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धार की भोजशाला में क्या है विवाद की जड़? जानिए इतिहास से हाईकोर्ट तक की पूरी कहानी – Dhar Bhojshala Dispute History High Court Verdict Asi Report Temple Mosque Case Full Story

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मध्य प्रदेश के धार जिले स्थित विवादित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को लेकर आज 15 मई को बड़ा फैसला आ सकता है। इंदौर हाईकोर्ट की डबल बेंच इस मामले से जुड़ी छह याचिकाओं पर अपना निर्णय सुनाने वाली है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के वकील विष्णु शंकर जैन ने भी सोशल मीडिया के जरिए फैसले की जानकारी साझा की है।

यह विवाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) संरक्षित भोजशाला परिसर के धार्मिक स्वरूप को लेकर है। हिंदू पक्ष इसे मां सरस्वती का मंदिर और प्राचीन विद्या केंद्र मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है। वहीं जैन समुदाय के एक पक्ष का दावा है कि यह मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल था। फैसले से पहले प्रशासन अलर्ट मोड पर है और सभी पक्षों ने शांति बनाए रखने की अपील की है।

2022 में शुरू हुआ कानूनी विवाद

भोजशाला विवाद का नया कानूनी अध्याय साल 2022 में शुरू हुआ। उस समय रंजना अग्निहोत्री और उनके सहयोगियों ने हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में भोजशाला का धार्मिक स्वरूप तय करने और हिंदू समाज को वहां पूर्ण पूजा अधिकार देने की मांग की गई थी। इसके बाद 11 मार्च 2024 को हाईकोर्ट ने एएसआई को पूरे परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया। एएसआई ने 22 मार्च 2024 से 98 दिनों तक परिसर का सर्वे किया और 15 जुलाई 2024 को 2000 से अधिक पन्नों की रिपोर्ट अदालत में पेश की।


हाईकोर्ट में चली लंबी सुनवाई

इंदौर हाईकोर्ट की डबल बेंच ने 6 अप्रैल 2026 से इस मामले में नियमित सुनवाई शुरू की। 12 मई 2026 तक चली सुनवाई में हिंदू, मुस्लिम और जैन पक्षों ने अपने-अपने दावे और साक्ष्य अदालत में पेश किए। करीब एक महीने से ज्यादा चली सुनवाई के दौरान अदालत में हजारों दस्तावेज, ऐतिहासिक रिकॉर्ड, पुरातात्विक साक्ष्य और धार्मिक दावे रखे गए। सुनवाई पूरी होने के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।

हिंदू पक्ष ने मंदिर होने के दिए तर्क

सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष की ओर से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन, विनय जोशी और याचिकाकर्ता आशीष गोयल ने भोजशाला को मंदिर बताते हुए कई ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य कोर्ट में पेश किए। हिंदू पक्ष ने कहा कि परिसर में मिले स्तंभ, देवी सरस्वती से जुड़े प्रतीक, संस्कृत और प्राचीन नागरी लिपि के शिलालेख मंदिर स्वरूप की ओर संकेत करते हैं। ब्रिटिशकालीन गजेटियर और इतिहासकारों के दस्तावेजों में भी भोजशाला को मां सरस्वती का मंदिर और शिक्षा केंद्र बताया गया है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी दावा किया कि यहां लंबे समय से वसंत पंचमी सहित अन्य अवसरों पर पूजा-अर्चना की परंपरा रही है और परिसर के कई संरचनात्मक तत्व इस्लामी स्थापत्य से पहले के हैं।

मुस्लिम पक्ष ने एएसआई रिपोर्ट पर उठाए सवाल

मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में एएसआई की सर्वे रिपोर्ट को पक्षपातपूर्ण बताया। उनका कहना था कि यह रिपोर्ट हिंदू पक्ष के दावों को मजबूत करने के उद्देश्य से तैयार की गई है। हालांकि एएसआई ने अदालत में स्पष्ट कहा कि सर्वे पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से किया गया और इसमें मुस्लिम समुदाय के विशेषज्ञ भी शामिल थे।

एएसआई रिपोर्ट में क्या सामने आया

एएसआई की रिपोर्ट में दावा किया गया कि मौजूदा ढांचे से पहले वहां परमार राजाओं के समय की एक विशाल संरचना मौजूद थी और वर्तमान ढांचा मंदिर के अवशेषों का उपयोग करके बनाया गया। रिपोर्ट के मुताबिक परिसर में लाल पत्थरों के नक्काशीदार स्तंभ, सभा कक्ष, यज्ञ कुंड, संस्कृत और प्राकृत भाषा के शिलालेख मिले हैं। इनमें परमार वंश के राजा नरवर्मन का भी उल्लेख है। एएसआई ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा कि खंभों और दीवारों पर बनी मानव और पशु आकृतियों को जानबूझकर क्षतिग्रस्त किया गया था। रिपोर्ट में परिसर को साहित्यिक और शैक्षणिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र भी बताया गया है। एएसआई के अनुसार वहां मिले शिलालेखों में संस्कृत वर्णमाला, व्याकरण के नियम और ‘कर्पूरमंजरी’ नामक नाटक के अंश भी मिले हैं।

