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मानसिक बीमारियों से जूझ रहे भारत के 5.4 करोड़ युवा:करोड़ों युवाओं की पढ़ाई, नौकरी और भविष्य पर खतरे की घंटी – Youth-mental-health-india-southeast-asia-report-anxiety-depression-millions-indian-youth-with-mental-illnesses

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युवाओं में मानसिक बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। भारत में करीब 5.4 करोड़ और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में 2.8 करोड़ से ज्यादा युवा किसी न किसी मानसिक समस्या से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इस ओर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में इसका असर न सिर्फ युवाओं के स्वास्थ्य, बल्कि शिक्षा, रोजगार और देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।

ईयू-एशियन यूथ मेंटल हेल्थ कॉन्फ्रेंस की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, 1990 के मुकाबले 2021 तक दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में युवाओं में मानसिक बीमारियों के मामलों में 44 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। यहां 15 वर्ष से 34 वर्ष आयु वर्ग के 2.8 करोड़ से अधिक युवा मानसिक विकारों के साथ जीवन जीने को मजबूर हैं। यह क्षेत्र में मानसिक बीमारियों के कुल मामलों का करीब 36 प्रतिशत है।

भारत के आंकड़े चिंतित करने वाले

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 15 से 24 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 5.4 करोड़ युवा किसी न किसी मानसिक समस्या से प्रभावित हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस उम्र में मानसिक बीमारी का असर पढ़ाई, नौकरी, रिश्तों और भविष्य के फैसलों पर सबसे ज्यादा पड़ता है। रिपोर्ट के मुताबिक 1990 के बाद सबसे तेज बढ़ोतरी 25-34 वर्ष आयु वर्ग में हुई है। यानी नौकरी, परिवार और करियर की जिम्मेदारियों वाली उम्र सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही है।

हर 100 में से 5 युवा एंग्जायटी का शिकार

रिपोर्ट बताती है कि युवाओं में चिंता (एंग्जायटी) सबसे आम मानसिक समस्या बनकर उभरी है। हर 100 युवाओं में लगभग पांच इससे प्रभावित हैं। इसके बाद अवसाद, नशे की लत और अन्य मानसिक विकारों के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं। महिलाओं में मानसिक बीमारियों के मामले पुरुषों की तुलना में अधिक पाए गए हैं।

सोशल मीडिया भी अब बना वजह

पढ़ाई व करियर की प्रतिस्पर्धा, नौकरी की अनिश्चितता, आर्थिक दबाव तो तनाव के कारण थे ही अब सोशल मीडिया, अकेलापन, प्राकृतिक आपदाएं व सामाजिक तनाव युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं। लोग आज भी मानसिक बीमारी को छिपाते हैं, जिससे समय पर इलाज नहीं मिल पाता। रिपोर्ट में कहा गया है कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को केवल बड़े अस्पतालों तक सीमित रखने के बजाय स्कूलों, कॉलेजों व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाना होगा।

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