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CBSE Board Exam 2026 की कैसे करें सही तैयारी? EXPLAINED
हाइलाइट्स

- केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं की नई तारीख की घोषणा कर दी है, जो कि 7 फरवरी, 2026 से शुरू होने वाली है।
- वर्ष 2026 से बोर्ड परीक्षा प्रणाली में कई ऐसे बदलाव लागू किए गए हैं, जो देशभर के लाखों छात्रों और उनके अभिभावकों को सीधे प्रभावित करेंगे।
- यह बदलाव छात्रों पर से परीक्षा का दबाव कम करने, उनकी वास्तविक क्षमता को आंकने और उन्हें बेहतर विकल्प देने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल है।
वहीं, शिक्षा व्यवस्था को अधिक लचीला, निष्पक्ष और छात्र-केंद्रित बनाने की दिशा में सीबीएसई ने एक बड़ा कदम उठाया है। वर्ष 2026 से बोर्ड परीक्षा प्रणाली में कई ऐसे बदलाव लागू किए गए हैं, जो देशभर के लाखों छात्रों और उनके अभिभावकों को सीधे प्रभावित करेंगे। शिक्षा मंत्रालय की नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के अनुरूप यह बदलाव छात्रों पर से परीक्षा का दबाव कम करने, उनकी वास्तविक क्षमता को आंकने और उन्हें बेहतर विकल्प देने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल है। तो इस नए बदलाव के बारे में यहां विस्तार से समझते हैं-
सीबीएसई ने क्या बदलाव किये?
अब छात्र कक्षा 10 में दो बार बोर्ड परीक्षा देने का अवसर पा सकेंगे, उपस्थिति के लिए सख्त 75 फीसदी नियम लागू होगा, और आंतरिक मूल्यांकन यानी Internal Assessment को स्टूडेंट के रिजल्ट में अधिक महत्व दिया जाएगा। CBSE ने यह भी स्पष्ट किया है कि एग्जाम पैटर्न में बदलाव किए गए हैं, ताकि छात्रों की रटने की आदत के बजाय उनकी समझ और विश्लेषणात्मक क्षमता को परखा जा सके।
स्टूडेंड के लिए 75% उपस्थिति जरूरी
CBSE ने स्पष्ट किया है कि बोर्ड परीक्षा 2026 में बैठने के लिए छात्रों को कुछ निश्चित पात्रता शर्तें पूरी करनी होंगी। इनमें सबसे अहम है 75 फीसदी उपस्थिति जरूरी है। बोर्ड के अनुसार, किसी भी छात्र को परीक्षा में बैठने के लिए कम-से-कम 75 फीसदी उपस्थिति जरूरी है। इसका मतलब है कि अगर छात्र ने स्कूल में लगातार उपस्थिति नहीं दी, तो उसे बोर्ड परीक्षा के लिए पात्र नहीं माना जाएगा।
यह नियम शिक्षा में अनुशासन और नियमितता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लाया गया है। कई बार यह देखा गया है कि छात्र कोचिंग या अन्य गतिविधियों की वजह से क्लास से अनुपस्थित रहते हैं। इससे न सिर्फ उनके शैक्षणिक प्रदर्शन पर असर पड़ता है, बल्कि आंतरिक मूल्यांकन के अंक भी प्रभावित होते हैं। CBSE के अनुसार, यदि किसी छात्र की उपस्थिति 75 फीसदी से कम है, तो उसे सिर्फ चिकित्सा या असाधारण परिस्थिति में राहत दी जा सकती है, वह भी स्कूल और CBSE की अनुमति से।
स्टूडेंट की अपार आईडी अनिवार्य
इसके अलावा, छात्रों को विद्यालय द्वारा जारी लिस्ट ऑफ कैंडिडेट्स (LOC) में सही ढंग से दर्ज किया जाना अनिवार्य है। LOC में गलती या देरी की स्थिति में छात्र एग्जाम में सम्मिलित नहीं हो सकेगा। इस बार CBSE ने LOC प्रक्रिया को और सख्त बनाया है और प्रत्येक छात्र के लिए Automated Permanent Academic Account Registry (APAAR ID) अनिवार्य कर दी गई है, ताकि सभी विद्यार्थियों का शैक्षणिक डेटा केंद्रीकृत और पारदर्शी रूप से दर्ज हो सके।
