विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग महाकाल मंदिर परिसर में एक हजार वर्ष प्राचीन ऐतिहासिक धरोहर को फिर से जीवित किया जा रहा है। मई 2020 में विस्तारीकरण कार्यों के दौरान 25 से 30 फीट गहरी खुदाई में मिले परमारकालीन शिव मंदिर के अवशेषों से अब उसी प्राचीन शैली में मंदिर का पुनर्निर्माण शुरू हो गया है। पुरातत्व विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में चल रहे इस कार्य का मुख्य उद्देश्य महाकाल मंदिर के गौरवशाली इतिहास और प्राचीन शैव स्थापत्य को पुनर्स्थापित करना है। वर्ष 2020-21 की खोदाई के दौरान भूमिगत गर्भगृह के अवशेष, प्राचीन शिवलिंग, नंदी, गणेश, मां चामुंडा और शार्दूल की प्रतिमाएं मिली थीं। इसके अलावा भूमिज शैली में निर्मित मंदिर के स्तंभ, कुंभ भाग, आमलक, भारवाही कीचक और कपोतिका जैसे कई स्थापत्य खंड प्राप्त हुए थे।
राजस्थान के बेसाल्ट पत्थरों और विशेष कारीगरों का हुनर
पुरातत्व विभाग ने सभी प्राप्त अवशेषों का वर्गीकरण कर उनकी नंबरिंग की है, ताकि प्रत्येक पत्थर को उसके मूल स्थान पर ही जोड़ा जा सके।
- कारीगर: निर्माण के लिए राजस्थान से 28 विशेष कारीगरों को बुलाया गया है।
- पत्थर: खोदाई में मिले मूल पत्थरों का उपयोग प्राथमिकता से किया जा रहा है। जहां पत्थर कम या क्षतिग्रस्त हैं, वहां राजस्थान से विशेष बेसाल्ट (काले) पत्थर मंगवाकर तराशे जा रहे हैं।

मंदिर पुनर्निर्माण की प्रमुख झलकियां
- ऊंचाई: महाकाल मंदिर के मुख्य शिखर के सामने बन रहे इस मंदिर की ऊंचाई लगभग 36 से 37 फीट होगी।
- लागत: इस परियोजना पर करीब 65 से 90 लाख रुपये का खर्च आने का अनुमान है।
- समयसीमा: मंदिर का आधार बनकर तैयार हो चुका है। विशेषज्ञ इसे आगामी 1 से डेढ़ वर्ष में (2027 के अंत तक) पूर्ण करने के लक्ष्य पर काम कर रहे हैं।