2026 में देश की महंगाई दर 3.48% पर पहुंच गई, जो पिछले 13 महीनों का हाईएस्ट लेवल है. 2026-27 के पूरे वित्त वर्ष के लिए रिजर्व बैंक ने औसत 4.6% महंगाई रहने का अनुमान जताया है. तीसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में इसके 5.2% तक पहुंचने की आशंका जताई गई है. लेकिन असली सवाल यह है कि देश पर महंगाई का सबसे बुरा असर कब पड़ा है? हमने 1947 के बाद के उन सबसे कठिन दौरों को समझने की कोशिश की है, जब कीमतों ने लोगों की जिंदगी को बेहद मुश्किल बना दिया था. हम बात करेंगे उन 6 सबसे बुरे समय की, जब हर तरफ चीजों के दामों ने आग लगा रखी थी…
1. 1973-74: तेल का झटका और 20% पार करती महंगाई
नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च की रिपोर्ट (NBER) के मुताबिक, ये वो दौर था जब भारत ने आजादी के बाद पहली बार महंगाई को 20% के पार जाते देखा. इसकी सबसे बड़ी वजह 1973 का वैश्विक तेल संकट था.अरब देशों के तेल प्रतिबंध के चलते एक साल के अंदर कच्चे तेल की कीमतें चार गुना तक बढ़ गईं, जिससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था हिल गई. भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल आयात करता था, ये एक बुरे सपने जैसा था. साथ ही 1972 और 1974 के सूखे ने फसलों को बर्बाद कर दिया. देश में भयंकर खाद्य संकट पैदा हो गया. गेहूं, चीनी, खाने का तेल हर चीज के दाम आसमान पर थे.
- हालात कितने खराब थे: उस साल थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पर आधारित महंगाई दर 25.2% के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थी. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि दिसंबर 1973 के अंत तक कीमतें पिछले साल के मुकाबले 26% ज्यादा थीं. हालात इतने खराब थे कि 1973 के बजट को ‘ब्लैक बजट’ कहा गया.
- नतीजा: जनता पर इसका सीधा असर पड़ा. विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव आया और 1973-74 में 437.7 करोड़ रुपये की कमी दर्ज की गई, जबकि एक साल पहले ही 100.3 करोड़ का सरप्लस था.
2. 1979-80: ईरान की क्रांति और दूसरा तेल का तूफान
अभी देश 1973 के झटके से पूरी तरह उबरा भी नहीं था कि 1979 में दूसरा तेल संकट आ गया. इंडिया बजट की रिपोर्ट ‘द इकोनॉमिक सिचुएशन इन 1979-80’ के मुताबिक, इस बार वजह थी ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति, जिसके चलते वहां तेल का उत्पादन ठप हो गया. बाद में ईरान-इराक युद्ध ने आग में घी का काम किया. तेल की ग्लोबल सप्लाई केवल 4% घटी, लेकिन बाजार में घबराहट इतनी थी कि कच्चे तेल की कीमत अगले 12 महीनों में दोगुनी से भी ज्यादा हो गई. देश के कई हिस्सों में भीषण सूखा भी पड़ गया.
- हालात कितने खराब थे: हालांकि 1974 के 28.6% के मुकाबले 1979 में उपभोक्ता महंगाई दर 6.28% थी, लेकिन 1980 में यह उछलकर 11.35% पर पहुंच गई. 1979-80 की पहली छमाही में कीमतों में जो तेजी आई, वो बेहद तेज थी और जुलाई में ही कीमतें 4.6% बढ़ गई थीं.
- नतीजा: इस संकट ने भारत की आर्थिक नीतियों का पूरा नक्शा ही बदल दिया, जिससे देश की तेल पर निर्भरता कम करने की कोशिशें तेज हुईं.
3. 1991: दिवालिया होने की कगार पर
टेक्निक्स इंटरनेशनल जर्नल फॉर इंजीनियरिंग रिसर्च (TIJER) के मुताबिक, 1991 का साल भारत के आर्थिक इतिहास का सबसे बड़ा संकट लेकर आया. दरअसल, 1985 से ही देश भुगतान संतुलन की समस्या से जूझ रहा था. फिर खाड़ी युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ने, सोवियत संघ के विघटन से व्यापार प्रभावित होने और राजनीतिक अस्थिरता ने मिलकर हालात बदतर कर दिए.
