World Tribal Day: हर साल 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस यानी कि वर्ल्ड ट्राइबल डे के रूप में मनाया जाता है. इस दिन को खास तौर पर आदिवासी समाज की अनोखी जिंदगी, उनकी बिल्कुल ही अलग पहचान और जंगलों को बचाने के लिए उनके द्वारा किए गए कामों को सलाम करने के लिए चुना गया है. जब भी देश में आदिवासी समाज की पुरानी और सुंदर परंपराओं की बात होती है, तो हमारे दिमाग में झारखंड का नाम आता ही है. झारखंड की आदिवासी संस्कृति आज की नहीं, बल्कि सदियों पुरानी है. लेकिन यह आज भी ठीक वैसे ही फ्रेश और उसी तरह वाइब्रेंट बनी हुई है. यहां के लोगों की अगर बात करें, तो ये हमें कुदरत के साथ दोस्ती बनाकर और खुश रहकर जिंदगी कैसे जी जाती है, यह बहुत ही अलग तरीके से सिखा सकते हैं. आज इस आर्टिकल में हम आपको झारखंड की आदिवासी संस्कृति की 5 ऐसी खास बातों के बारे में बताने जा रहे हैं, जो हर एक इंसान को जरूर मालूम होनी चाहिए. तो चलिए इनके बारे में विस्तार से जानते हैं.

पेड़-पौधों और जंगलों से सच्चा प्यार
अगर बात करें झारखंड के आदिवासी समाज की, तो इनका जीवन पूरी तरह से जंगलों और प्रकृति पर ही टिका हुआ है. ये लोग पेड़-पौधों, नदियों और पहाड़ों को किसी भगवान से कम नहीं मानते हैं. झारखंड का सबसे बड़ा त्यौहार भी सरहुल ही है, जिसमें सखुआ के पेड़ और उसके फूलों की पूजा की जाती है. इनका हमेशा से यह मानना रहा है कि अगर जंगल और पेड़ बचे रहेंगे, तभी इंसान भी जिंदा रह सकेंगे. ये लोग जंगलों से सिर्फ उतना ही सामान लेते हैं, जितनी इन्हें जरूरत होती है. ये लोग कभी भी प्रकृति या फिर नेचर को नुकसान पहुंचाने का काम नहीं करते हैं.

रिश्तों और जानवरों को समर्पित यहां के अनोखे त्यौहार
झारखंड में मनाए जाने वाले त्यौहार सिर्फ पूजा करने तक सीमित नहीं होते हैं. इन त्योहारों में अपनों के प्रति प्यार भी छिपा हुआ होता है. उदाहरण के लिए, करम त्यौहार में बहनें अपने भाइयों की अच्छी सेहत और कामयाबी के लिए उपवास रखकर प्रार्थना करती हैं. वहीं, सोहराय त्यौहार में घर के गाय, बैल और दूसरे मवेशियों को नहलाकर सजाया और तैयार किया जाता है. इस दिन उनकी सेवा भी की जाती है. ऐसा करने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि यही जानवर खेती-बाड़ी के कामों में इंसानों का साथ देते हैं.

मिलकर रहना और सबको बराबर समझना
जब आप झारखंड के आदिवासी गावों में जाएंगे, तो यह आपको समझ में आने लगेगा कि यहां किसी को छोटा या फिर बड़ा नहीं समझा जाता है. यहां सभी लोग एक साथ एक परिवार की तरह मिल-जुलकर रहते हैं. इस समाज में आपको महिला और पुरुष के बीच कोई भेदभाव नजर नहीं आएगा और इन दोनों को ही एक बराबर का दर्जा भी मिलता है. जब भी गांव से जुड़े फैसले लिए जाते हैं, तो सभी एक साथ मिलकर बैठते हैं और बातचीत करने के बाद ही कोई भी जरूरी फैसला लेते हैं.

ढोल-मांदर की धुन और मजेदार डांस
झारखंड के लोगों की जिंदगी डांस और संगीत के बिना अधूरी सी है. यहां गांव के बीच में एक खाली सी जगह छोड़ी जाती है, जिसे अखड़ा कहा जाता है. इसी जगह पर शाम के समय लोग ढोल, मांदर और बांसुरी बजाते हैं. यहां मौजूद सभी लोग एक-दूसरे का हाथ पकड़कर एक गोल घेरा बना लेते हैं और उसी में डांस करते हैं. झूमर, छऊ और पाइका यहां के बहुत ही फेमस डांस हैं. अक्सर इन गानों और नृत्यों में कोई न कोई पुरानी कहानी या जीवन का गहरा संदेश छिपा होता है.

सिंपल खाना और घर की दीवारों पर सुंदर आर्ट
जब बात आती है झारखंड की कला की और यहां खाई जाने वाली चीजों की, तो ये बहुत ही नेचुरल और हेल्दी होते हैं. यहां की महिलाएं अक्सर अपने घरों की मिट्टी की दीवारों पर सोहराय और कोहबर नाम की बेहद सुंदर चित्रकारी करती हैं. इस पेंटिंग को बनाने के लिए ये महिलाएं किसी केमिकल वाले रंगों का नहीं, बल्कि नेचुरल रंगों और मिट्टी का इस्तेमाल करना पसंद करती हैं. वहीं, जब बात आती है खान-पान की, तो यहां लोग आपको मड़ुआ की रोटी, धुसका, पीठा, छिलका रोटी और जंगलों का फ्रेश साग बहुत ही चाव से खाते हुए दिख जाएंगे.

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