सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में चार वर्षीय बच्ची से कथित दुष्कर्म और हत्या के मामले में समय पर इलाज नहीं देने पर दो निजी अस्पतालों और उनके डॉक्टरों को कड़ी फटकार लगाई। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने दोनों अस्पतालों से पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा देने को कहा। मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह होगी।
सुनवाई के दौरान सीजेआई ने डॉक्टरों से कहा, अगर आप अपना फर्ज नहीं निभा सकते तो आपको अपने नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लिखने का कोई अधिकार नहीं है। अगर आपके पास इलाज की सुविधा नहीं थी तो आपको खुद बच्ची को दूसरे अस्पताल लेकर जाना चाहिए था। क्या आपने उसे इसलिए नजरअंदाज किया क्योंकि वह गरीब थी? क्या वह आपकी फीस नहीं दे सकती थी?
क्या है मामला?
16 मार्च को चार वर्षीय बच्ची को कथित तौर पर पड़ोस में रहने वाला एक व्यक्ति चॉकलेट दिलाने के बहाने अपने साथ ले गया। जब बच्ची वापस नहीं लौटी तो उसके पिता ने उसकी तलाश शुरू की। बाद में बच्ची बेहोशी की हालत में खून से लथपथ मिली।
परिजन उसे दो निजी अस्पतालों में लेकर गए, लेकिन आरोप है कि दोनों अस्पतालों ने उसे भर्ती करने से इनकार कर दिया। इसके बाद बच्ची को गाजियाबाद के एक सरकारी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
पहले भी जताई थी नाराजगी
सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल में इस मामले में गाजियाबाद पुलिस की एफआईआर दर्ज करने और जांच को लेकर दिखाई गई “अनिच्छा” पर भी सवाल उठाए थे। अदालत ने कथित तौर पर इलाज से इनकार करने वाले दोनों निजी अस्पतालों- खजान सिंह मानवी हेल्थ केयर और सेंट जोसेफ (मरियम) अस्पताल- को आरोपों पर अपना हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था।
यह मामला पीड़िता के पिता की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। दिहाड़ी मजदूर पिता ने मामले की अदालत की निगरानी में विशेष जांच दल (एसआईटी) या सीबीआई से जांच कराने की मांग की है। 10 अप्रैल को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच में गाजियाबाद पुलिस के “संवेदनहीन रवैये” की भी कड़ी आलोचना की थी।
शीर्ष अदालत ने सरकार को भी भेजा नोटिस
अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार, संबंधित थाना प्रभारी, दोनों अस्पतालों और कार्यपालक मजिस्ट्रेट को नोटिस जारी किए थे। साथ ही पुलिस और अस्पतालों को निर्देश दिया था कि पीड़िता और उसके परिवार की पहचान उजागर न हो तथा रिकॉर्ड से ऐसी सभी जानकारियां हटा दी जाएं।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य पुलिस को यह भी निर्देश दिया था कि वह पीड़ित परिवार को परेशान न करे। अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई थी कि खून से लथपथ बच्ची को दोनों निजी अस्पतालों ने भर्ती करने से इनकार कर दिया और बाद में सरकारी अस्पताल में उसे मृत घोषित कर दिया।


