रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने मंगलवार को भौतिकी के नोबेल पुरस्कार का एलान कर दिया। इस साल फ्रांसिस हैल्जेन को भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्हें यह पुरस्कार आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी बनाने में अहम योगदान देने और अंतरिक्ष से आने वाले बेहद ज्यादा ऊर्जा वाले न्यूट्रिनो की खोज के लिए दिया गया है। 2025 का भौतिकी का नोबेल जॉन क्लार्क, मिशेल एच. डेवोरेट और जॉन एम. मार्टिनिस को दिया गया था।

रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने हैल्जेन के उस वैज्ञानिक योगदान को मान्यता दी, जिसमें उन्होंने एक ऐसी अवधारणा को वास्तविकता में बदला जिसे कभी असंभव जैसा माना जाता था। इसके तहत अंटार्कटिका की करीब एक घन किलोमीटर बर्फ का इस्तेमाल ब्रह्मांड से आने वाले बेहद मुश्किल से पकड़े जाने वाले कणों का पता लगाने के लिए किया गया।
हैल्जेन की किस खोज पर उन्हें मिला नोबल?
न्यूट्रिनो प्रकृति में पाए जाने वाले सबसे अधिक संख्या वाले कणों में शामिल हैं। हालांकि, इनका पता लगाना बेहद कठिन होता है। इन पर कोई विद्युत आवेश नहीं होता और ये पदार्थ के साथ बहुत कमजोर तरीके से प्रतिक्रिया करते हैं। हर सेकंड अरबों न्यूट्रिनो हमारे शरीर से होकर गुजरते हैं, लेकिन आम तौर पर उनका कोई प्रत्यक्ष असर महसूस नहीं होता।
यही विशेषता न्यूट्रिनो को खगोल विज्ञान के लिए बेहद महत्वपूर्ण बनाती है। आवेशित कणों के विपरीत, जिन्हें चुंबकीय क्षेत्र अपनी दिशा से हटा सकते हैं, उच्च ऊर्जा वाले न्यूट्रिनो ब्रह्मांड में बहुत लंबी दूरी लगभग सीधी रेखा में तय कर सकते हैं। इस दौरान वे अपने स्रोत की जानकारी अपने साथ लेकर चलते हैं। इस वजह से न्यूट्रिनो ब्रह्मांड के कुछ सबसे शक्तिशाली और हिंसक क्षेत्रों से आने वाले संदेशवाहक की तरह काम कर सकते हैं।
दक्षिणी ध्रुव के नीचे मौजूद बर्फ को विशाल कण डिटेक्टर के रूप में इस्तेमाल करने की सिफारिश
वैज्ञानिकों का मानना है कि अंतरिक्ष में प्राकृतिक कण त्वरक मौजूद हैं, जो ऐसे कण पैदा करने में सक्षम हैं जिनकी ऊर्जा मानव निर्मित सबसे शक्तिशाली कण त्वरकों से भी लाखों गुना अधिक हो सकती है। हालांकि, इन ब्रह्मांडीय त्वरकों की पहचान करना और उनके काम करने के तरीके को समझना लंबे समय से बड़ी चुनौती रहा है। फ्रांसिस हैल्जेन ने 1988 में ही इस समस्या के लिए एक महत्वाकांक्षी समाधान का प्रस्ताव रखा था। उनका विचार था कि दक्षिणी ध्रुव के नीचे मौजूद विशाल और पारदर्शी बर्फ की परत को एक विशाल कण डिटेक्टर के रूप में इस्तेमाल किया जाए।
जब कोई उच्च ऊर्जा न्यूट्रिनो कभी-कभार बर्फ के भीतर मौजूद परमाणु के नाभिक से टकराता है, तो इस प्रक्रिया से प्रकाश की एक छोटी चमक पैदा हो सकती है। आइसक्यूब वेधशाला अंटार्कटिका की बर्फ के भीतर गहराई में लगाए गए हजारों प्रकाश सेंसरों की मदद से इन बेहद छोटी चमकों का पता लगाती है।
