झारखंड की झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) सरकार की ओर से तदाशा मिश्रा को सेवानिवृत्ति से महज एक दिन पहले राज्य का डीजीपी नियुक्त किए जाने को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सीधा उल्लंघन बताया गया है।
शीर्ष अदालत को सौंपे गए एक नोट में कहा गया है कि यह नियुक्ति उस नियम के खिलाफ है, जिसमें पदभार ग्रहण करते समय अधिकारी के पास कम से कम छह महीने का सेवाकाल शेष होना अनिवार्य है। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ की सहायता कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता एवं एमिकस क्यूरी राजू रामचंद्रन ने यह नोट दाखिल किया है। उन्होंने कहा है कि मौजूदा डीजीपी की सेवानिवृत्ति से एक दिन पहले नियुक्ति प्रकाश सिंह मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसलों और आदेशों में निर्धारित सिद्धांतों का पूरी तरह से उल्लंघन है। हेमंत सोरेन सरकार ने 1994 बैच की आईपीएस अधिकारी तदाशा मिश्रा को 30 दिसंबर, 2025 को डीजीपी नियुक्त किया था, जबकि 31 दिसंबर को वह सेवानिवृत्त हो रही थीं। सेवानिवृत्ति से 24 घंटे पहले नियुक्ति पाकर उन्हें प्रभावी रूप से दो साल का सेवा विस्तार मिल गया।
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मरांडी ने दायर की थी याचिका
यह मामला झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। मरांडी ने राज्य सरकार के संशोधित नियमों को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के विरुद्ध घोषित करने की मांग की थी। एमिकस क्यूरी ने झारखंड डीजीपी चयन एवं नियुक्ति नियमावली, 2025 की जांच के बाद कहा कि हालांकि इसके कई प्रावधान कोर्ट की मूल भावना के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप और मनमानी रोकने के लिए सुरक्षा उपायों और स्पष्टीकरण की जरूरत है।
क्या था प्रकाश सिंह मामले में फैसला
बता दें कि 2006 के प्रकाश सिंह फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि डीजीपी का चयन यूपीएससी की ओर से चुने गए तीन वरिष्ठतम अधिकारियों में से होगा। साथ ही, सेवानिवृत्ति की तारीख की परवाह किए बिना अधिकारी का न्यूनतम कार्यकाल दो साल का होना चाहिए, लेकिन इसके लिए अधिकारी के पास छह माह की सेवा बची होनी चाहिए।