आंतरिक मूल्यांकन की भूमिका: केवल परीक्षा नहीं, संपूर्ण मूल्यांकन
सीबीएसई की वेबसाइट पर उपलब्ध विज्ञप्ति के अनुसार, साल 2026 से CBSE का फोकस केवल साल के अंत में होने वाली परीक्षा पर नहीं, बल्कि पूरे साल चलने वाले मूल्यांकन पर रहेगा। इसका मतलब है कि आंतरिक मूल्यांकन, प्रोजेक्ट्स, प्रैक्टिकल और पीरियॉडिक टेस्ट्स को अब अधिक वजन दिया जाएगा।
CBSE ने स्पष्ट किया है कि स्कूलों को हर छात्र का निरंतर मूल्यांकन करना होगा और उसकी रिपोर्ट बोर्ड को समय पर भेजनी होगी। यदि कोई छात्र आतंरिक मूल्यांकन में शामिल नहीं होता है, तो उसका परिणाम अधूरा माना जाएगा। इस बदलाव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि छात्र पूरे सत्र में सीखने की प्रक्रिया में एक्टिव रहे।
साल में दो बार परीक्षा देने का अवसर
सबसे बड़ा बदलाव जो CBSE ने 2026 से लागू करने का फैसला किया है, वह है – 10वीं कक्षा के छात्रों के लिए दो बार बोर्ड परीक्षा देने का ऑपशन। अब छात्र साल में दो बार परीक्षा दे सकेंगे – पहली परीक्षा फरवरी में, और दूसरी मई में होगी।
CBSE के अनुसार, परीक्षा का प्रश्न-पत्र भी अब अधिक प्रतिस्पर्धात्मक आधारित होगा। ये अब केवल याद किए गए तथ्यों के बजाय छात्रों की समझ, विश्लेषण और निर्णय क्षमता को परखेगा। इसमें MCQs, केस-स्टडी आधारित प्रश्न और एप्लीकेशन-आधारित सवालों का अनुपात बढ़ाया गया है।
छात्रों और अभिभावकों के लिए तैयारी की रणनीति: ऐसे करें सही प्लानिंग
अब जब बोर्ड परीक्षा का प्रारूप और मूल्यांकन प्रणाली दोनों बदल रहे हैं, तो छात्रों के लिए पारंपरिक “रटकर याद करने” की रणनीति काम नहीं आएगी। उन्हें अपने पढ़ाई के तरीके में बदलाव लाना होगा।
सबसे पहले, छात्रों को यह समझना होगा कि परीक्षा अब सिर्फ कॉन्सेप्ट को समझने पर आधारित है। इसलिए हर विषय की बुनियादी अवधारणाओं को स्पष्ट रूप से समझना जरूरी है। मसलन, विज्ञान में केवल सूत्र याद करने के बजाय उनके प्रयोग और सिद्धांतों को समझना अधिक फायदेमंद होगा। दूसरा, छात्रों को स्कूल की कक्षाओं में नियमित रूप से उपस्थित रहना चाहिए, ताकि वे आंतरिक मूल्यांकन और प्रोजेक्ट्स में अच्छे अंक प्राप्त कर सकें। 75 फीसदी उपस्थिति नियम के तहत अनुपस्थिति उनके पूरे परिणाम को प्रभावित कर सकती है।
तीसरा, छात्रों को हर यूनिट टेस्ट या टर्म परीक्षा को गंभीरता से लेना होगा। ये छोटे-छोटे मूल्यांकन ही अंततः आंतरिक मूल्यांकन के अंक बनाते हैं। आखिरी में, फरवरी में पहली परीक्षा और मई में दूसरी परीक्षा होने के कारण उन्हें वार्षिक अध्ययन की दो-स्तरीय रणनीति बनानी होगी – पहले सत्र में पूरे सिलेबस का कवरेज और रिवीजन, और दूसरे सत्र में कमजोर विषयों पर फोकस।
वहीं, अभिभावकों की भूमिका अब और भी महत्वपूर्ण हो गई है। नई प्रणाली में छात्र को लगातार अध्ययन के प्रति अनुशासित रहना होगा, और इसमें माता-पिता का सहयोग निर्णायक साबित हो सकता है। अभिभावकों को अपने बच्चों की उपस्थिति और स्कूल रिकॉर्ड पर नजर रखनी होगी। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चा आंतरिक मूल्यांकन और प्रोजेक्ट कार्य समय पर पूरा करे। परीक्षा के दोनों अवसरों के बीच बच्चे पर अतिरिक्त दबाव न डालें। पहली परीक्षा में यदि प्रदर्शन कमजोर हो, तो इसे सुधार का मौका समझें, न कि असफलता का संकेत।
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