- हालात कितने खराब थे: महंगाई की दर लगभग 13.6% पर पहुंच गई थी. लेकिन असली संकट विदेशी मुद्रा भंडार का था, जो घटकर मुश्किल से तीन हफ्ते के आयात के बराबर रह गया था. देश दिवालिया होने की कगार पर खड़ा था.
- नतीजा: सरकार को IMF से कर्ज लेने के लिए अपना 47 टन सोना तक गिरवी रखना पड़ा. इस संकट ने भारत को अपनी अर्थव्यवस्था खोलने और 1991 के ऐतिहासिक आर्थिक सुधारों (LPG reforms) के लिए मजबूर कर दिया.
4. 1998-2000: प्याज और सियासत
वर्ल्ड बैंक ब्लॉग्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौर की महंगाई आम आदमी की रसोई तक सिमट कर रह गई थी और इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसने सरकारें गिरा दीं. दरअसल 1998 में प्याज की फसल बुरी तरह खराब हुई, जिससे इसकी कीमतें आसमान छूने लगीं. दिल्ली में तो हालात इतने खराब थे कि चुनाव में बीजेपी को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी.
- हालात कितने खराब थे: प्याज और सरसों के तेल में मिलावट से फैली ड्रॉप्सी बीमारी ने आग में घी का काम किया. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के आंकड़े बताते हैं कि 1998-99 में महंगाई में तेज उछाल आया और नवंबर 1998 में तो यह सालाना 19.7% के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई.
- नतीजा: इस ‘प्याज पॉलिटिक्स’ ने 1998 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी की सरकार गिरा दी और कांग्रेस की शीला दीक्षित के नेतृत्व में सरकार बनी. यह सबक था कि महंगाई सिर्फ अर्थशास्त्र नहीं, बल्कि सियासत का सबसे बड़ा मुद्दा है.
5. 2009-2013: दोहरे अंक की महंगाई का लंबा दौर
कैपिटल माइंड की रिपोर्ट ‘द हिस्ट्री ऑफ इन्फ्लेशन इन इंडिया’ के मुताबिक, ये वो पांच साल थे जब लगातार ऊंची महंगाई ने आम आदमी की जेब पर डाका डाला. 2008 की वैश्विक मंदी के बाद दुनिया भर की सरकारों ने अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए जमकर खर्च किया. इसका नतीजा कमोडिटी की कीमतों में जबरदस्त उछाल के रूप में सामने आया. भारत में भी खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं. इसके अलावा 2009 में बहुत कम बारिश हुई, जिसके चलते उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ. फिर 2010 में बहुत ज्यादा बारिश और बाढ़ ने फसलों को और बर्बाद कर दिया.
- हालात कितने खराब थे: 2009-10 से 2013-14 के बीच भारत ने लंबे समय तक ऊंची महंगाई झेली. इस दौरान औसत वार्षिक दर दोहरे अंक में रही. जनवरी 2013 में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 10.79% हो गई थी, जिसमें खाद्य एवं पेय पदार्थों की दर 13.36% थी.
- नतीजा: इस लगातार महंगाई ने देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्से को और हवा दी और 2011 का अन्ना आंदोलन इसका सबसे बड़ा सबूत बना.
6. 2020-2022: कोरोना, जंग और सप्लाई चेन की तबाही
इंडिया बजट की रिपोर्ट के मुताबिक, यह सबसे ताजा दौर है, जब कोरोना महामारी के बाद जैसे-तैसे उबर रही दुनिया को एक और बड़ा झटका लगा. 2020 में कोरोना महामारी के कारण लगे लॉकडाउन से दुनिया भर की सप्लाई चेन बर्बाद हो गई. इसके बाद 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध छिड़ गया, जिसने खाद्य तेलों और ईंधन की कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया.
- हालात कितने खराब थे: महामारी के दौरान ही 2020 में उपभोक्ता महंगाई दर 6.6% पर पहुंच गई थी. इसके बाद युद्ध के कारण थोक महंगाई दर (WPI) ने तो मानो सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए और मई 2022 में यह 16.63% के हाईएस्ट लेवल पर पहुंच गई.
- नतीजा: RBI को महंगाई पर काबू पाने के लिए रेपो रेट में लगातार बढ़ोतरी करनी पड़ी, जिससे आम आदमी की EMI बढ़ गई और अर्थव्यवस्था की रफ्तार पर ब्रेक लगा.


