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यौन अपराध:सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के फैसले पर जताई नाराजगी, न्यायिक संवेदनशीलता पर कही यह बात – Supreme Court Directs Nationwide Judicial Sensitivity Guidelines, Pulls Up Patna High Court Over Controversial

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देश की सर्वोच्च अदालत ने यौन अपराधों के मामलों में संवेदनशीलता को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण नीतिगत और प्रशासनिक निर्देश जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के उस हालिया आदेश पर गहरी नाराजगी जताई है जिसमें महिला के साथ जबरदस्ती करने के कृत्य को ‘दुष्कर्म के प्रयास’ की श्रेणी में मानने से इनकार कर दिया गया था। इस मामले को बेहद गंभीरता से लेते हुए देश के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया है कि अदालतों और पुलिस प्रशासन को यौन अपराधों से जुड़े मामलों को दर्ज करने और सुनवाई करने के लिए तय संवेदनशीलता मार्गदर्शिका (हैंडबुक) का सख्ती से पालन करना होगा। 

सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के किस फैसले पर कड़ा रुख अपनाया है?

पटना हाईकोर्ट ने हाल ही में अपने एक फैसले में कहा था कि महिला के वस्त्र उतारना और उसकी छाती पर हाथ रखना ‘दुष्कर्म की कोशिश’ को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। हाईकोर्ट के जस्टिस पूर्णेन्दु सिंह ने आरोपी की सजा को दुष्कर्म के प्रयास की गंभीर धारा से घटाकर केवल महिला की मर्यादा भंग करने (आईपीसी की धारा 354) के तहत कर दिया था, जिसमें काफी कम सजा का प्रावधान है। जब वरिष्ठ वकील शोभा गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि ऐसी विसंगतियां लगातार सामने आ रही हैं, तो इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रवैया अख्तियार किया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि जजों का भी यह कर्तव्य है कि वे कानून और पूर्व के फैसलों पर खुद शोध करें। उन्होंने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि इस मामले में न्यायिक स्टाफ कुछ नहीं कर रहा है।

यह पूरा मामला क्या था और हाई कोर्ट ने क्या दलील दी थी?

यह पूरा विवाद साल 2008 की एक घटना से जुड़ा हुआ है। अमरपुर में एक महिला अपने पिता के साथ एक फोटो स्टूडियो में गई थी। आरोप के अनुसार, स्टूडियो मालिक ने उसके पिता को बाहर रुकने के बहाने दरवाजा बंद कर लिया और अंदर महिला के साथ यौन उत्पीड़न का प्रयास किया। निचली अदालत ने आरोपी को दुष्कर्म के प्रयास और गलत तरीके से बंधक बनाने का दोषी पाया था, जिसे उसने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चूंकि रिकॉर्ड पर प्रवेश (पेनेट्रेशन) का कोई सबूत या मेडिकल साक्ष्य नहीं मिला है, इसलिए दुष्कर्म के प्रयास की धाराएं लागू नहीं होतीं। अदालत ने माना था कि यह मामला केवल आईपीसी की धारा 354 के तहत महिला की मर्यादा को ठेस पहुंचाने का बनता है क्योंकि आरोपी ने आपराधिक बल का प्रयोग किया था।

अदालतों और पुलिस प्रशासन के लिए सुप्रीम कोर्ट के नए निर्देश क्या हैं?

इस विसंगति को दूर करने और भविष्य में ऐसे फैसलों को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने देश के संपूर्ण न्यायिक और प्रशासनिक तंत्र के लिए कड़े निर्देश जारी किए हैं:


  • हैंडबुक का पालन अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि देश की सभी अदालतें यौन अपराधों से संबंधित मामलों में तय हैंडबुक में दी गई शब्दावली और निर्देशों का अनिवार्य रूप से पालन करेंगी।

  • पुलिस स्टेशनों को निर्देश: सभी राज्यों को आदेश दिया गया है कि वे अपने पुलिस थानों को निर्देश जारी करें कि एफआईआर दर्ज करते समय और चार्जशीट दाखिल करते समय इस हैंडबुक के नियमों का कड़ाई से पालन किया जाए।

  • नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी की रिपोर्ट: सर्वोच्च न्यायालय ने ‘नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी’ (एनजीए) की न्यायिक संवेदनशीलता पर तैयार की गई रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट और सभी राज्यों के हाईकोर्ट की वेबसाइटों पर ऑनलाइन अपलोड करने का निर्देश दिया है ताकि न्यायिक अधिकारियों को जागरूक किया जा सके। यह रिपोर्ट पूर्व में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा 2025 में दिए गए ऐसे ही एक आदेश के बाद स्वतः संज्ञान (suo motu) लेते हुए तैयार की गई थी।

क्या है इस फैसले का निष्कर्ष?

सुप्रीम कोर्ट की इस सख्त कार्रवाई ने यह साफ कर दिया है कि यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक और पुलिस संवेदनशीलता को लेकर किसी भी प्रकार की कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह दिशा-निर्देश देश भर की अदालतों में महिलाओं से जुड़े संवेदनशील मामलों की सुनवाई और पुलिस जांच के तौर-तरीकों में बड़ा सुधार लाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होंगे।

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