प्राचीन केवड़ेश्वर महाकाल शिव मंदिर इंदौर तहसील के तिल्लौर खुर्द ग्राम के समीप स्थित है। यह इंदौर व आसपास के श्रद्धालुओं की आस्था का पवित्र केंद्र है। आश्रमनुमा यह मंदिर सिद्ध महाकाल शिव मंदिर के रूप में प्रसिद्ध है। इतिहासकारों के मुताबिक इसका निर्माण 800 वर्ष पूर्व किया गया था।
इंदौर शहर से इसकी दूरी करीब 20 किलोमीटर है। यह स्थान पुण्य सलिला मोक्षदायनी शिप्रा नदी का उद्गम स्थल माना जाता है। वैसे शिप्रा का उद्गम स्थल विंध्याचल पर्वत श्रृंखला के कोकरी बड़ली पहाड़ी पर है। महंतों और संतों की मान्यता है कि केवडेश्वर मंदिर के समीप गुप्त रूप से शिप्रा का निवास है। इसी पहाड़ी के ये यहां स्थित तीन कुंड हैं और जीर्णोद्धार के कारण ये नवीन प्रतीत होते हैं। इन्ही कुंडों के उत्तर पूर्वाभिमुख यह शिव मंदिर स्थित है। यह मंदिर 12-13 वीं सदी का माना जाता है।
केवड़े के पेड़ों की यहां थी बहुतायत
केवड़ेश्वर शिव मंदिर के कारण समीप कुछ लोग निवास करने लगे हैं। होलकर कालीन इतिहास की किताबों में तिल्लौर खुर्द ग्राम का उल्लेख है। 1931 में प्रकाशित कैप्टन एल. सी. धारीवाल के इंदौर जिला गजेटियर में तिल्लौर खुर्द की 1921 में आबादी 716 दर्ज है। इसके नामकरण को लेकर मान्यता है कि किसी कालखंड में इस स्थान पर केवड़े के पेड़ बहुत अधिक संख्या में रहे थे। केवड़े के पेड़ में जो फूल लगता है उसे केवड़ा कहते हैं, यह बहुत सुगंधित होता है।
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स्वयंभू है शिवलिंग
केवड़ेश्वर शिव मंदिर का लिंग स्वयं प्रकट हुआ है, इसलिए यह मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र है। मंदिर का जीर्णोद्धार होलकर राजाओं ने करवाया था। मंदिर की संरचना, गर्भगृह, और द्वार परमार कालीन हैं। मंदिर प्रागण में शिव प्रतिमाएं और नंदी की प्रतिमा विराजित है। मंदिर में गणेश जी की प्रतिमा दीवार पर मुद्रित है। समीप ही सुंदर घाटों का निर्माण किया गया है। मंदिर के पीछे की भाग में महात्माओं की समाधि, निवास, गुफाएं और महंतों के रहने का स्थान है। मंदिर प्रागण में विशाल वृक्षों की श्रृंखला भी है, जिन्हें देख लगता है कि ये पेड़ बहुत अधिक प्राचीन रहे होंगे।
दूधाधारी महाराज की तपोस्थली
मंदिर के आसपास विशाल और घने वृक्ष है। वर्तमान में मंदिर का दायित्व धर्मेंद्रपुरी महाराज संभाल रहे हैं। उनके अनुसार केवड़ेश्वर महाकाल मंदिर बाबा दूधाधारी महाराज की तपोस्थली है। इसी स्थान पर बाबा घने जंगल में साधना करते थे। घने जंगल की वजह से मंदिर में कई जंगली जानवरों का भय रहता था, पर वे भी देव दर्शन कर चले जाते थे। इस स्थान पर अखंड चैतन्य धुनी कई वर्षों से प्रज्वलित है। यहां बाबा त्र्यंबक पुरी महाराज ने 108 वर्ष तक तपस्या की थी। घने पेड़ और आसपास सुंदर मनोरम स्थल होने से यहां कई लोग दर्शन हेतु आते हैं।
कंपेल में थी देवी अहिल्या की कचहरी
केवड़ेश्वर महाकाल शिव मंदिर से कुछ दूरी पर कंपेल है। यह होलकर राजाओं का आरंभिक जिला मुख्यालय था। यहां देवी अहिल्या बाई की कचहरी थी। केवड़ेश्वर जाने वाले मुख्य मार्ग पर पहले देवगुराड़िया का गुटकेश्वर महादेव आता है। इस शिव मंदिर का जीर्णोद्धार देवी अहिल्या बाई ने करवाया था। देवगुराड़िया और कंपेल के बीच में केवड़ेश्वर महाकाल मंदिर स्थित है। सावन माह और विशेष अवसरों पर इन दोनों मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।

