संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पर्वतनेनी हरीश ने कहा कि केवल दो साल के कार्यकाल वाली अस्थायी सदस्यता श्रेणी के विस्तार को ही सहमति का संकेत मानना पूरी तस्वीर का केवल एक हिस्सा है। उन्होंने कहा कि देश और समूह इस विस्तार के साथ कई शर्तें और जुड़े हुए मुद्दे भी जोड़ते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि अगर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में सुधार केवल अस्थायी सदस्य देशों की संख्या बढ़ाने तक सीमित रह गया, तो यह सुधार अधूरा और लगभग असफल माना जाएगा, क्योंकि इससे यूएनएसी की असली निर्णय लेने वाली शक्ति संरचना (यानी स्थायी पांच देशों का नियंत्रण) नहीं बदलेगी। उन्होंने कहा कि देश और समूह बहुत लंबे समय से वास्तविक और सार्थक सुधारों का इंतजार कर रहे हैं।
भारत ने वार्ता प्रक्रिया पर क्या कहा?
राजदूत पर्वतनेनी हरीश ने कहा कि अंतर सरकारी वार्ता प्रक्रिया को संयुक्त राष्ट्र की अन्य प्रक्रियाओं से अलग नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि इन सभी वार्ताओं का आधार एक लिखित प्रस्ताव होना चाहिए, जिस पर सभी समूह और सदस्य देश अपनी राय देते हैं।
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हरीश ने आगे कहा, इसलिए सह-अध्यक्षों को चाहिए कि वे एक स्पष्ट लिखित प्रस्ताव तैयार करने में नेतृत्व करें। इस प्रस्ताव में स्पष्ट लक्ष्य, चरण और समय सीमा तय होनी चाहिए, ताकि सभी देश और समूह व्यवस्थित और परिणाम देने वाली बातचीत कर सकें। इसके बाद जरूरत पड़ने पर कोई बीच का रास्ता भी निकाला जा सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत को उम्मीद है कि सह-अध्यक्ष भारत के विचारों को ध्यान में रखेंगे और मौजूदा दस्तावेज में सुधार करेंगे, ताकि वह अधिक संतुलित और वस्तुनिष्ठ बन सके। भारत ने यह भी दोहराया कि वह उन सभी गंभीर प्रयासों का समर्थन करता रहेगा, जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वास्तविक सुधार लाने के लिए किए जा रहे हैं।
‘स्थायी सदस्यता की परिभाषा को बदलने की जरूरत नहीं’
हरीश ने कहा कि चर्चा के मुख्य बिंदुओं वाला दस्तावेज (एलिमेंट्स पेपर) में स्थायी सदस्यता की अवधारणा पर आगे चर्चा और स्पष्टीकरण की बात कही गई है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र चार्टर इस मामले में पहले से ही बिल्कुल स्पष्ट है। इसमें किसी तरह की उलझन की जरूरत नहीं है।
उन्होंने कहा, चार्टर के अनुच्छेद 23 के अनुसार सुरक्षा परिषद के सदस्य दो प्रकार के होते हैं-स्थायी और अस्थायी। इसलिए स्थायी सीट की परिभाषा को और समझाने या बदलने की जरूरत नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि अफ्रीकी समूह, जी4 और एल69 जैसे कई देश और समूह स्थायी सदस्यता को चार्टर के नियमों के अनुसार ही मानते हैं।
अफ्रीकी प्रतिनिधित्व पर क्या कहा?
उन्होंने आगे कहा कि क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के मामले में अफ्रीकी देशों के बेहतर प्रतिनिधित्व के व्यापक समर्थन का सही तरीके से जिक्र नहीं किया गया है। जिस बैठक में अफ्रीकी मॉडल पर चर्चा हुई थी, उसमें कई देशों ने इसका समर्थन किया था। लेकिन इसे ठीक से नहीं दिखाया गया।
उन्होंने यह भी कहा कि पहले जहां स्थायी सीटों के विस्तार के पक्ष में अधिकतर देशों का समर्थन बताया जाता था, उसे अब घटाकर केवल ‘कुछ देशों का समर्थन’ कहा गया है, जो सही तस्वीर नहीं दिखाता। अधिकतर देश स्थायी सीटों के विस्तार के पक्ष में हैं। लेकिन इसे दस्तावेज में ठीक तरह से नहीं दिखाया गया है।
