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भारत पर टूटेगा दुखों का पहाड़, ईरान युद्ध से बढ़ेगी गरीबी! 25 लाख लोगों पर मंडराया संकट

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  • मध्य पूर्व तनाव से भारत में 25 लाख लोग गरीबी में आ सकते हैं।
  • मानव विकास की गति रुकेगी, अन्य आर्थिक नुकसान भी होंगे।
  • गरीबी दर 23.9% से बढ़कर 24.2% तक जा सकती है।
  • ऊर्जा और उर्वरक के लिए भारत मध्य पूर्व पर बहुत निर्भर है।

India Poverty Report: मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच भारत के लिए बुरी खबर सामने आ रही है. एक रिपोर्ट के अनुसार, इस वैश्विक संकट से भारत में करीब 25 लाख लोग गरीबी के जाल में फंस सकते हैं. साथ ही मानव विकास की गति में रूकावट और अन्य नुकसानों का भी सामना करना पड़ सकता है. 

संयुक्त राष्ट्र की संस्था संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) ने अपनी रिपोर्ट में इन बातों का खुलासा किया हैं. आइए जानते हैं, भारत पर इस युद्ध का क्या असर पड़ने वाला है?

25 लाख लोगों पर संकट के बादल

यूएनडीपी की ताजा रिपोर्ट में संकेत दिया गया हैं कि दुनिया भर में करीब 88 लाख लोग गरीबी की चपेट में आ सकते हैं. रिपोर्ट यह भी बताती है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य खर्च और लगातार बने तनाव का असर केवल उसी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका प्रभाव प्रशांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है.

अनुमान के मुताबिक करीब 299 अरब अमेरिकी डॉलर के नुकसान की संभावना है. भारत को लेकर रिपोर्ट में कहा गया हैं कि, देश में गरीबी से प्रभावित लोगों की संख्या लगभग 4 लाख से बढ़कर 25 लाख तक पहुंच सकती हैं.

गरीबी दर में भी इजाफा 

रिपोर्ट में देश की गरीबी दर को लेकर भी बातें कही गई हैं. भारत की गरीबी दर 23.9 प्रतिशत से बढ़कर 24.2 फीसदी तक जा सकती है. इसके चलते करीब 24,64,698 अतिरिक्त लोग गरीबी के दायरे में आ सकते हैं. साथ ही, अनुमान यह भी है कि इस संकट के बाद देश में कुल लगभग 35,40,33,698 लोग गरीबी में जीवन बिता सकते हैं. इससे पहले यह आंकड़ा 35,15,69,000 बताया गया था.

मिडिल ईस्ट पर देश की निर्भरता

यूएनडीपी की रिपोर्ट में देश की मिडिल ईस्ट पर निर्भरता की बात भी बताई गई हैं. रिपोर्ट के अनुसार देश अपनी तेल जरूरतों का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा दूसरे देशों से आयात करता है. इनमें से 40 फीसदी कच्चा तेल और 90 प्रतिशत एलपीजी पश्चिम एशिया के देशों से आता है. साथ ही मिडिल ईस्ट से ही 45 प्रतिशत से ज्यादा उर्वरक की आपूर्ति होती है. इन आंकड़ों से साफ पता चलता है कि, देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए किस हद तक मिडिल ईस्ट देशों पर निर्भर हैं.   

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