
भारतीय संगीत जगत में कुछ आवाजें ऐसी होती हैं, जो समय के साथ पुरानी नहीं पड़तीं और एस. पी. बालासुब्रमण्यम उन्हीं में से एक थे. अपनी मधुर आवाज और शानदार गायकी के दम पर उन्होंने कई पीढ़ियों का मनोरंजन किया. दक्षिण भारतीय सिनेमा से लेकर बॉलीवुड तक, उनके गाए गीत आज भी लोगों की पसंद बने हुए हैं. उनके जन्मदिन के मौके पर आइए जानते हैं उस गायक की कहानी, जिसने अपनी मेहनत, टैलेंट और अनोखे रिकॉर्ड्स के दम पर संगीत की दुनिया में अलग पहचान बनाई.
एक दिन में 21 गाने रिकॉर्ड कर रचा था इतिहास
कल्पना कीजिए कि कोई गायक सुबह रिकॉर्डिंग स्टूडियो में एंट्री करता है और रात जब बाहर निकलता है, तो उसके नाम 21 पूरी तरह से रिकॉर्ड किए गए गाने होते हैं. ये कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि 8 फरवरी 1981 को बेंगलुरु में रचा गया एक ऐसा इतिहास है, जिसे महान गायक श्रीपति पंडिताराध्युला बालासुब्रमण्यम (एसपीबी या बालु) ने संगीतकार उपेंद्र कुमार के लिए कन्नड़ गीतों की रिकॉर्डिंग के दौरान सच कर दिखाया था. उन्होंने एक दिन में 19 तमिल और 16 हिंदी गाने रिकॉर्ड करने का रिकॉर्ड भी बनाया.

इंजीनियर बनने का सपना, लेकिन किस्मत ने बनाया गायक
4 जून 1946 को नेल्लोर (आंध्र प्रदेश) के एक तेलुगु ब्राह्मण परिवार में जन्मे बालासुब्रमण्यम के पिता एस. पी. सांबामूर्ति एक ‘हरिकथा’ कलाकार थे. उनके पिता चाहते थे कि ‘बालु’ इंजीनियर बने. पिता की इच्छा का मान रखते हुए उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की, लेकिन टाइफाइड के कारण पढ़ाई छूटी, तो वो मद्रास (चेन्नई) चले आए.
एमजीआर ने एक महीने तक रोक दी थी रिकॉर्डिंग
साल 1969 में तमिल सिनेमा के महानायक एम. जी. रामचंद्रन (एमजीआर) अपनी फिल्म ‘अदिमै पेन’ के गाने ‘आयिरम निलावे वा’ की रिकॉर्डिंग के लिए एस. पी. बालासुब्रमण्यम का इंतजार कर रहे थे. ऐन वक्त पर एस. पी. बालासुब्रमण्यम बीमार पड़ गए. हैरान करने वाली बात ये थी कि एमजीआर ने लगभग एक महीने तक फिल्म की रिकॉर्डिंग रोक दी ताकि एस. पी. बालासुब्रमण्यम ठीक हो सकें और वही इस गाने को गाएं. ये एस. पी. बालासुब्रमण्यम की टैलेंट का ही जादू था कि उनके ठीक होने के बाद रिकॉर्ड हुआ ये गाना मील का पत्थर साबित हुआ.
15 दिसंबर 1966 को तेलुगु फिल्म ‘श्री श्री श्री मर्यादा रमन्ना’ के गीत ‘एमिये विंत मोहम’ से करियर की शुरुआत करने वाले एस. पी. बालासुब्रमण्यम ने संगीत की कोई औपचारिक शास्त्रीय शिक्षा नहीं ली थी. इसके बावजूद, जब वर्ष 1980 में डायरेक्टर के. विश्वनाथ ने विशुद्ध कर्नाटक संगीत पर आधारित फिल्म ‘शंकराभरणम’ के गीतों को गाने की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी, तो शास्त्रीय संगीत के दिग्गजों को संशय था.
लेकिन संगीतकार के. वी. महादेवन के डायरेक्शन में एस. पी. बालासुब्रमण्यम ने ‘ओंकारा नाधानु’ जैसी अत्यंत जटिल बंदिशों को अपने सुगम संगीत के माधुर्य के साथ ऐसा गाया कि उन्हें अपना पहला सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का ‘राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार’ मिला.
‘एक दूजे के लिए’ से मिली हिंदी सिनेमा में पहचान
साल1981 में जब एस. पी. बालासुब्रमण्यम ने के. बालचंदर की फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ से हिंदी सिनेमा में कदम रखा, इस फिल्म के गाने ‘तेरे मेरे बीच में, कैसा है ये बंधन अंजाना’ ने उन्हें दूसरा राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाया.
सलमान खान की आवाज बन गए थे बालासुब्रमण्यम
इसके बाद, बालु बॉलीवुड के सुपरस्टार सलमान खान की परदे पर गूंजने वाली आधिकारिक आवाज बन गए. ‘मैंने प्यार किया’ (1989) का ‘दिल दीवाना’ हो या ‘हम आपके हैं कौन…’ (1994) में लता मंगेशकर के साथ गाया गया कालजयी गीत ‘दीदी तेरा देवर दीवाना’.
डबिंग की दुनिया में भी दिखाया कमाल
डबिंग की दुनिया में वे कमल हासन की तेलुगु आवाज बन चुके थे. फिल्म ‘दशावतारम’ (2008) में कमल हासन के 10 अलग-अलग किरदारों में से 7 को एस. पी. बालासुब्रमण्यम ने अपनी आवाज की विविधता से जीवंत किया था. इसके अलावा उन्होंने हॉलीवुड एक्टर बेन किंग्सले के लिए फिल्म ‘गांधी’ के तेलुगु संस्करण में भी डबिंग की.
कई बड़े सम्मानों से हुए सम्मानित
भारत सरकार ने उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2001 में पद्मश्री, 2011 में पद्म भूषण और वर्ष 2021 में मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया. आंध्र प्रदेश सरकार ने उन्हें रिकॉर्ड 25 बार नंदी पुरस्कारों से नवाजा.

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आज भी जिंदा है उनकी विरासत
5 सितंबर 2020 को चेन्नई के एमजीएम अस्पताल में एस. पी. बालासुब्रमण्यम ने अंतिम सांस ली. उनकी अटूट विरासत को सम्मान देते हुए, 15 दिसंबर 2025 को हैदराबाद के रवींद्र भारती में देश के दिग्गजों की उपस्थिति में उनकी एक कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया गया.