इन संकेतों के आधार पर वैज्ञानिक न्यूट्रिनो की दिशा और ऊर्जा का पता लगा सकते हैं। दक्षिणी ध्रुव का स्थान इस प्रयोग के लिए कई फायदे देता है। अंटार्कटिका की विशाल बर्फ प्रयोग के लिए बहुत बड़ा क्षेत्र उपलब्ध कराती है। इसके अलावा दक्षिणी ध्रुव का अपेक्षाकृत स्थिर वातावरण और बेहद कम पृष्ठभूमि हस्तक्षेप इस प्रयोग के लिए अनुकूल परिस्थितियां प्रदान करता है।
आइसक्यूब वेधशाला बनाने में लगे कई साल
आइसक्यूब वेधशाला को बनाने में कई वर्ष लगे। इसे 2011 में पूरा किया गया। यह करीब एक घन किलोमीटर बर्फ के क्षेत्र में फैली हुई है। इसके बाद शोधकर्ताओं ने उच्च ऊर्जा वाले न्यूट्रिनो का पता लगाना शुरू किया। बाद के अवलोकनों से इस बात के प्रमाण मिले कि इनमें से कुछ कण हमारे सौर मंडल से बहुत दूर स्थित स्रोतों से आए थे। इस खोज ने ब्रह्मांड को समझने का एक नया रास्ता खोल दिया, जिसे न्यूट्रिनो खगोल विज्ञान कहा जाता है।
भौतिकी के नोबेल समिति के अध्यक्ष मार्क पियर्स ने कहा, “फ्रांसिस हैल्जेन ने शोधकर्ताओं और इंजीनियरों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम का नेतृत्व किया, जिन्होंने हमें एक शानदार उपकरण उपलब्ध कराया है।” पियर्स के अनुसार, हैल्जेन की वैज्ञानिक दृष्टि ने खगोल विज्ञान के एक नए स्वरूप की राह तैयार करने में मदद की।
आज भी न्यूट्रिनो से जुड़ी घटनाओं के जुटाए जा रहे आंकड़े
आइसक्यूब वेधशाला आज भी न्यूट्रिनो से जुड़ी घटनाओं का आंकड़ा जुटा रही है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि लगातार बढ़ते आंकड़ों से उन ब्रह्मांडीय स्रोतों की पहचान करने में मदद मिलेगी, जहां से ये अत्यधिक ऊर्जा वाले कण निकलते हैं। इससे ब्रह्मांड में अब तक अज्ञात घटनाओं के बारे में भी जानकारी मिल सकती है।
यह नोबेल सम्मान केवल एक रहस्यमय कण से जुड़े संकेत की खोज के लिए नहीं है। यह ब्रह्मांड को देखने और समझने के एक नए तरीके को भी मान्यता देता है। इस तरीके में प्रकाश के बजाय उन कणों का अध्ययन किया जाता है जो लगभग बिना प्रभावित हुए पूरे ब्रह्मांड में लंबी दूरी तय कर सकते हैं।
कल हुआ था चिकित्सा के नोबेल का एलान
इससे पहले सोमवार को 2026 का चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार अमेरिका के कार्ल डाइसेरोथ, जर्मनी के पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल को दिया गया है। इन वैज्ञानिकों ने ऑप्टोजेनेटिक्स नाम की ऐसी तकनीक विकसित करने में मदद की, जिससे रोशनी की मदद से दिमाग की अलग-अलग तंत्रिका कोशिकाओं को नियंत्रित करके उनके काम को समझा जा सकता है।
बता दें कि इन वैज्ञानिकों को दिसंबर में स्वीडन के स्टॉकहोम में सम्मानित किया जाएगा। 2026 में नोबेल पुरस्कार की राशि करीब 11.5 करोड़ रुपए है।
