अफगानिस्तान में तालिबान शासन के पांच साल पूरे होने के बीच वहां की लड़कियों और महिलाओं की जिंदगी पर पाबंदियों की तस्वीर सामने आई है। पढ़ाई, नौकरी और आजादी के रास्ते बंद होने के बावजूद कई महिलाएं अपने सपनों को बचाने की कोशिश कर रही हैं। बल्ख की 23 वर्षीय सोफिया मालेक चोरी-छिपे ऑनलाइन कक्षाएं लेकर साहित्य पढ़ रही हैं और उपन्यास लिख रही हैं, जबकि हेरात की पूर्व महिला सैनिक पारस्तो को अपनी वर्दी तक छोड़नी पड़ी। इन महिलाओं की कहानियां बताती हैं कि पाबंदियों के बीच भी पढ़ने, लिखने और अपने पैरों पर खड़े होने की इच्छा खत्म नहीं हुई है।
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तालिबान के शासन में महिलाओं की जिंदगी कैसे बदल गई?
तालिबान के सत्ता में आने के बाद अफगानिस्तान में लड़कियों और महिलाओं के सामने कई तरह की पाबंदियां खड़ी हो गईं। पढ़ाई और काम के अवसर सीमित हुए तो उनके लिए सामान्य जीवन जीना भी मुश्किल हो गया। कई महिलाओं को अपने पुराने काम और पहचान से हाथ धोना पड़ा। हेरात की रहने वाली पारस्तो छह साल तक समर्पित सैनिक के तौर पर अफगानिस्तान की सेवा कर चुकी थीं। लेकिन तालिबान के सत्ता में आने के बाद उन्हें और उनकी महिला साथियों को बुलाकर वर्दी सौंपने के लिए कहा गया। उनके मुताबिक, वर्दी छिनने का एहसास ऐसा था जैसे उनसे जीने का अधिकार ही छीन लिया गया हो।
पूर्व महिला सैनिक पारस्तो आज किस डर में जी रहीं?
पारस्तो के मुताबिक, तालिबान के लोगों की ओर से उन्हें लगातार जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं। उनके पति को भी तालिबान के लोग बुलाकर पूछताछ करते हैं कि उन्होंने कितने तालिबानियों को मारा था। ऐसे माहौल में उनका रोज का जीवन डर में बीत रहा है। सुबह घर का काम पूरा करने के बाद वह काम की तलाश में निकलती हैं और फिर पति के सुरक्षित घर लौटने की चिंता करती हैं। उनके लिए पुरानी नौकरी और सैनिक की पहचान अब अतीत बन चुकी है।
सोफिया मालेक पढ़ने-लिखने का सपना कैसे बचा रहीं?
उत्तरी अफगानिस्तान की रहने वाली 23 वर्षीय सोफिया मालेक उन महिलाओं में हैं जो पाबंदियों के बावजूद अपने सपनों को छोड़ना नहीं चाहतीं। वह अंडरकवर पत्रकार के तौर पर लोगों से मिलती हैं, उनकी कहानियां दर्ज करती हैं और उन्हें दुनिया के सामने लाने की कोशिश करती हैं। इसके साथ ही वह चोरी-छिपे ऑनलाइन कक्षाएं ले रही हैं और साहित्य की समझ बढ़ा रही हैं। वह एक उपन्यास भी लिख रही हैं। उनके लिए पढ़ना, लिखना और सृजन करना ऐसा सपना है जिसे कोई तब तक नहीं छीन सकता, जब तक इंसान खुद उसे छोड़ न दे।
सोफिया को हर दस्तक से डर क्यों?
सोफिया के लिए अपने काम को जारी रखना आसान नहीं है। उनके मुताबिक, हर समय पकड़े जाने का डर बना रहता है। जब भी घर के दरवाजे पर कोई दस्तक देता है तो उनकी धड़कनें तेज हो जाती हैं। वह अपना लैपटॉप गद्दे के नीचे छिपा देती हैं। तालिबानी अधिकारी उनके घर की कई बार तलाशी भी ले चुके हैं। इसके बावजूद वह लोगों से मिलती हैं, उनकी कहानियां लिखती हैं और अपनी पढ़ाई जारी रखती हैं। कभी-कभी अपनी पसंद की किताब खरीदने के लिए बुकशॉप जाना भी उनकी नियमित दिनचर्या का हिस्सा बन गया है।
अफगानिस्तान छोड़ चुकी महिलाओं को पीछे छूटी सहेलियों की चिंता क्यों?
साल 2021 में काबुल छोड़कर अमेरिका पहुंचीं अफगान मूल की मुर्सल रहीम ने भी वहां की महिलाओं की स्थिति को लेकर अपनी पीड़ा साझा की है। उनका कहना है कि अमेरिका में शिक्षा, नौकरी और स्वतंत्रता का आनंद लेते हुए उन्हें अपनी उन सहेलियों की याद आती है, जो अब भी अफगानिस्तान में कैदियों जैसा जीवन जी रही हैं। अमेरिका में शरण मिलना उनके लिए राहत की बात रही, लेकिन उन्हें इस बात का अपराध-बोध भी रहता है कि वह किस्मत से बाहर निकल पाईं, जबकि उनकी कई साथी आज भी पाबंदियों के बीच जिंदगी गुजार रही हैं।
क्या पाबंदियों के बावजूद अफगान महिलाओं ने उम्मीद नहीं छोड़ी?
अफगानिस्तान की इन महिलाओं की कहानियां दिखाती हैं कि पाबंदियां उनके रास्ते को मुश्किल बना सकती हैं, लेकिन उनकी इच्छा को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाई हैं। कोई चोरी-छिपे पढ़ाई कर रही है, कोई अपनी कहानी दुनिया तक पहुंचाने की कोशिश कर रही है और कोई देश से बाहर निकलने के बाद भी वहां फंसी महिलाओं के लिए आवाज उठा रही है। मुर्सल रहीम ने अमेरिकी सरकार से भी अपील की है कि संकट में फंसी अफगान महिलाओं को भुलाया नहीं जाए। पांच साल के तालिबानी शासन के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर पढ़ने, काम करने और सपने देखने का अधिकार किसी से कब तक छीना जा सकता है।


