंकड़ों से ज्यादा साफ होगी. ATF की कीमत भी अहम रहेगी. अगर 1 अक्टूबर को ईंधन फिर महंगा हुआ तो एयरलाइंस की लागत और बढ़ सकती है. साथ ही ईरान समेत पश्चिम एशिया के हवाई रास्तों की स्थिति भी महत्वपूर्ण रहेगी.
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नोट-
OAG का आंकड़ा शेड्यूल की गई सीटों का है. इसका मतलब यह नहीं है कि इतनी संख्या में यात्रियों ने वास्तव में सफर किया. DGCA का आंकड़ा वास्तविक यात्रियों से जुड़ा है! इसलिए दोनों आंकड़ों को एक जैसा नहीं कह सकते!

