सवाल : पलायन के कारण उत्तराखंड में कई घर खाली पड़े हैं। ऐसे गांवों या खाली घरों के लिए मकान गणना का क्या प्रावधान है?
जवाब : इस चरण में हमारा मुख्य उद्देश्य मकानों को सूचीकरण करना है। चाहें घर खाली हो, कोई वहां रह रहा हो या वह गैर-आवासीय (दुकान, गोदाम) हो, राज्य के सभी प्रकार के मकानों का पंजीकरण अनिवार्य रूप से किया जा रहा है।
सवाल : इस बार की जनगणना को डिजिटल जनगणना कहा जा रहा है। तकनीकी तौर पर यह पिछली बार से कितनी अलग है?
जवाब : इस बार तकनीकी का व्यापक स्तर पर उपयोग हो रहा है। एचएलबीसी पोर्टल के माध्यम से पूरे राज्य को 29,622 ब्लॉक्स में बांटकर प्रगणकों को डिजिटल नक्शे दिए गए हैं। आंकड़ों को एकत्र करने के लिए एंड्रॉयड और आईओएस दोनों के लिए विशेष एचएलओ मोबाइल एप तैयार किया गया है। इसके अलावा सीएमएमएस पोर्टल है, जिसे आप जनगणना का मस्तिष्क कह सकते हैं। इसी पोर्टल से प्रगणकों, सुपरवाइजर को कार्य आवंटन, परिचयपत्र, नियुक्तिपत्र जारी होने से लेकर प्रगणकों की कार्य प्रगति की रियल-टाइम मॉनिटरिंग की जा रही है।

सवाल : फील्ड स्टाफ को एप चलाने में कोई दिक्कत न आए, क्या उन्हें इसके लिए प्रशिक्षित किया गया है?
जवाब : बिल्कुल। इसके लिए त्रिस्तरीय प्रशिक्षण दिया गया है। इसमें प्रगणकों को एप और पोर्टल पर हैंड्स ऑन प्रैक्टिस कराने के साथ-साथ फील्ड पर ले जाकर मॉक ड्रिल भी करवाई गई है।

सवाल : यदि कोई परिवार 24 मई तक अपने घर पर उपलब्ध नहीं है तो क्या उनका डाटा छूट जाएगा?
जवाब : नहीं, इसके लिए प्रावधान है। यदि परिवार का कोई भी सदस्य 30 दिन की इस अवधि में एक भी दिन घर पर मौजूद है तो वे प्रगणक को जानकारी दे सकते हैं लेकिन अगर पूरे समय घर पर कोई नहीं मिलता, तो उसे लॉक्ड (ताला बंद) श्रेणी में दर्ज किया जाएगा। जनसंख्या के मुख्य आंकड़े दूसरे चरण के आधार पर जारी होते हैं। प्रथम चरण का लक्ष्य केवल उन स्थानों को चिह्नित करना है, जहां दूसरे चरण में लोग मिल सकते हैं।
