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क्यों मंदिर से बाहर निकलते समय पीठ भगवान की तरफ नहीं की जाती है? जानिए इसके पीछे की मान्यता

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Do You Know: जब भी हम सभी मंदिर जाते हैं, तो भगवान के सामने अपने हाथ जोड़कर और आंखें बंद करके प्रार्थना करते हैं. लेकिन जब हम वापस उस गर्भगृह से बाहर निकलते हैं, तो क्या आपने कभी एक बात नोटिस की है? जब भी लोग मंदिर में भगवान के दर्शन करके बाहर की तरफ निकलते हैं, तो वे कभी भी अपनी पीठ भगवान की तरफ नहीं करते हैं. वे हमेशा उल्टे कदमों से यानी कि पीछे की तरफ चलते हुए बाहर निकलते हैं. बचपन से ही हम अपने माता-पिता या फिर दादा-दादी को ऐसा ही करते हुए देख रहे हैं, लेकिन इसके पीछे की असली वजह हमें आज भी मालूम नहीं है. अगर आपके दिमाग में भी हर बार यही सवाल आता है कि आखिर हम ऐसा करते क्यों हैं? तो आज का यह आर्टिकल आपके लिए ही है. आज हम आपको बेहद ही आसान शब्दों में यह समझाने वाले हैं कि मंदिर से बाहर निकलते समय ऐसा क्यों किया जाता है और इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह क्या है? तो चलिए जानते हैं विस्तार से.

भगवान के प्रति आदर और सम्मान

भगवान की तरफ पीठ नहीं करके बाहर निकलने का सबसे पहला और बड़ा कारण है उनका सम्मान करना. हमारे सनातन धर्म में भगवान को इस पूरी दुनिया को चलाने वाला और सबसे बड़ी ताकत माना गया है. आप अगर चाहें तो इसे इस तरह से समझ सकते हैं, जैसे हमारे घर में आए किसी बड़े-बुजुर्ग, गुरु या फिर किसी खास मेहमान के सामने से जाते समय हम अचानक से अपनी पीठ उन्हें दिखाकर भागते नहीं हैं, ठीक इसी तरह भगवान के सामने से भी पीठ दिखाकर हटना सही नहीं माना जाता है. ऐसा माना जाता है कि अगर आप भगवान की तरफ पीठ करके बाहर निकलते हैं, तो यह उनका अनादर करने जैसा है. इसलिए, जब तक हम मंदिर के मुख्य हिस्से से बाहर नहीं आ जाते, तब तक हमारा चेहरा भगवान की तरफ ही होना चाहिए.

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पॉजिटिव एनर्जी को अपने अंदर समेटना

पुरानी मान्यताओं के अनुसार, मंदिर का वह हिस्सा जहां पर भगवान की मूर्ती रखी हुई होती है, वहां पर बहुत ही अच्छी और पॉजिटिव एनर्जी मौजूद होती है. ऐसे में जब हम उनके सामने खड़े होकर उनसे प्रार्थना करते हैं, तो यही अच्छी और पॉजिटिव एनर्जी हमारे अंदर एक अलग तरह की शक्ति और शांति लेकर आती है. अगर हम भगवान के दर्शन करने के तुरंत बाद अपनी पीठ उनकी तरफ कर लेते हैं, तो माना जाता है कि हम इस अच्छी एनर्जी को खुद से दूर कर रहे हैं. उल्टे कदमों से पीछे हटने का मतलब है कि हम भगवान से मिले उस आशीर्वाद और अच्छी एनर्जी को अपने साथ समेटकर, उन्हें शुक्रिया कहते हुए बाहर आ रहे हैं.

अपने अंदर के घमंड को कम करना

जब हम भगवान के सामने होते हैं, तो हमारा पूरा जो ध्यान होना चाहिए वह पूरी तरह से उनके चरणों में होना चाहिए. भगवान के सामने सीधे पीठ को मोड़कर चल देना इंसान के अंदर के घमंड को दिखाने का काम करता है. यह ठीक उसी तरह है कि जैसे कि ‘मेरा काम तो हो गया, अब मैं यहां से जा रहा हूं. लेकिन इसके ठीक विपरीत, जब हम धीरे-धीरे उल्टे कदमों से पीछे हटते हैं, तो यह दिखाता है कि हम भगवान के सामने कितने विनम्र हैं. यह छोटा सा तरीका हमें हर बार यह याद दिलाता है कि भगवान के सामने हम बहुत ही छोटे हैं और आज हमारे पास जो कुछ भी है, सब उन्हीं की कृपा से है.

अपने ध्यान को भटकने से बचाना

अक्सर ऐसा होता है कि जैसे ही हम मंदिर से बाहर की तरफ मुड़ते हैं, हमारा ध्यान तुरंत दुनिया भर की बातों, बाहर रखे अपने जूतों-चप्पलों या बाहर के शोर-शराबे पर चला जाता है. भगवान की तरफ मुंह रखकर पीछे हटने से हमारा ध्यान आखिरी पल तक भगवान की मूर्ति पर ही टिका रहता है. इससे मंदिर में मिली मन की शांति लंबे समय तक हमारे साथ रहती है और हमारा ध्यान यहां-वहां नहीं भटकता.

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