पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने मंगलवार को ऑपरेशन सिंदूर को लेकर कई अहम खुलासे किए हैं। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के परमाणु केंद्र पर हुए कथित ड्रोन हमले को लेकर स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने कहा कि ईंधन कम होने के कारण भारतीय ड्रोन पाकिस्तान के किरना हिल्स स्थित सेना के परमाणु केंद्र से टकरा गया था।


नई दिल्ली के विवेकानंद सेंटर में एक कार्यक्रम के दौरान जनरल चौहान ने कहा कि भारत का एक लोइटरिंग म्यूनिशन (ड्रोन) शायद इस्राइल में बना हारोप ड्रोन था। वह हमले के लिए रडार की तलाश कर रहा था लेकिन किराना हिल्स के आसपास उसका ईंधन खत्म हो गया। जनरल चौहान ने कहा, उन हमलों से पहले हमने सरगोधा और किराना हिल्स की तरफ बहुत सारे ड्रोन भेजे थे। ये रडार की तलाश कर रहे थे। ये लगभग दो घंटे तक हवा में मंडराते हैं और अगर इन्हें कोई टारगेट नहीं मिलता तो कहीं न कहीं जाकर टकरा जाते हैं। हो सकता है कि इनमें से कोई उन पहाड़ियों में से किसी एक से टकरा गया हो।
पाकिस्तानी मीडिया का क्यों किया जिक्र?
जनरल चौहान ने कहा कि किराना पहाड़ियों पर हमले को लेकर सवाल उठने की एक वजह पाकिस्तानी मीडिया में दिखाई गईं कुछ तस्वीरें भी हो सकती हैं। इन तस्वीरों में किराना पहाड़ियों से धुआं निकलता हुआ दिख रहा था। जनरल चौहान ने कहा, वायुसेना प्रमुख ने मुझसे पूछा था कि क्या उन्हें सरगोधा पर हमला करना चाहिए। मैंने कहा, निश्चित तौर पर और साथ ही कहा, कृपया दो और टारगेट चुनिए। उन्होंने जो टारगेट चुने थे, उनमें से एक पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) स्कार्दू था। स्कार्दू में मौसम खराब होने के कारण अपनी योजना बदलकर भोलाड़ी जाना पड़ा। भोलाड़ी हैंगर पर वायुसेना का हमला 10 मई के वायु अभियान की सबसे यादगार तस्वीर बन गया।
‘लक्ष्य को नहीं भेद पा रही थी पाकिस्तानी सेना’
पूर्व सीडीएस ने कहा, पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान किए गए हमलों का सुबूत जुटाने का प्रयास किया। उसने चीनी सैटेलाइट कंपनियों समेत कमर्शियल सैटेलाइट इमेजरी हासिल करने की भी कोशिश की। ये कंपनियां फीस लेकर किसी को भी सैटेलाइट तस्वीरें उपलब्ध कराती हैं। लेकिन, असल बात यह थी कि वे टारगेट को ही नहीं भेद पा रहे थे। उन्होंने कहा, चीनी कमर्शियल सैटेलाइट की तस्वीरें किसी के लिए भी उपलब्ध हैं। कोई भी उन्हें खरीद सकता है। ऐसा नहीं है कि केवल पाकिस्तानी ही इन्हें खरीद सकते हैं। अमेरिका की कई कंपनियां भी कमर्शियल सैटेलाइट इमेजरी उपलब्ध कराती हैं। इसी तरह चीन में भी अब कई कंपनियां इस क्षेत्र में काम कर रही हैं और व्यावसायिक आधार पर तस्वीरें देती हैं।
पाकिस्तान की स्थिति पर और क्या बोले जनरल अनिल चौहान?
जनरल अनिल चौहान ने कहा, समुद्री क्षेत्र में भी पाकिस्तान की स्थिति को समझने की क्षमता काफी कमजोर थी। उनकी रोजाना की ब्रीफिंग में बताया जाता था कि हमारा कैरियर बैटल ग्रुप अरब सागर में किस जगह आगे बढ़ रहा है। लेकिन जब मैंने पश्चिमी नौसेना कमान से उन दिनों की स्थिति की जानकारी ली, तो पता चला कि हमारा कैरियर बैटल ग्रुप बताई गई जगह से करीब 100 से 300 नॉटिकल मील दूर था। इसका मतलब है कि या तो उन्हें हमारे कैरियर बैटल ग्रुप के बारे में गलत जानकारी मिल रही थी या उनकी जानकारी सटीक नहीं थी। ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि वे इस जानकारी के लिए पूरी तरह विदेशी स्रोतों पर निर्भर थे। उनके लंबी दूरी के समुद्री निगरानी विमान भी बिल्कुल उड़ान नहीं भर रहे थे।
अनिल चौहान ने कहा, आज पाकिस्तान के 70 से 80 फीसदी सैन्य प्लेटफॉर्म चीनी मूल के हैं। इनमें जमीन, वायु और कुछ नौसैनिक प्लेटफॉर्म शामिल हैं। हमारे पास भी दूसरे देशों से लिए गए सैन्य प्लेटफॉर्म हैं। जब हम ऐसे उपकरण खरीदते हैं तो उनकी देखरेख और उन्हें चालू हालत में रखने की जिम्मेदारी आमतौर पर संबंधित कंपनी की होती है। इन कंपनियों के प्रतिनिधि उन देशों में रहते हैं, जहां उनके उपकरण इस्तेमाल किए जा रहे होते हैं, ताकि वे उनकी सर्विसिंग और रखरखाव कर सकें। उन्होंने कहा, पाकिस्तान में भी चीनी कंपनियों के प्रतिनिधि मौजूद रहे होंगे और चीन ने खुद माना है कि उसके लोग वहां थे। इसी तरह भारत में भी रूसी, फ्रांसीसी और इस्राइली कंपनियों के प्रतिनिधि मौजूद हो सकते हैं।
कितनी सुरक्षित हैं किराना हिल्स?
पाकिस्तान ने 2000 के दशक में किराना हिल्स के नीचे भूमिगत सुरंगे बनाने की शुरुआत की। सैन्य सेवाओं ने 2016 तक इन्हें अंतिम रूप देने का काम किया। इन सुरंगों में घुसने का रास्ता करीब 5 से 15 मीटर तक चौड़ा है और जमीनी सतह से काफी ऊंचाई पर है। यह सुरंगें अलग-अलग जगह पर तीन मंजिला ऊंची बनाई गई हैं और जुड़ी हुई हैं। 2009 से 2017 के दौरान इन सुरंगों के निर्माण की जो तस्वीरें सामने आईं, उनके विश्लेषण के बाद सामने आया कि पाकिस्तान ने इन सुरंगों को बम झेलने की क्षमता लायक बनाया है। हालांकि, आधुनिक समय में वायुसेनाओं के पास जमीन चीरकर धमाका करने वाले बम भी हैं, जो कि ऐसी भंडारण फैसिलिटी को पूरी तरह तबाह कर सकते हैं। इतना ही नहीं इस भंडारण केंद्र की दीवारें करीब 2.5 से 5 मीटर तक चौड़ी बनाई गई हैं, जिनके अंदर लोहे की रॉड्स तीन लेयर्स में लगाई गई हैं। इसके अलावा इस केंद्र में दो लेयर्स में स्टील प्लेट्स भी लगाई गई हैं, ताकि किसी मिसाइल हमले को भी झेला जा सके।