क्या है भोजशाला का इतिहास

भोजशाला का इतिहास 11वीं शताब्दी से जुड़ा माना जाता है। मान्यता है कि यहां मां सरस्वती का मंदिर और विद्या केंद्र था। बताया जाता है कि 12वीं-13वीं शताब्दी में मंदिर को ध्वस्त कर वहां मकबरा और मस्जिद का निर्माण किया गया। रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में प्रकाशित माइकल विलिस के रिसर्च पेपर ‘धार, भोज और सरस्वती’ के अनुसार “भोजशाला” शब्द का उपयोग पहली बार जर्मन भारतविद एलॉइस एंटोन फ्यूहरर ने 1893 में किया था। बाद में ब्रिटिश अधिकारी के.के. लेले ने भी इस स्थल का उल्लेख किया और यहां मिले संस्कृत शिलालेखों की व्याख्या शुरू करवाई। इसी दौरान यह बात सामने आई कि वर्तमान ढांचे का निर्माण ध्वस्त मंदिर के अवशेषों से किया गया था।


आजादी के बाद कैसे बढ़ा विवाद


  • 1951 में भोजशाला को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया।

  • 1952 में हिंदुओं ने यहां भोज दिवस मनाना शुरू किया, जिससे क्षेत्र में तनाव बढ़ा।

  • इसके जवाब में 1953 में मुस्लिम समुदाय ने यहां उर्स मनाना शुरू किया।

  • इसके बाद लंबे समय तक व्यवस्था बनी रही कि शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय नमाज पढ़ता रहा और वसंत पंचमी पर हिंदू समाज पूजा करता रहा।

  • 1961 में इतिहासकार डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर लंदन गए और वाग्देवी की प्रतिमा के भारतीय मूल के होने के साक्ष्य प्रस्तुत किए, हालांकि प्रतिमा वापस नहीं लाई जा सकी।

1992 के बाद बढ़ा विवाद


  • अयोध्या विवाद के बाद भोजशाला का मुद्दा भी तेजी से उभरा। दक्षिणपंथी संगठनों ने यहां हिंदू पूजा के पूर्ण अधिकार की मांग तेज कर दी।

  • 1994 में विश्व हिंदू परिषद द्वारा स्मारक पर झंडा फहराने की चेतावनी के बाद धार में कर्फ्यू जैसी स्थिति बन गई। बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौते के बाद मंगलवार और शुक्रवार को पूजा-नमाज की व्यवस्था जारी रही।

  • 1997 में एक बार फिर विश्व हिंदू परिषद ने स्मारक पर झंडा फहराने का ऐलान किया, जिसके बाद प्रशासन ने आम लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दी।

2003 में राजनीति का बड़ा मुद्दा बनी भोजशाला

जनवरी 2003 में बसंत पंचमी के दौरान हिंदू संगठनों और प्रशासन के बीच बड़ा टकराव हुआ। पुलिस लाठीचार्ज के बाद प्रदर्शन भड़क गए और कई जगह आगजनी की घटनाएं हुईं। फरवरी 2003 में यह मामला संसद तक पहुंचा। उस समय सांसद शिवराज सिंह चौहान ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को दबा रही है। मार्च 2003 में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री जगमोहन ने सुझाव दिया कि हिंदुओं को सूर्योदय से सूर्यास्त तक पूजा और मुस्लिमों को शुक्रवार को दो घंटे नमाज की अनुमति दी जाए। इसके बाद भोजशाला का मुद्दा मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया। भाजपा नेता उमा भारती ने इसे चुनाव प्रचार का प्रमुख विषय बनाया और बाद में प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

एएसआई सर्वे के आदेश को मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने 1 अप्रैल 2024 को निर्देश दिया कि सर्वे के दौरान परिसर के स्वरूप में कोई बदलाव नहीं किया जाए और खुदाई सीमित दायरे में रहे। इसी बीच हिंदू संगठनों ने एएसआई रिपोर्ट के आधार पर परिसर में मां वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित करने और मस्जिद को बंद करने की मांग तेज कर दी।

सभी पक्षों ने की शांति बनाए रखने की अपील

फैसले से पहले हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के याचिकाकर्ताओं और अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन व विनय जोशी ने वीडियो जारी कर सभी समुदायों से शांति बनाए रखने की अपील की है। उन्होंने कहा कि सभी को न्यायपालिका पर भरोसा रखना चाहिए और जो भी फैसला आए, उसे स्वीकार करना चाहिए। साथ ही डीजीपी और धार एसपी से कानून व्यवस्था बनाए रखने का अनुरोध भी किया गया है।

 

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