US Iran War: मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध के वजह से दुनिया भर में तेल की सप्लाई पर बुरा असर पड़ रहा है. इस दौरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ बुरी तरह से बंद हो गया, जिसकी वजह से तेल की आवाजाही रुक गई. इसे अब तक का सबसे बड़ा सप्लाई शॉक माना जा रहा है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी और U.S. डिपार्टमेंट ऑफ़ एनर्जी के डेटा पर आधारित रॉयटर्स के कैलकुलेशन के मुताबिक रोज़ाना 12 मिलियन बैरल से ज्यादा तेल सप्लाई प्रभावित हो रही है. यह दुनिया की कुल डिमांड का लगभग 11.5% है. इस हिसाब से 52 दिनों में करीब 624 मिलियन बैरल सप्लाई मार्केट से गायब हो गया है.
IEA की रिपोर्ट के मुताबिक 1973 अरब ऑयल बैन होने की वजह से 4.5 मिलियन बैरल तेल का नुकसान हुथा. 1979 ईरान क्रांति के दौरान 5.6 मिलियन और 1991 गल्फ वॉर के दौरान 4.3 मिलियन बैरल तेल का नुकसान हुआ था. मौजूदा समय में सिर्फ कच्चा तेल नहीं, बल्कि नैचुरल गैस, रिफाइंड फ्यूल (डीजल, जेट फ्यूल) और फर्टिलाइज़र सब पर एक साथ असर पड़ा है
LNG और गैस पर असर
मिडिल ईस्ट युद्ध की वजह से कतर का LNG प्रोडक्शन प्रभावित हुआ है. ये दुनिया का बड़ा हिस्सा है, जहां से गैस का प्रोडक्शन होता है. पहले के मुकाबले आज दुनिया पहले से ज्यादा गैस पर निर्भर है. खाड़ी की रिफाइनरियों में उत्पादन घटने से जेट फ्यूल और डीजल की कमी हो गई है. कई देशों में ट्रांसपोर्ट और एविएशन प्रभावित हुआ है.
कीमतों पर असर
युद्ध की वजह से तेल की कीमत $70 से बढ़कर लगभग $95 प्रति बैरल हो गए हैं. इसके और आगे बढ़ने की आशंका है. इस दौरान सऊदी अरब और UAE जैसे देश भी प्रभावित हुआ है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ स्ट्रेट बंद होने से वे भी एक्सपोर्ट नहीं कर पा रहे है. एशिया और अफ्रीका में शुरुआत में ही सप्लाई की कमी है. मौजूदा स्थिति की वजह से ग्लोबल मार्केट पर दबाव बढ़ता जा रहा है.
तेल की सप्लाई तेजी से घट रही
मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध की वजह से तेल की सप्लाई तेजी से घट रही है. पहले जो स्टॉक जमा था, वह भी खत्म होने की कगार पर है. अनुमान के मुताबिक इस महीने के अंत तक करीब 650 मिलियन बैरल तेल की सप्लाई का नुकसान हो चुका होगा. रोजाना लगभग 13 मिलियन बैरल तेल की सप्लाई रुक चुकी है. इसके अलावा 13 अप्रैल को लगे अमेरिकी ब्लॉकेड के कारण 1.3 मिलियन बैरल प्रति दिन की और कमी आ गई है, क्योंकि ईरान का तेल बाजार तक नहीं पहुंच पा रहा है.
होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से सप्लाई पर कितना बड़ा असर पड़ा है
तेल के एक्सपोर्ट के आंकड़े भी साफ दिखाते हैं कि हालात कितने खराब हैं. मार्च के आखिर तक दुनिया में समुद्र के रास्ते भेजे जाने वाले कच्चे तेल में 6.9 मिलियन बैरल प्रति दिन की कमी आई थी. 20 अप्रैल तक इसमें 1.8 मिलियन बैरल प्रति दिन की और गिरावट हुई. यानी कुल मिलाकर सप्लाई पहले के मुकाबले 8.8 मिलियन बैरल प्रति दिन कम हो गई है. अगर यही हाल रहा तो जून 2020 के कोविड समय के बाद यह सबसे कम सप्लाई का स्तर होगा. कई देशों के पास तेल का रिजर्व है, लेकिन इतना बड़ा और लगातार नुकसान ये भी पूरा नहीं कर सकते. अगर अभी इन रिजर्व का इस्तेमाल किया जाता है, तो बाद में उन्हें भरने के लिए और ज्यादा तेल की जरूरत पड़ेगी.
क्या यह संकट पहले के तेल संकटों से भी बड़ा है
1973 में भी तेल संकट आया था, जब दुनिया की सप्लाई का लगभग 7 प्रतिशत हिस्सा खत्म हो गया था. लेकिन उस समय स्थिति को बातचीत से सुधारा जा सकता था. आज की स्थिति अलग है. अभी लगभग 13 प्रतिशत सप्लाई पर असर पड़ा है और यह एक असली रुकावट है, जिसे जल्दी ठीक करना आसान नहीं है. मिडिल ईस्ट दुनिया के करीब 30 प्रतिशत तेल की सप्लाई करता है. अगर हालात और बिगड़े, तो यह हिस्सा भी खतरे में पड़ सकता है. भले ही युद्ध जल्दी खत्म हो जाए, लेकिन सप्लाई को पहले जैसी स्थिति में आने में महीनों या साल भी लग सकते हैं.
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