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कावेरी जल विवाद:तमिलनाडु विधानसभा में सत्ता पक्ष-विपक्ष आमने सामने; Cm विजय बोले- राजनीति नहीं, समाधान चाहिए – Cauvery Water Dispute Clash In Tamilnadu Assembly Cm Vijayan Says If Needed He Will Go Bengaluru

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तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने शुक्रवार को विधानसभा में कावेरी जल विवाद पर सरकार का पक्ष स्पष्ट किया। उन्होंने खुलासा किया कि इस संवेदनशील मुद्दे के समाधान के लिए उन्होंने कर्नाटक सरकार के साथ बातचीत का प्रस्ताव रखा था। हालांकि, उन्होंने यह भी दोहराया कि राज्य सरकार अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी लड़ाई पूरी मजबूती से जारी रखेगी। साथ ही, यदि बातचीत से सकारात्मक समाधान निकलने की संभावना बनती है, तो उस रास्ते को भी अपनाने से सरकार पीछे नहीं हटेगी।

मुख्यमंत्री विजय ने क्या कहा?

मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने कहा कि कावेरी जल विवाद के समाधान के लिए कर्नाटक के साथ संवाद का प्रस्ताव उन्होंने ही रखा था। उनका मानना है कि यदि बातचीत के जरिए सकारात्मक परिणाम मिलने की संभावना हो, तो इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद का शांतिपूर्ण समाधान तलाशा जा सकता है। उन्होंने कहा कि कावेरी तमिलनाडु के लोगों की जीवनरेखा है। ऐसे संवेदनशील विषय पर वह किसी भी तरह की राजनीतिक बयानबाजी या सस्ती राजनीति नहीं करना चाहते। उनका उद्देश्य केवल राज्य के अधिकारों और लोगों के हितों की रक्षा करना है।

विपक्ष के सवाल पर क्या बोले?

विधानसभा में विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन द्वारा कावेरी मुद्दा उठाए जाने पर मुख्यमंत्री ने विस्तार से जवाब दिया। उन्होंने बताया कि 1969 से तमिलनाडु सरकार समय-समय पर इस विवाद के समाधान के लिए बातचीत का रास्ता अपनाती रही है और जरूरत पड़ने पर न्यायालय का भी सहारा लिया गया। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि उनकी सरकार कावेरी जल विवाद के समाधान के लिए कानूनी प्रक्रिया पर पूरी तरह कायम है। इस नीति में कोई बदलाव नहीं किया गया है और राज्य के अधिकारों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं होगा।

बेंगलुरु जाकर बातचीत करने की बात क्यों कही?

मुख्यमंत्री विजय ने बताया कि सकारात्मक नतीजों की संभावना को देखते हुए उन्होंने बेंगलुरु जाकर कर्नाटक सरकार के साथ सीधे बातचीत करने पर भी विचार किया था। उनका मानना था कि यदि आपसी संवाद से समाधान निकल सकता है, तो उस विकल्प को भी आजमाया जाना चाहिए।

क्या है कावेरी जल विवाद?

कावेरी नदी के जल बंटवारे को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच दशकों पुराना विवाद चला आ रहा है। वर्ष 1892 और 1924 में तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी और मैसूर रियासत के बीच हुए समझौतों के आधार पर दोनों क्षेत्रों में नदी के पानी के उपयोग और बंटवारे की व्यवस्था तय की गई थी। बाद में दोनों राज्यों के बीच मतभेद बढ़ने पर केंद्र सरकार ने 2 जून 1990 को कावेरी जल विवाद अधिकरण का गठन किया।

अधिकरण का अंतरिम आदेश क्या था?

सीडब्ल्यूडीटी ने 25 जून 1991 को अंतरिम आदेश जारी करते हुए कर्नाटक को निर्देश दिया कि वह अपने जलाशयों से इतना पानी छोड़े कि प्रत्येक जल वर्ष (1 जून से 31 मई) के दौरान तमिलनाडु के मेटूर बांध तक 205 टीएमसी (थाउजेंड मिलियन क्यूबिक फीट) पानी पहुंच सके। जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, प्रत्येक महीने निर्धारित पानी चार बराबर हिस्सों में चार सप्ताह के दौरान छोड़ा जाना है। यदि किसी सप्ताह निर्धारित मात्रा में पानी नहीं छोड़ा जा सके, तो उसकी भरपाई अगले सप्ताह की जाएगी। इसके अलावा, तमिलनाडु को अपने हिस्से से पुडुचेरी के काराइकल क्षेत्र के लिए 6 टीएमसी पानी उपलब्ध कराना होता है।

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी विवाद जारी

कावेरी जल विवाद अधिकरण के गठन के बावजूद दोनों राज्यों के बीच मतभेद समाप्त नहीं हुए और मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम फैसले में कर्नाटक को निर्देश दिया कि वह प्रत्येक जल वर्ष (जून से मई) के दौरान तमिलनाडु के लिए 177 टीएमसी पानी छोड़े। अदालत ने फैसले के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण और कावेरी जल विनियमन समिति के गठन का भी आदेश दिया। इसके बावजूद, वर्षा की स्थिति, जलाशयों में पानी की उपलब्धता और पानी छोड़ने के समय को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच विवाद समय-समय पर सामने आता रहता है। आज भी कावेरी जल बंटवारे का मुद्दा दोनों राज्यों के लिए राजनीतिक और कानूनी रूप से बेहद संवेदनशील बना हुआ है।

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