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शार्क टैंक से Pm मोदी तक:दृष्टिबाधित किशोर प्रथमेश सिन्हा दूसरों के लिए बने प्रेरणा, घर को ही बना लिया स्कूल – Prathamesh Sinha Shark Tank To Pm Modi Inspiration For Others Know Challenges And Bravery

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साल 2012। जगह पुणे। एक 16 महीने के बच्चे के सामने जिंदगी की ऐसी चुनौती आई, जिसने उसके परिवार की दिनचर्या बदल दी। डॉक्टरों ने बताया कि उसे क्रेनियोफैरिंजियोमा नाम का ब्रेन ट्यूमर है। ट्यूमर ऑप्टिक काइज्म जैसी नाजुक जगह पर था, जहां दोनों आंखों की नसें मिलती हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, आंखों की रोशनी वापस आने की संभावना बहुत कम थी। इसके बाद अस्पताल के चक्कर, जांच और इलाज परिवार की जिंदगी का हिस्सा बन गए। जिस उम्र में बच्चे आसपास की दुनिया को देखना और समझना शुरू करते हैं, उस उम्र में यह बच्चा बीमारी और इलाज के बीच बड़ा हो रहा था। चुनौतियां लगातार आती रहीं, लेकिन परिवार ने इलाज जारी रखा और हर स्थिति का सामना धैर्य से किया। यही लगातार संघर्ष आगे चलकर उसकी पहचान बना। आज वही बच्चा एक मशहूर मोटिवेशनल स्पीकर, दृष्टिबाधित बच्चों के लिए आवाज उठाने वाला युवा और राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता के रूप में पहचान बना चुका है। नाम है-प्रथमेश सिन्हा।

प्रथमेश की कहानी बताती है कि मुश्किल परिस्थितियां रास्ता रोक सकती हैं, लेकिन हौसला और निरंतर प्रयास आगे बढ़ने की राह भी बना सकते हैं। इसी वजह से प्रथमेश सिर्फ एक संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि दूसरों के लिए प्रेरणा हैं।

घर ही बन गया स्कूल

प्रथमेश का जन्म 2011 में पुणे में हुआ। एक साल की उम्र के बाद उनकी आंखों की रोशनी चली गई और स्कूल में दाखिले की चुनौती सामने आई। कई स्कूलों ने उन्हें प्रवेश नहीं दिया, इसलिए माता-पिता ने घर पर ही उनकी पढ़ाई शुरू कराई। होम स्कूलिंग के दौरान उन्होंने पढ़ाई के साथ कई कौशल सीखे और उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया। परिवार ने उन्हें परिस्थितियों से हारने के बजाय अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ना और हर मुश्किल का सामना करना सिखाया।

जब दोबारा लौटा ट्यूमर

2019 में प्रथमेश का ब्रेन ट्यूमर फिर से उसी जगह डिटेक्ट हुआ और उनका इलाज दोबारा शुरू हुआ। लेकिन इस बार वह सिर्फ मरीज बनकर अस्पताल नहीं गए थे। इलाज के दौरान वह डॉक्टरों और दूसरे मरीजों से बातचीत करते और सभी का हौसला बढ़ाते थे। उनका आत्मविश्वास देखकर डॉक्टर भी दूसरे मरीजों को प्रथमेश का उदाहरण देते थे। प्रथमेश उन्हें समझाते कि मुश्किल समय भी गुजर जाएगा और हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। धीरे-धीरे उनका यही हौसला और सकारात्मक सोच उनकी पहचान बन गई। इसके बाद उन्हें अलग-अलग मोटिवेशनल कैंपेनों में मोटिवेशनल स्पीकर के तौर पर लोगों को प्रेरित करने का मौका मिला।

ब्रेल से नई राह

आगे चलकर प्रथमेश को पुणे स्थित एक स्कूल में दाखिला मिला। यहां उन्हें पहली बार ब्रेल लिपि सीखने का अवसर मिला। इसी बीच कोरोना महामारी आ गई। स्कूल बंद हुए और पढ़ाई का तरीका बदल गया। ऐसे समय में दृष्टिबाधित बच्चों के सामने सीखने की नई चुनौती खड़ी हुई। इसी दौरान एक स्व-शिक्षण ब्रेल उपकरण आया। इसका उद्देश्य यह था कि दिव्यांगता किसी बच्चे को सीखने से न रोक सके और वह तकनीक की मदद से ब्रेल सीख सके। प्रथमेश इस ब्रेल उपकरण के सिर्फ उपयोगकर्ता बनकर नहीं रहे। उन्होंने इसकी उपयोगिता को समझा और इसे दूसरे लोगों तक पहुंचाने में भी भूमिका निभाई। कम उम्र में ही वह उस ब्रेल उपकरण के ब्रांड एंबेसडर बने और इसकी उपयोगिता के बारे में लोगों को बताने लगे।

शार्क टैंक से पीएम मोदी तक

ब्रेल टूल के साथ प्रथमेश की यात्रा उन्हें शार्क टैंक इंडिया जैसे बड़े मंच तक ले गई, जहां उन्होंने कंपनी के को-फाउंडर्स के साथ टूल का प्रदर्शन किया। जुलाई 2022 में डिजिटल इंडिया सप्ताह के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर उन्हें ब्रेल टूल दिखाया। प्रधानमंत्री ने भी उनके आत्मविश्वास की सराहना की। उनके संघर्ष और सामाजिक योगदान को 2024 में राष्ट्रीय पहचान मिली, जब उन्हें ‘श्रेष्ठ दिव्यांग बाल/बालिका’ श्रेणी में व्यक्तिगत उत्कृष्टता के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

युवाओं को सीख


  • परिस्थितियां आपकी पहचान तय नहीं करतीं।

  • कमी को कमजोरी नहीं, ताकत बनाया जा सकता है।

  • सच्ची सफलता दूसरों को आगे बढ़ने की हिम्मत देने में है।

  • रोशनी सिर्फ आंखों में नहीं, हौसले में भी होती है।

  • आंखों का अंधेरा इन्सान की राह नहीं रोक सकता, अगर उसके भीतर आगे बढ़ने की रोशनी जिंदा हो।

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