पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में जारी विरोध प्रदर्शनों ने पाकिस्तान के उस दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसमें वह खुद को कश्मीरी मुसलमानों का प्रतिनिधि बताता रहा है। न्यूयॉर्क स्थित थिंक टैंक गेटस्टोन इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पीओके में लोग अब पाकिस्तान के खिलाफ खुलकर आवाज उठा रहे हैं और इससे पाकिस्तान की कश्मीर संबंधी कहानी कमजोर पड़ती दिख रही है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान लोगों ने ‘PAK फोर्सेज आउट’ (पाकिस्तानी सेना बाहर जाओ) जैसे नारे लगाए। इससे साफ संकेत मिलता है कि वहां के लोगों में पाकिस्तान की नीतियों को लेकर नाराजगी बढ़ रही है।

आर्थिक मुद्दों से शुरू हुआ आंदोलन
रिपोर्ट में बताया गया है कि यह आंदोलन मई 2023 में बिजली की बढ़ती कीमतों और आटे की कमी के विरोध से शुरू हुआ था। इस आंदोलन का नेतृत्व जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने किया, जिसमें व्यापारी, वकील, ट्रांसपोर्टर, छात्र और सामाजिक संगठनों के लोग शामिल थे। कमेटी ने सरकार के सामने 38 सूत्रीय मांगपत्र रखा था। इसमें सस्ती बिजली, सस्ता आटा, जरूरी सामान पर सब्सिडी और स्थानीय चुनाव व्यवस्था में सुधार जैसी मांगें शामिल थीं।
लोगों में बढ़ी नाराजगी
रिपोर्ट के मुताबिक, लोगों का कहना है कि पीओके में बड़ी मात्रा में जलविद्युत उत्पादन होता है, लेकिन इसके बावजूद उन्हें महंगी बिजली दी जा रही है। वहीं खाद्य पदार्थों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और जरूरी सामान की कमी भी बनी हुई है। इन समस्याओं के कारण लोगों में लंबे समय से नाराजगी थी, जो अब बड़े आंदोलन का रूप ले चुकी है।
प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जून 2026 में मुजफ्फराबाद और रावलाकोट जैसे प्रमुख शहरों में पाकिस्तानी अर्धसैनिक बलों ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई। इसमें कई लोगों की मौत और कई अन्य घायल हुए। रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने 5 जून को अवामी एक्शन कमेटी पर आतंकवाद विरोधी कानून के तहत प्रतिबंध लगा दिया। इसके नेताओं पर देशद्रोह के मामले दर्ज किए गए। साथ ही इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं बंद कर दी गईं तथा अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए गए।
पाकिस्तान के दावे पर सवाल
रिपोर्ट में कहा गया है कि पीओके में मुस्लिम समुदाय द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन यह दिखाते हैं कि वहां के लोग अब पाकिस्तान को अपना रक्षक नहीं मानते। कई लोग मानते हैं कि पाकिस्तान के बिना उनका भविष्य बेहतर हो सकता है। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि भारतीय केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के लोगों को राजनीतिक अधिकार, आर्थिक अवसर और विकास के मामले में पीओके के लोगों की तुलना में बेहतर सुविधाएं मिल रही हैं। गेटस्टोन इंस्टीट्यूट का कहना है कि पीओके में चल रहा यह आंदोलन पाकिस्तान की कश्मीर नीति और उसके लंबे समय से किए जा रहे दावों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। हालांकि, यह रिपोर्ट एक थिंक टैंक की है और इसमें किए गए दावों पर पाकिस्तान की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

