सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हुए रक्षा समझौते से काफी पहले चीन के राज्य-समर्थित मीडिया में ऐसे सुरक्षा ढांचे की चर्चा की जा रही थी। इस्लामी नाटो कहा जाने वाला यह गठबंधन 7 अगस्त को अस्तित्व में आया, लेकिन चीनी मीडिया ने इस संस्थागत ढांचे के ब्लूप्रिंट पर पांच महीने पहले से मुहर लगा दी थी। चीनी राज्य-समर्थित मीडिया के लेख यह गवाही देते हैं कि बीजिंग को इस सुरक्षा ढांचे की भनक महीनों पहले से थी।
सबसे महत्वपूर्ण कड़ी चीन के सरकारी अखबार चाइना डेली का 24 जुलाई को प्रकाशित लेख है। अखबार ने इस्लामी नाटो के अस्तित्व में आने से दो सप्ताह पहले इस लेख में मिस्र को भी शामिल करते हुए यह सवाल उठाया कि क्या इन चारों देशों का सहयोग एक नए सुरक्षा ढांचे का केंद्र बन सकता है। गौरतलब है कि तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान इस गठबंधन में मिस्र के भी शामिल होने की संभावना जता चुके हैं। ‘पैविंग ए न्यू पाथ फॉर मिडिल ईस्ट सिक्योरिटी’ शीर्षक वाले चाइना डेली के लेख में चारों देशों की क्षमताओं को एक साथ रखकर देखा गया। यहां तक कि अखबार ने चारों देशों के संभावित गठबंधन की संस्थागत जरूरतों तक पर चर्चा की।

इस लेख के मुताबिक इन चारों देशों का मेल भूमध्यसागर से दक्षिण एशिया तक फैला एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक गलियारा बनाता है, जिसके पास महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों, ऊर्जा बाजारों और बड़ी आबादी पर प्रभाव है। यानी जब सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच नया रक्षा समझौता हुआ भी नहीं था, चीन का सरकारी अखबार चारों देशों के सहयोग को एक सुरक्षा ढांचे की आधारशिला के तौर पर देख रहा था। लेख में मिस्र को अरब जगत की प्रमुख सैन्य व कूटनीतिक शक्ति, सऊदी अरब को प्रमुख आर्थिक शक्ति, तुर्किये को उन्नत रक्षा उद्योग और बड़ी सैन्य क्षमता वाला देश और पाकिस्तान को बड़ी सेना व सीमा सुरक्षा के अनुभव वाला देश बताया गया।
मार्च से मिला संकेत
इस साल 29 मार्च को पाकिस्तान, सऊदी अरब, मिस्र और तुर्किये के विदेश मंत्रियों की इस्लामाबाद में बैठक हुई थी। इसका घोषित उद्देश्य पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव कम करना और अमेरिका-ईरान वार्ता के प्रयास आगे बढ़ाना था। चारों विदेश मंत्रियों ने पाकिस्तान की ओर से अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता की मेजबानी के प्रस्ताव का समर्थन किया था। लेकिन चीनी सरकारी न्यूज एजेंसी शिन्हुआ ने इसको चार देशों का ‘क्वाड्रिलेटरल’ बताया था।
अप्रैल में आई रक्षा समझौते की बात
इसके चंद दिनों बाद 2 अप्रैल को चीन के राज्य-समर्थित चैनल सीजीटीएन ने यह सवाल उठाया कि क्या चार देशों का यह सहयोग आगे चलकर ‘रक्षा गठबंधन’ का रूप ले सकता है। चैनल ने पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के हवाले से लिखा कि ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगा। उस समय चारों देशों के बीच कोई रक्षा गठबंधन बना भी नहीं था। फिर भी चीन के राज्य-समर्थित मीडिया में यह सवाल सामने आ चुका था।
जून में आई संस्थागत ढांचे की बात
21 जून को शिन्हुआ ने काहिरा में मिस्र, सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों की चौथी बैठक को प्रमुखता से रिपोर्ट किया। मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी ने चारों देशों के तंत्र को एक संस्थागत ढांचे में बदलने की जरूरत बताई। 11 जुलाई को शिन्हुआ ने अपनी रिपोर्ट में इसे फिर चारों देशों का ‘क्वाड्रिलेटरल मैकेनिज्म’ कहा।
चीन की दिलचस्पी के मायने
बीजिंग भली-भांति समझता है कि यदि पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण एशिया तक के यह इस्लामी देश किसी साझा सुरक्षा ढांचे के तहत आते हैं, तो यह अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रभाव को वैश्विक दक्षिण में टक्कर दे सकता है। साथ ही पाकिस्तान के जरिए सऊदी अरब और तुर्किये के साथ गठजोड़ चीन की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं के लिए एक सुरक्षित सामरिक गलियारा भी तैयार कर सकता है। इसीलिए चीन इस समीकरण के आकार लेने से महीनों पहले से इसके हर मूवमेंट पर नजर बनाए था।

