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नेपाल में शवों का ढेर, तिब्बत में ‘सब ठीक’? क्या बाढ़ का सच छिपा रहा चीन

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नेपाल और तिब्बत में आई विनाशकारी बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है. हालांकि, दोनों जगहों से सामने आ रही जानकारी में बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है. काठमांडू से लगातार मिल रही रिपोर्टों के कारण नेपाल में हुई तबाही की तस्वीर काफी साफ नजर आ रही है, जबकि चीन ने तिब्बत जैसे संवेदनशील क्षेत्र से सूचनाओं के प्रवाह पर कड़े नियंत्रण लगाए हुए हैं. इससे वहां की वास्तविक स्थिति को समझना और स्वतंत्र रूप से जानकारी की पुष्टि करना मुश्किल हो रहा है.

नेपाल में मृतकों का आंकड़ा 579, चीन में सिर्फ पांच

बाढ़ ने नेपाल की सीमा से लगे गांवों और तिब्बत के इलाकों में भारी तबाही मचाई है. द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, शुक्रवार को नेपाल में बाढ़ से मरने वालों की आधिकारिक संख्या बढ़कर 579 हो गई, जबकि चीन में यह आंकड़ा केवल पांच बताया गया.

यह अंतर इसलिए भी सवाल खड़ा करता है क्योंकि तिब्बत की ओर ग्यिरोंग सीमा चौकी के आसपास के गांवों में कई हजार लोग रहते हैं. ऐसे में चीन की ओर से सामने आए कम मृतक आंकड़े और क्षेत्र में हुई व्यापक तबाही के बीच अंतर को लेकर सवाल उठ रहे हैं.

नेपाल में पत्रकारों ने जुटाई विस्तृत जानकारी

नेपाल में पत्रकारों ने आपदा प्रभावित क्षेत्रों के जितना संभव हो सके उतना करीब जाकर बचे लोगों और बचावकर्मियों से बातचीत की. इसके जरिए बाढ़ के दौरान क्या हुआ, इसकी काफी विस्तृत तस्वीर सामने आई.

स्थानीय लोगों के बयानों के आधार पर घटनाक्रम की लगभग मिनट-दर-मिनट जानकारी सामने आई कि किस तरह बाढ़ का पानी घरों में घुसा और लोगों को अपनी चपेट में ले गया. हालांकि, बाढ़ की सटीक वजह का पता अभी नहीं चल पाया है और वैज्ञानिक इसकी वजहों का अध्ययन कर रहे हैं.

चीन की रिपोर्टिंग में राहत और बचाव पर ज्यादा जोर

द गार्जियन के मुताबिक, चीन के सरकारी मीडिया ने बाढ़ को लेकर कई प्रसारण किए और अपने पत्रकारों को भी प्रभावित क्षेत्र में भेजा. हालांकि, इन रिपोर्टों में मुख्य रूप से राहत और बचाव कार्यों पर ध्यान दिया गया, जबकि तबाही का वास्तविक पैमाना उतनी स्पष्टता से सामने नहीं आया.

रिपोर्ट में बताया गया कि तिब्बत के एक राहत केंद्र से प्रसारण कर रहे एक पत्रकार ने अपने पीछे बैठे लोगों में से किसी से भी बातचीत नहीं की.

तिब्बत में सूचनाओं पर लंबे समय से कड़े नियंत्रण

तिब्बत चीन के सबसे संवेदनशील और कड़े नियंत्रण वाले क्षेत्रों में से एक है. यहां पहले भी तिब्बतियों की ओर से अधिक स्वायत्तता और धार्मिक स्वतंत्रता की मांग को लेकर कई विरोध प्रदर्शन हुए हैं. इनमें आत्मदाह की घटनाएं भी शामिल रही हैं, जिन पर चीनी अधिकारियों ने कार्रवाई की है.

तिब्बत में अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों को आम तौर पर स्वतंत्र रूप से काम करने की अनुमति नहीं है. उन्हें वहां जाने की अनुमति मुख्य रूप से सरकार की ओर से आयोजित और नियंत्रित दौरों के तहत मिलती है.

स्थानीय लोगों और पत्रकारों के बीच संपर्क पर भी पाबंदियां

रिपोर्ट के अनुसार, कई तिब्बतियों को पासपोर्ट रखने की अनुमति नहीं होती और पत्रकारों से बातचीत करने पर उन्हें सजा का सामना करना पड़ सकता है.

लंदन स्थित SOAS यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के चाइना इंस्टीट्यूट के निदेशक स्टीव त्सांग ने द गार्जियन से कहा कि तिब्बत से जुड़ी हर चीज को राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से देखा जाता है.

उन्होंने कहा कि इसी वजह से वहां ऐसी कोई जानकारी या रिपोर्ट सामने आने की संभावना कम होती है, जिसे शीर्ष स्तर से मंजूरी न मिली हो.

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