जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से कथित तौर पर बिना हिसाब की नकदी मिलने के मामले में जांच अब संसद के पटल तक पहुंच गई है। जांच समिति की रिपोर्ट बुधवार, 12 अगस्त को लोकसभा में रखी जाएगी। यह वही मामला है जिसमें 14 मार्च 2025 की रात उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास में आग लगने के बाद स्टोर रूम से जली हुई नकदी मिलने का आरोप सामने आया था। जस्टिस वर्मा अब न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे चुके हैं, लेकिन उनकी जांच रिपोर्ट संसद में पेश की जा रही है।
लोकसभा की बुधवार की कार्यसूची के मुताबिक, सदन के महासचिव जांच रिपोर्ट के दो खंड और मौखिक साक्ष्य सदन के पटल पर रखेंगे। तीन सदस्यीय जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट मई में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दी थी। अब इसे कानूनी प्रक्रिया के तहत सदन में रखा जाएगा। यह कार्रवाई न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 के तहत जरूरी प्रक्रिया का हिस्सा है। रिपोर्ट के सदन में रखे जाने से जस्टिस वर्मा से जुड़े पूरे विवाद की संसदीय प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण सामने आएगा।
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आखिर जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास पर हुआ क्या था?
14 मार्च 2025 की रात जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में आग लग गई थी। आग बुझाने के लिए पहुंचे दमकलकर्मियों ने कथित तौर पर एक स्टोर रूम में बड़ी मात्रा में जली हुई करेंसी देखी थी। इसके बाद मामले ने गंभीर रूप ले लिया। उस समय जस्टिस वर्मा दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश थे। विवाद सामने आने के बाद उन्हें उनके मूल हाईकोर्ट यानी इलाहाबाद हाईकोर्ट वापस भेज दिया गया था। मामले की जांच के लिए पहले आंतरिक स्तर पर प्रक्रिया शुरू हुई।
आंतरिक जांच में जस्टिस वर्मा को लेकर क्या सामने आया था?
तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना की ओर से गठित आंतरिक समिति ने अपनी जांच में कहा था कि जस्टिस वर्मा का उस खास स्टोर रूम पर सक्रिय या मौन नियंत्रण था, जहां नकदी छिपी होने की बात सामने आई थी। इसके बाद मामला संसद में न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया तक पहुंच गया। जुलाई 2025 में 200 से ज्यादा सांसदों ने जस्टिस वर्मा को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की थी।
जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा क्यों दिया?
संसद से हटाए जाने की संभावना के बीच जस्टिस वर्मा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे के बाद संसद के जरिए उन्हें हटाने की कार्यवाही व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी हो गई। हालांकि, उनके इस्तीफे की सूचना अभी कानून मंत्रालय की ओर से अधिसूचित नहीं की गई है। इस वजह से मामले की संसदीय प्रक्रिया और इस्तीफे की औपचारिक स्थिति को लेकर अलग-अलग प्रक्रियाएं सामने हैं। बुधवार को जांच रिपोर्ट सदन में रखे जाने से मामले का दस्तावेजी रिकॉर्ड संसद के सामने आएगा।
क्या इस्तीफा देने के बाद भी न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया चल सकती है?
न्यायाधीशों की नियुक्ति और उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया से परिचित लोगों के मुताबिक, शीर्ष अदालत के एक फैसले के अनुसार कोई न्यायाधीश राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंपने और उसकी प्रति सार्वजनिक करने के बाद इस्तीफा दे चुका माना जाता है। ऐसे इस्तीफे को राष्ट्रपति की मंजूरी पर निर्भर नहीं माना जाता। हालांकि, प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति की ओर से औपचारिक स्वीकृति दी जाती है और इसके बाद कानून मंत्रालय के न्याय विभाग की ओर से इसकी अधिसूचना जारी की जाती है। जस्टिस वर्मा के मामले में यही औपचारिक प्रक्रिया अभी पूरी होनी बाकी बताई गई है।
आज रिपोर्ट सामने आने के बाद क्या होगा?
आज लोकसभा में रिपोर्ट के दो खंड और मौखिक साक्ष्य रखे जाने के बाद मामले से जुड़े आरोपों और जांच की जानकारी सदन के रिकॉर्ड का हिस्सा बन जाएगी। हालांकि, जस्टिस वर्मा के इस्तीफा देने के कारण उन्हें संसद के जरिए हटाने की कार्यवाही पहले ही निष्प्रभावी हो चुकी है। ऐसे में बुधवार की कार्रवाई का महत्व मुख्य रूप से जांच समिति की रिपोर्ट को सदन के सामने रखने को लेकर है। रिपोर्ट में जांच समिति के निष्कर्ष क्या हैं और उसमें किन तथ्यों का उल्लेख किया गया है, यह रिपोर्ट सदन में रखे जाने के बाद सामने आएगा।


